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Sunday, March 8, 2026
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मेजर-जनरल रॉबर्ट क्लाइव, प्रथम बैरन क्लाइव

भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के संस्थापक का जन्म 21 सिंतबर 1725 को स्टाएच में हुआ। 18 वर्ष की आयु में मद्रास के बंदरगाह पर क्लर्क बनकर आये। यहीं से उनका ईस्ट इंडिया कंपनी का जीवन आरंभ हुआ, 1746 में जब मद्रास अंग्रेजों के हाथ से निकल गया तब उसे बीस मील दक्षिण स्थित सेंट डेविड किले की ओर भागना पड़ा। उन्हें वहाँ सैनिक की नौकरी मिल गई। यह समय ऐसा था जब भारत की स्थिति ऐसी हो रही थी कि फ्रांसीसी और अंग्रेजों में, जिसमें भी प्रशासनिक और सैनिक क्षमता दोनों होगी वह भारत का विजेता बन जाएगा। (Major-General Robert Clive)

औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात्‌ के 40 वर्षों में मुगल साम्राज्य धीरे धीरे उसके सूबेदारों के हाथ आ गया था। क्लाइव सैनिक और राजनीतिज्ञ दोनों था। उसने फ्रांसीसियों के मुकाबले इन तीनों ही सूबों में अंग्रेजों का प्रभाव जमा दिया। किंतु उसकी महत्ता इस बात में है कि उसने अपनी योग्यता और दूरदर्शिता से इन तीनों ही सूबों में से सबसे धनी सूबे पर अधिकार करने में सफलता प्राप्त की।

1 अप्रैल 1756 को बंगाल और बिहार के सूबेदार की मृत्यु हो गई। 1752 में अल्लावर्दी खाँ ने सिराजुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी बनाया था। अल्लावर्दी खाँ की मृत्यु के पश्चात्‌ सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना। 18वीं शताब्दी के आरंभ में ही अंग्रजों ने फोर्ट विलियम की नींव डाली थी और 1755 तक उसके आसपास काफी लोग बस चुके थे, इसी लिये उसने नगर का रूप ले लिया था जो बाद में कलकत्ता कहलाया। (Major-General Robert Clive)

20 मई 1756 को राजमहल पहुंचने के पश्चात्‌ उसने अपना इरादा बदल दिया और मुर्शिदाबाद लौट आया और कासिम बाजारवाली अंग्रेजी फैक्ट्री पर अधिकार कर लिया। यह घटना 4 जून 1756 को घटी। 5 जून को सिराजुद्दौला की सेना कलकत्ते पर आक्रमण करने को रवाना हुई और 16 जून को कलकत्ता पहुंची। 19 जून को कलकत्ता के गवर्नर, कमांडर और कमेटी के सदस्यों को नगर और दुर्ग छोड़कर जहाज में पनाह लेना पड़ा।

20 जून को कलकत्ता पर नवाब का कब्जा हो गया। जब इसकी खबर मद्रास पहुंची तो वहां से सेना भेजी गई, जिसका नेतृत्व क्लाइव के हाथ में था।चंद्रनगर की लड़ाई के बाद क्लाइव को ज्ञात हुआ कि सिराजुद्दौला से उसके अपने ही आदमी असंतुष्ट हैं; और उनमें उसका सेनापति मीरजाफर प्रमुख हैं। क्लाइव ने इससे लाभ उठाने का निश्चय किया।(Major-General Robert Clive)

फलस्वरूप मीरजाफर और अंग्रेजों के बीच एक गुप्त समझौता हुआ। जिसके अनुसार कलाइव ने मीरजाफर को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी दिला देने का वादा किया। इसके लिये मीरजाफर को कलकत्ता में हुए कंपनी की हानि और सैनिक व्यय के लिये 10 लाख पाउंड, कलकत्ते के अंग्रेज निवासियों को २ लाख पाउंड और अरमीनियन व्यापारियों को 70 हजार पाउंड देने की बात ठहरी।

1760 ई. में क्लाइव इंग्लैंड वापस लौटा। उस समय क्लाइव के पास 30 लाख पौंड सालाना की रकम मिलने की व्यवस्था थी। इंग्लैंड पहुँचने पर उसे बैरन ऑव प्लासी की उपाधि मिली। उसने बड़ी जायदाद खरीदी और अपने मित्रों को पार्लमेंट का सदस्य बनवाया।64 में फिर क्लाइव को बंगाल का गवर्नर बनाकर भेजा गया और मई, 1764 में क्लाइव दुबारा कलकत्ता आया।

बंगाल की गवर्नरी से पहले उसने कं पनी के भत्ते के संबंध में नए कानून बनाए थे मगर वे कार्यवित न हो सके थे। क्लाइव ने बंगाल पहुंचते ही इस कानून को जारी किया। इस कानून के अनुसार सैनिक अफसरों को बंगाल और बिहार में उसी समय भत्ता मिल सकता था जब वे छावनी से बाहर हों। केवल मुंगेर और पटना केंद्र में रहने वाले अफसरों को भत्ता मिलता था। इस प्रकार एक अफसर को तीन, छह और बारह रूपए प्रति दिन भत्ता मिलता था।

सिविल अफसरों की भाँति जब सैनिक अफसरों ने भी इस कानून के विरोध में नौकरी से इस्तीफा देने की ठानी तब क्लाइव ने उनका इस्तीफा स्वीकार किया और उसके स्थान पर मद्रास से बुलाकर अफसर रखे। जो लोग विद्रोह पर तैयार हुए उन्हें दबा दिया। मीनजाफर ने अपनी वसीयत में 70 हजार पौंड क्लाइव के लिये लिखे थे। उनको क्लाइव ने उन लोगों के नाम कर दिया जो युद्ध में घायल हुए थे।

फरवरी, 1767 में क्लाइव ने अंतिम बार भारत छोड़ा मगर जाने से पूर्व ईस्ट इंडिया कंपनी की नींब मजबूत कर दी। इंग्लैंड जाने पर उनके ऊपर भ्रष्टाचार का मुकदमा चला, किंतु उससे वह बरी कर दिया गया और अपनी सेवाओं के लिये उसे वजीफा दिया गया। (Major-General Robert Clive)


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