श्रद्धा की हत्या पर ग़म-आक्रोश दिखाने वाले कैसे बना रहे हैं मीम्स और जोक्स, सोशल मीडिया ने कैसे बदल दिए इमोशंस
अशफ़ाक अहमद
मिनट-मिनट में स्विच्ड होती फीलिंग्स के बीच क्या किसी के पास वास्तविक दुख बचा है? हम सोशल मीडिया पर एक नकली अवतार ले कर प्रकट होते हैं, एक पोस्ट किसी के घर हुए मातम पर होती है, हम सैड रियेक्ट करते हैं, उसके जस्ट नीचे दूसरी पोस्ट फनी होती है और हम हा- हा रियेक्ट करते हैं। क्या इस त्वरित गति से हमारे इमोशंस भी शिफ्ट होते हैं? जवाब है नहीं, हम एक आभासी माध्यम पर किसी रोबो की तरह एक्ट कर रहे हैं जिसके पास इमोशंस के नाम पर फेसबुक की तरफ़ से दिये गये रियेक्शंस भर हैं और हमारा लगातार प्रोग्राम्ड किया जा रहा दिमाग इस चीज का इस कदर आदी हुआ जा रहा है कि हम समझ ही नहीं पा रहे कि हमारे इमोशंस कहीं पीछे छूट चुके हैं और हम यहां सर से पैर तक नकली हैं। हमारा गुस्सा, प्यार, केयर सब दिखावा है और दूसरी कई चीजों से संचालित हो रहा है। (showing anger on Shraddha’s)
एक लड़की का ब्रूटल मर्डर होता है और बीते दो दिनों से तूफान सा मचा हुआ है सोशल मीडिया पर, लेकिन किसके इमोशंस असली हैं? किसी को वाकई गम है तो अगली किसी पोस्ट पर वह लाफिंग रियेक्शन कैसे दे पा रहा? उस दुख को महसूस करते फेसबुक से दफा क्यों नहीं हुआ जा रहा? कैसे लोग उस वीभत्स मौत पर तरह-तरह के मीम्स और जोक बना पा रहे? कैसे उस मौत पर आक्रोश व्यक्त करता बंदा/बंदी अगली किसी पोस्ट में अब्दुल और बड़े फ्रिज के नाम पर उस मौत का मज़ाक उड़ा पा रहे?
सच यह है कि उस मौत से किसी को मतलब नहीं, न कोई आक्रोश है, आप ऐसी सारी पोस्टों का बारीकी से अवलोकन कीजिये, आप पायेंगे कि लोग अपने भीतर दबी कुंठायें रिलीज कर रहे हैं। जिन्हें मुसलमानों से नफरत है, उन्होंने मान लिया है कि यह (मुसलमान) ऐसे ही होते हैं, शाकाहार प्रेमियों ने इसे मुसलमानों की बकराईद से जोड़ कर ख़ुद को तृप्त कर लिया है जैसे इस तरह अमूमन हर रोज मर्डर हो रहे हैं और इन नृंशस हत्याओं पर मुसलमानों का कॉपीराइट है। (showing anger on Shraddha’s)
देहरादून में पत्नी को काट कर सत्तर टुकड़ों में फ्रिज में सुरक्षित करने वाला राजेश गुलाटी हिंदू था तो उसके कांड के पीछे पूरे हिंदू समाज को यह ऐसे ही होते हैं कहा जा सकता है? नैना साहनी तंदूर कांड में पत्नी को मार कर तंदूर में जलाने वाला सुशील शर्मा ब्राहमण था तो उसके शाकाहारी होने की भी पूरी संभावना है, क्या उसके पीछे सीधे शाकाहार को टार्गेट किया जा सकता था?
कुछ परंपरावादियों को बहाना मिल गया कि लिव-इन में रहने वालों का ऐसा ही अंजाम हो सकता है और इस बहाने उन्होंने लिव इन पर निशाना साध कर खुद को संतुष्ट कर लिया, लेकिन लिव इन तो नये ज़माने का चलन है और बहुत सीमित है, लाखों हत्याएँ तो शादी के बाद बीवियों की हो चुकी हैं। राजेश गुलाटी और सुशील शर्मा, दोनों शादी के बाद की हिंसा के ही उदाहरण हैं, तो क्या उन हत्याओं को उदाहरण मान कर शादी नाम की संस्था को ध्वस्त कर दिया जाये? उसे खारिज कर दिया जाये? मुसलमानों ने ख़ुद पर अटैक होते देखा तो प्रतिक्रिया में सेम पैटर्न पर हिंदुओं में हुई हत्याओं को गिनाने बैठ गये, लेकिन क्या इससे उस लड़की की मौत जस्टिफाई हो गई? क्या इन तमाशों में लड़की की मौत कहीं पीछे नहीं छूट गई (showing anger on Shraddha’s)
अब चूंकि वह प्यार के नाम पर मारी गई तो कोई प्यार को खलनायक बनाने पर तुल गया, तो किसी ने अपनी भड़ास लव जिहाद का अंजाम बता कर निकाल ली, यानि प्रेम करने पर ही लड़की की हत्या होगी? बिना प्रेम, जबर्दस्ती और बलात्कार के नाम पर हर साल कितनी लड़कियों को कत्ल किया जाता है, कभी गिनने की कोशिश की है? और यह लव जिहाद क्या है? लड़के का नाम उर्दू है तो वह जिहाद कर रहा था? क्या होता है जिहाद? जिस लड़के के रोज के कारनामों से इस्लाम से दूर-दूर तक नाता न हो, वह जिहाद कर रहा था, रियली? अभी कुछ महीने या साल भर पीछे का ही एक केस है, जिसमें एक मुस्लिम लड़की इसी तरह अपने हिंदू प्रेमी के हाथों मारी गई थी, बस टुकड़े नहीं हुए थे उसके, तो वह क्या था? रिवर्स लव जिहाद कहें उसे?
अपने पर वार होते देख मुसलमान सेम पैटर्न पर हिंदुओं की तरफ़ से होते कांडों की लिस्ट निकालने के साथ लड़के का धर्म बदलने की कवायद में जुट गये, लेकिन यह ज़रूरी क्यों है? क्या कोई मुस्लिम धर्म का युवक या युवती ऐसा नहीं कर सकता? क्या वेस्ट यूपी की वह युवती भुलाई जा चुकी है जिसने अपने प्रेमी के साथ मिल कर रात को सोते हुए अपने पूरे परिवार को काट डाला था? सच तो यह है कि यह अपराध व्यक्तिगत होते हैं, इंसानी मनोवृत्ति और तत्कालिक परिस्थितियों पर आधारित होते हैं और इनसे किसी धर्म, आइडियालोजी, खान पान का कोई लेना-देना नहीं होता। (showing anger on Shraddha’s)
बाकी सोशल मीडिया का सच यह है कि यहां ओरिजनल इमोशंस कहीं नहीं किसी के पास, बस सबके अंदर दबी हुई कुंठायें है जो एक मनमाफिक मौका पाने पर रिलीज होना शुरु हो जाती हैं। कोई दुख कोई दर्द इतनी तेजी से स्विच नहीं होता, जितनी तेज़ी से हम इस स्क्रोल सिंड्रोम की सवारी करते नज़र के सामने पड़ती अलग-अलग फ्लेवर की पोस्ट पर रियेक्ट करते हैं। हम इंसान इस आभासी दुनिया से बाहर हैं, यहां हम एक रोबोटिक अवतार भर हैं जो बस अपने अंदर दबी नफरतें और कुंठाएं उगल रहे हैं। (showing anger on Shraddha’s)
(ये लेख लेखक के सोशल मीडिया ब्लॉग से लिया गया है)