Indus News TV Live

Sunday, March 8, 2026
spot_img

क्या गोरखपुर विश्वविद्यालय के 71 असिस्टेंट प्रोफेसर्स में 65 सवर्णों को नियुक्त किया गया, अखिलेश सरकार की पीसीएस भर्ती जैसा आरोप

उत्तर प्रदेश की राज्य स्तरीय सेवाओं में एक बार फिर जातीय वर्चस्व पर बवंडर उठता दिखाई दे रहा है. पिछले साल जहां, राज्य के 30 विश्वविद्यालयों में 73 फ़ीसदी सवर्ण जाति के वाइस चांसलर (कुलपति) की तैनाती पर हंगामा मचा था. सालभर बाद, गोरखपुर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर्स की नियुक्त की एक कथित लिस्ट ने उसे और भड़का दिया है. (upper castes assistant professors)

यहां 71 असिस्टेंट प्रोफेसर्स की भर्ती में 45 ठाकुर, 17 ब्राहमण और 3 जायसवाल बताए जा रहे हैं. जबकि एससी-एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक वर्ग से महज 6 उम्मीदवार की नियुक्त. क्या हक़ीक़त में ऐसा है? इससे पहले नियुक्तियों में बिरादरीवाद कितना मुद्​दा बनता रहा है-देखिए.

यूपी में लोकसेवा आयोग हो, राज्य विश्वविद्यालय या फिर पुलिस सेवा. इनकी नियुक्ति पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं. ख़ासतौर से हालिया वक़्त में, फिर सत्ता में चाहे जो हो, उसे इन इल्ज़ामों का सामना करना पड़ा है. (upper castes assistant professors)

गोरखपुर विश्वविद्यालय में कथित रूप से 65 सवर्ण असिस्टेंट प्रोफेसर्स की भर्ती पर सवाल ठीक वैसा ही है, जैसा 2015 में अखिलेश यादव की सरकार पर लगा था. उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग के तत्कालीन चेयरमैन अनिल यादव के कार्यकाल में यादव बिरादरी के उम्मीदवारों की नियुक्ति के आंकड़ों ने अखिलेश सरकार के ख़िलाफ़ काफ़ी माहौल बनाया था.

तब ये मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट तक पहुंचा. एक पीआईएल दाखिल हुई. जिसमें ये दावा किया गया कि अनिल यादव के UPPCS बोर्ड के चेयरमैन बनने के तीन सालों में यादव उम्मीदवार थोक के भाव भर्ती हुए हैं. और उन्हें मलाईदार पदों पर आसीन किया गया है. आंकड़े रखे गए कि तीन साल में यूपी में 86 एसडीएम नियुक्त हुए हैं, जिसमें अकेले यादव वर्ग के 56 एसडीएम हैं. (upper castes assistant professors)

समाजवादी पार्टी पीसीएस में बिरादरीवाद के आरोपों को ख़ारिज करती रही, लेकिन आमजन को समझाने में सफल नहीं हो पाई. 2015 में यूपी पीएससी चयन में बिरादरीवाद की ख़बरें टटोलने पर इस मामले को मध्यप्रदेश के बहुचर्चित व्यापम घोटाले से जोड़कर प्रचारित किया गया था.

2017 के चुनाव में राज्य की सत्ता बदल गई. अखिलेश यादव को चुनावों में हार का सामना करना पड़ा. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने राजकाज संभाला. लेकिन जल्द ही वो भी बिरादरीवाद के आरोपों से घिरने लगी. ये अलग बात है कि उसके ख़िलाफ़ अखिलेश सरकार जैसा माहौल नहीं बन पाया. (upper castes assistant professors)

यूपी के ज़िलों में डीएम और एसपी की तैनाती से लेकर थानों के इंस्पेक्टरों तक, विपक्षी समाजवादी पार्टी ने राज्य सरकार पर एक ख़ास जाति के अफ़सरों की तैनाती को मुद्​दा बनाया. अखिलेश यादव ख़ुद भी अक्सर इस आरोप को दोहराते रहते हैं.

ताज़ा मामला गोरखपुर विश्वविद्यालय का है, जिसमें कथित रूप से 65 सवर्णों के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर नियुक्ति का मुद्​दा सोशल मीडिया पर छाया है. सपा समर्थक और दूसरे बुद्धिजीवी ये सवाल पूछ रहे हैं कि सपा सरकार को बदनाम करने वाले, गोरखपुर विश्वविद्यालय के मामले पर ख़ामोश क्यों हैं? पंकज सिंह नामक एक यूजर लिखते हैं-वो लोग 86 में से 56 एसडीएम यादव की झूठी ख़बर बना दिए और आप सच भी नहीं बोल पा रहे हैं. (upper castes assistant professors)

इसी तरह पिछले साल 2021 में राज्य विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर एक रिपोर्ट सामने आई थी. जिसमें राज्य के 30 विश्वविद्यालयों में तैनात कुलपतियों का ब्योरा उनकी जाति के साथ सार्वजनिक किया गया था. इसमें यूपी के 22 विश्वविद्यालयों में सवर्ण कुलपति नियुक्त थे, यानी कोई 73 फ़ीसदी. छह ओबीसी से और शेड्यूल कास्ट से एक वीसी शामिल थे.

राज्य विश्वविद्यालयों में कुलपतियों का चयन राज्यपाल-कुलाधिपति द्वारा गठित एक सर्च कमटी के ज़रिये होता है. लेकिन जब-जब राज्य विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति के पत्र सामने आते हैं. उस पर कोई न कोई सवाल उठ ही जाते हैं. कुलपति बनाए गए प्रोफेसर की अहिर्ता, जातीय या राजनीतिक रसूख-कई और सवाल. (upper castes assistant professors)

राज्य विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर और प्रोफेसरों की नियुक्ति भी विवादों का सबब बनती रहती है. पिछले पांच सालों में राज्य के अलग-अलग विश्विद्यालयों की नियुक्तियों को लेकर तमाम सवाल और आरोप सामने आते रहे हैं. जिनमें गोरखपुर विश्वविद्यालय भी एक है.

दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में भर्ती में बिरादरीवाद का आरोप जिस नियुक्ति के आधार पर लगाया जा रहा है. वो 2018 की नियुक्ति है. लेकिन ये उन दावों को खारिज करती है, जो सोशल मीडिया पर लगाए जा रहे हैं.

2018 में गोरखपुर विश्वविद्यालय में 68 असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त हुए. इसमें 44 सवर्ण हैं यानी जनरल कैटागिरी हैं. जबकि 14 असिस्टेंट प्रोफेसर ओबीसी से और 12 एससी-एसटी से नियुक्त हुए हैं. यानी सोशल मीडिया पर जिस सूची के आधार पर बिरादरीवाद का आरोप लगाया जा रहा है-वो आरोपों से थोड़ी भिन्न है. (upper castes assistant professors)


इसे भी पढ़ें : क्या रामपुर के चुनाव में आज़म ख़ान का चैप्टर खत्म ?


(आप हमें फेसबुक पेजइंस्टाग्रामयूट्यूबट्विटर पर फॉलो कर सकते हैं)

Related Articles

Recent