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Thursday, March 12, 2026
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गांधी हत्या के बाद

पुष्य मित्र


यह जानकारी बहुत कम लोगों को है कि गांधी की हत्या के बाद जब गोडसे को फांसी की सजा सुना दी गई तो कई गांधीवादियों ने इस फैसले का विरोध किया। उनका कहना था गोडसे को फांसी देना एक तरह से गांधी की दूसरी बार हत्या करना है। यह उन विचारों, नीतियों और उस स्वपन और आदर्श की हत्या होगी, जिसको जीवित रखने के लिए गांधी ने प्राण दिए। (After Gandhi’s assassination)

गांधी जी के तीसरे पुत्र रामदास गांधी जिनकी इस पोस्ट के साथ तस्वीर लगी है, ने कई दफा गोडसे को पत्र लिखा। और कहा कि वे, विनोवा भावे और किशोरीलाल मशरूवाला उनसे मिलना चाहते हैं और उनसे खुले दिल से बातचीत करना चाहते हैं कि जो रास्ता गोडसे ने चुना वह देश के लिए लाभकारी है या नुकसानदेह। एक तरह से वे गोडसे को अपने कृत्य पर मंथन करने के लिए प्रेरित करना चाहते थे। गोडसे ने मुलाकात के लिए सहमति भी दे दी। मगर भारत सरकार इस मुलाकात को टालना चाहती थी।

रामदास गांधी ने फिर मई, 1949 को राजगोपालाचारी को पत्र लिखा,’ मुझे नहीं मालूम कि पंडितजी, वल्लभ भाई और आपने गोडसे के बारे में क्या सोचा है। मगर मैं उसे फांसी पर लटका कर शहीद बना देने का समर्थक नहीं। क्योंकि प्रश्न सिर्फ एक गोडसे से निपटने का नहीं आरएसएस की मानसिकता वाले लाखों गोडसे का है। (After Gandhi’s assassination)

इसलिए मैं चाहूंगा कि आपलोग गोडसे और उसके साथियों को ऐसे वनवास पर भेज दें, जहां वे स्वयं मंथन कर सकें कि क्या गांधी की हत्या कर उन्हें अपने लक्ष्य की प्राप्ति हो सकी? वे यह भी सोच सकें कि क्या हिंदुत्व या भारत कभी आरएसएस के तरीकों से सुरक्षित रह पाएगा?इसके विपरीत अगर गोडसे को फांसी दे दी गई बापू जहां भी होंगे, अत्यंत दुखी होंगे।’

इस पत्र में उन्होंने फिर गोडसे से मिलने की इच्छा जाहिर की। मगर वह मुलाकात नहीं हो सकी। नेहरू, राजगोपालाचारी और पटेल तीनों ने रामदास गांधी का प्रस्ताव विनम्रता पूर्वक ठुकरा दिया। पटेल ने 16 जून को लिखा, मैं इस बात से सहमत हूं कि रामदास गांधी को गोडसे से नहीं मिलना चाहिए और यह काम उन्हीं पर(भारतीय कानून व्यवस्था) छोड़ देना चाहिए जिनका दायित्व उससे(गोडसे) से निपटने का है। (After Gandhi’s assassination)

पता नहीं यह मुलाकात होती तो क्या होता? रामदास गांधी की सलाह मान ली गई तो उसके क्या नतीजे होते? मगर यह उदाहरण है कि एक गांधीवादी गोडसे के मसले पर कैसे सोचता था। गांधी खुद होते तो क्या करते।

(लोक माध्यम से साभार)


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