काले-काले, अजीब सा तन-बदन, बिखरे बाल, मोटी मूंछें, आदमखोर जानवरों जैसे दांत, सिर पर जानवरों जैसे सींग। भयानक और कुरूप होने के साथ ही निर्दयी। असुरों के बारे में यही कल्पना है ज्यादातर भारतीयों, खासतौर पर हिंदी पट्टी के लोगों की। धार्मिक पुस्तकों या टीवी सीरियलों में इसी रूप को सजीव करने की कोशिश की गई है। सरकारी पाठ्यक्रमों तक में यही पढ़ाया जा रहा है। (Asuras Are Alive Live Here)
लेकिन हकीकत तो कुछ और भी है। असुर वध की तमाम कहानियों के बावजूद असुर जिंदा हैं। जिनसे मिलने और उनकी दुनिया को जानने के लिए किसी दैवीय मंत्र की जरूरत नहीं है। ट्रेन का टिकट लीजिए और पहुंच जाइए झारखंड की राजधानी रांची। यहां से तकरीबन 170 किलीमीटर दूर कुदरती तौर पर बेहद खूबसूरत इलाका है नेतरहाट। यहीं गुरदरी बॉक्साइट खनन क्षेत्र है, जिसके आसपास गांवों में असुर आदिवासी रहते हैं। खनन ने उनकी जिंदगी हाशिए पर पहुंचा दी है। (Asuras Are Alive Live Here)

प्रकृति से प्रेम करने वाले और रावण-महिषासुर को अपना पूर्वज मानने वाले ये असुर अपनी भाषा, संस्कृति, पुरखों की ज्ञान परंपरा और वजूद बचाने के लिए जूझ रहे हैं। इनको उस हर साल दशहरा जैसे त्योहार मनाने वाले कथित सभ्य समाज से शिकायत है। उनका कहना है कि हिंदू कथा-पुराण हमें राक्षस कहते हैं और रावण, महिषासुर आदि हमारे पुरखों की हत्याओं का विजयोत्सव मनाते हैं।

के लिए नेतरहाट के जोभीपाट गांव में ‘असुर आदिवासी विजडम अखड़ा’ केंद्र की स्थापना की है। ‘असुर आदिवासी विज़डम डॉक्यूमेंटेशन इनीशिएटिव’ फेसबुक पेज है। ‘असुर नेशन डॉट इन’ नाम से वेबसाइट के ज़रिए अपनी बात दुनियाभर में पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। एक कम्युनिटी रेडियो की संचालित कर रहे हैं, जो जंगल से ही संचालित होता है और पूरा प्रसारण असुर आदिवासी ही करते हैं। (Asuras Are Alive Live Here)


