अशोक कुमार पांडेय
वैसे तो कश्मीर मे नौकायन को आधुनिक रूप देने मे अकबर की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी लेकिन आधुनिक हाउसबोट बनाने का श्रेय एक कश्मीरी पंडित को है। उन्नीसवीं सदी के अंतिम दौर मे ढेरों अंग्रेज़ गर्मियों में कश्मीर आने लगे थे। अब वहाँ रुकने की बहुत व्यवस्थाएं तो थीं नहीं। कहते हैं विवेकानंद भी वहाँ आश्रम बनाना चाहते थे लेकिन बाहरी लोगों को बसने की अनुमति न होने से वह वापस लौट गए। (Houseboat story.)
1881 मे जॉन स्मित डॉक्सी ने वहाँ पहला मिशनरी स्कूल खोला और उस स्कूल मे अंग्रेज़ी सीखने वाले पहले कश्मीरी थे पंडित नारायनदास। उनके भतीजे पंडित आनंद कौल भी वहीं पढ़े और कश्मीरी पंडितों के इतिहास पर अंग्रेज़ी मे एक किताब लिखी। बेहद कुशाग्र पंडित आनंद कौल पर जे नॉवेल हिल्टन की नज़र पड़ी जो वहाँ लोक साहित्य पर शोध कर रहे थे और 16 साल के आनंद कौल ने उनके शोध मे महती योगदान दिया।
आनंद कौल के पुत्र पी एम के बमजाई कश्मीर के महत्त्वपूर्ण इतिहासकार हुए। ख़ैर, जब आनंद कौल कश्मीरी लोक साहित्य के शोध मे मदद कर रहे थे तो पंडित नारायण दास ने एक दुकान खोली जिसमें अंग्रेज़ो की ज़रूरत का सामान मिलता था। दुर्भाग्य से एक दिन आग मे पूरी दुकान खाक हो गई। नारायनदास ने हिम्मत नहीं हारी और एक हांजी (नाविक) से डोंगा लेकर उसमें सामान बेचने लगे। फिर इसमें अपनी ज़रूरत के मुताबिक सुधार किए और इस तरह पहली आधुनिक हाउसबोट सामने आई। (Houseboat story.)
बाद मे एक खिलंदड़ अंग्रेज़ एम टी केनर्ड ने इसमें कई नई चीज़ें जोड़ीं। नारायनदास से जब एक अंग्रेज़ ने बोट खरीदने की पेशकश की तो वह खुशी खुशी राज़ी हो गए – यह अच्छे खासे लाभ का सौदा था। फिर नारायनदास ऐसी नावों के व्यापारी हुए और अंग्रेज़ उद्यमियों ने उसमें अलग अलग परिवर्तन कर अपने लिए आरामगाह ढूंढ लिया। नारायनदास धीरे धीरे ‘नाव नारायण’ हुए कश्मीरियों के लिए और ‘बोट नारायण’ अंग्रेजों के लिए।
उनकी बनाई पहली हाउसबोट का नाम था – कश्मीर प्रिंसेज। (स्रोत नहीं दे रहा हूँ क्योंकि यह कथा इतनी कॉमन है कि कोई भी पाठक यहीं नेट पर ढूंढ सकता है। यह तस्वीर उन्नीसवीं सदी के आख़िरी दौर की है जहां हाउसबोट का उपयोग एंबुलेंस की तरह हो रहा है. (Houseboat story.)
(ये लेखक के निजी विचार हैं, लोक माध्यम से साभार)