हिंदू-मुस्लिम राजनीति का बखेड़ा तो सभी को पता है। अभी हिंदुत्व की राजनीति का पलड़ा भारी है, तो इसी पर बात ज्यादा होती है। हो सकता है इसलिए भी ऐसा हो कि असली दावेदारों की आवाज़ दबी रहे. मुसलमानों के धर्मस्थलों नीचे हिंदू धर्मस्थल दबे होने के दावों के विवादित मामलों से हम सब वाकिफ हैं. लेकिन, इस वक्त कुछ और भी चल रहा है, जो मेनस्ट्रीम मीडिया की सुर्खियों से तो नदारद है ही, सोशल मीडिया पर भी एक दायरे तक सिमटा हुआ है। (Possession is Buddhist Heritage)
यह मामला है, बौद्ध विरासत को मुक्त कराने की बेचैनी और धधक रहे गुस्से का। यह उग्रता किसको निशाना बनाकर पनप रही है? कौन हैं वो लोग, जिन पर उनका दावा है कि उन्होंने बौद्ध विरासत को कब्जाकर अपना झंडा गाड़ लिया? ये मुसलमान नहीं हैं। बल्कि ये आरोप हिंदू धर्म पर है. हिंदू धर्म को वो ब्राह्मणवाद कहते हैं। उनका कहना है कि हिंदू शब्द अरबी व्यापारियों की ओर से दी गई गाली है। बामसेफ और उसके बिरादर संगठन इस बात को खुलेआम अक्सर ही कहते हैं।
खैर, हाल फिलहाल के कुछ घटनाक्रम पर नजर दौड़ाइए कि चल क्या रहा है? दो दिन पहले बुद्धिस्ट इंटरनेशनल नेटवर्क ने देशव्यापी आंदोलन की घोषणा की। ये देशव्यापी आंदोलन होगा बौद्ध विरासत बचाने और उनको कब्जामुक्त कराने के लिए। ये घोषणा तब की गई है, जब नेपाल स्थित गौतम बुुद्ध की जन्मस्थली लुंबनि वन में मुरारी बापू का भजन कीर्तन हो रहा है, जिसमें ब्राह्मणवादी आध्यात्मिक प्रवचन हो रहे हैं। आंदोलन की घोषणा से पहले की भी एक बैकग्राउंड है। (Possession is Buddhist Heritage)
कुछ दिन पहले ही बाैद्ध धर्म अनुयायियों ने विनोबा भावे के आश्रम से बौद्ध विहार मुक्त कराने के लिए जुलूस निकाला था। इसी दरम्यान बहुजन मुक्ति मोर्चा के सहयोग से राष्ट्रीय महिमा मोर्चा का गठन किया गया है, जिसका उद्देश्य भी हिंदू धर्मस्थल घोषित किए गए बौद्ध स्थलों को मुक्त कराना है। बौद्ध स्थल मुक्त कराने की उनकी सूची में जगन्नाथ पुरी भी है, जिसके बौद्ध मठ होने का दावा है। बीते तीन महीने के अंदर दो घटनाक्रम उत्तरप्रदेश और बिहार के रहे, जो ध्यान खींचने वाले हैं।
उत्तरप्रदेश के बदायूं जिले में जामा मस्जिद पर एक हिंदू संगठन ने हिंदुओं की विरासत होने की याचिका दायर की।कुछ ही समय बाद यहां बौद्धों ने दावा कर दिया कि ये तो बौद्ध विरासत है। अब मामला फंस गया हिंदू और बौद्धाें के बीच। बौद्ध पक्ष ने बदायूं में सम्राट अशोक शासन में हुए कामकाज का लेखा जोखा देने की चुनौती दे दी। यह सब अभी सिमटा भी नहीं था कि अचानक बदायूं में बुद्ध प्रकट हो गए। बुद्ध कैसे प्रकट हो गए, अब आप ये सोचेंगे? हुआ ये, कि बदायूं की तहसील बिसौली से सहसवान होते हुए एक्सप्रेस वे का निर्माण कार्य चल रहा है। (Possession is Buddhist Heritage)
इसी रूट पर कोट गांव के पास टीले की खुदाई हो रही थी कि उसमें बुद्ध की मूर्तियां निकल आईं। इसके बाद से यहां भी बौद्ध धर्म अनुयायी काफी सक्रिय हो गए। कुछ बड़े बौद्ध भिक्षु भी दौरा कर चुके हैं। उससे पहले बिहार में नवोदित लेखक सोमनाथ आर्य ने कुछ ऐसी चीजें खोज लीं, जिनकी चर्चा स्थानीय स्तर पर सिमटकर रह गई। उन्होंने दो जगहों के बारे में बारीकी से खोजबीन की। एक तो ढोल पहाड़ी के पास मंदिर आदि पर और एक अन्य गांव में लतखोरवा बाबा की मूर्ति पर।
सोमनाथ आर्य का दावा है कि ढोल पहाड़ी पर मौजूद मंदिर में शिव-पार्वती की प्रतिमा असल में बुद्ध और उनकी मां महामाया की मूर्तियां हैं। इसी तरह लतखोरवा बाबा की खंडित मूर्ति भी बुद्ध की है, जिस पर लंबे समय से जूते-चप्पल से पीटने की अजीबोगरीब परंपरा डालकर मन्नत मांगी जाती है। काबिलेगौर यह भी है कि लगभग दो साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आदेश पर गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर का सर्वे हुआ तो वहां भी नीचे बौद्ध विहार पाए गए। यह वही सोमनाथ मंदिर है, जिस पर कई बार मुस्लिम हमलावरों के हमले से लूटपाट का मामला चर्चा में रहा है। (Possession is Buddhist Heritage)
हमले तब हुए, जब यहां मंदिर था। लेकिन, अब सवाल यह उठ रहा है कि बौद्ध विहार पर मंदिर कैसे बन गया? यहां तक कि प्रधानमंत्री के गृह क्षेत्र भावनगर में भी बड़े पैमाने पर बौद्ध विरासतें खोजी जा चुकी हैं। बौद्ध अनुयायियों का कहना है कि ब्राह्मणवादी ताकतों ने बौद्ध विरासतों को मिटाने का बहुत प्रयास किया है या फिर उन पर कब्जा कर लिया। मिथकों के आधार पर तथ्यों को मिटाने की कोशिश अभी भी जारी है, साकेत को अयोध्या बनाना इसी का उदाहरण है।
कुछ बौद्ध अनुयायियों का तो यहां तक कहना है कि ब्राह्मणवादियों ने प्रमुख बौद्ध मठों को चार धाम में बदल दिया। उत्तराखंड में कई ऐसे मंदिर हैं, जहां मूर्तियां ढंकी रहती हैं और उनको कोई नहीं देख सकता, वे असल में बुद्ध की मूर्तियां हैं। कुछ मिलाकर, इस पैटर्न से एक सांस्कृतिक युद्ध की गंध आ रही है, जिसमें अपनी खोई हुई पहचान और विरासत को पाने का अंतहीन सिलसिला हो सकता है। चलते-चलते आपको एक बात और बता दें। (Possession is Buddhist Heritage)
मुसलिम ब्राह्मणवाद के खिलाफ भी बिगुल फूंक दिया गया है। यहां भी ये सामाजिक-सांस्कृतिक युद्ध अशराफ और पसमांदा समाज के बीच है। जिसकी एक लंबी सीरीज आप इंडस न्यूज पर जल्द देखेंगे। एंथ्रोपोसीन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में ये युद्ध मानव समाज को किस दिशा में ले जाएंगे, कहना अभी मुश्किल है। लेकिन, न्याय के साथ समझदारी से खड़े होने की जरूरत तो हर युग में रही है, अभी भी है।


