आज भारत के न्यायालयों में महिला जज और वकीलों का दिखाई देना सामान्य है लेकिन कभी इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी. साल 1923 में भारत के ब्रिटिश कानून में बदलाव की वजह से संभव हुआ कि महिलाएं वकालत कर सकें और इस सबसे पीछे एक भारतीय महिला का जिद और जूनून बड़ी वजह था. ये महिला थी कॉर्नेलिया सोराबजी. नासिक के एक पारसी-ईसाई परिवार में कॉर्नेलिया सोराबजी का जन्म हुआ, दिन था 15 नवम्बर 1866. (India First Woman Lawyer Cornelia Sorabji)
कॉर्नेलिया को बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई से जुनूनी लगाव था. इसीलिए वे डेक्कन कॉलेज पुणे में दाख़िला लेने वाली भारत की पहली महिला बनीं. ये इतना आसान भी नहीं था इसके लिए कॉर्नेलिया को काफी कोशिशें करनी पड़ीं, दरअसल इससे पहले महिलाओं के लिए ऐसा करने के मौके खुले नहीं थे. कॉर्नेलिया सोराबजी ने मौके को हाथ से जाने नहीं दिया और पांच साल के कोर्स को तय समय से पहले पूरा कर लिया, वह भी शानदार अंकों के साथ.
अभी और भी बुरा वक़्त आना बाकी था. कॉलेज में बढ़िया अंक लाने वाले छात्रों को ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ने के लिए छात्रवृत्ति दी जाती थी. कॉर्नेलिया सोराबजी को महिला होने की वजह से इस छात्रवृत्ति से महरूम कर दिया गया. लेकिन कोई भी रुकावट कॉर्नेलिया को उनके सपने के पीछे भागने से नहीं रोक सकती थी. दोस्तों की मदद से कॉर्नेलिया ने ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की फीस जुटाई और बैचलर ऑफ सिविल लॉ विषय में दाखिला लेना तय किया. (India First Woman Lawyer)
उस वक़्त तक यूनिवर्सिटी में महिलाओं को कानून की पढ़ाई की इजाजत नहीं थी कॉर्नेलिया को यह दी गयी. इस तरह वे न सिर्फ ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने वाली पहली भारतीय बनीं बल्कि कानून की पढ़ाई करने वाली पहली महिला भी. चुनौतियां अभी बाकि थीं. आख़िरी साल के इम्तहान के लिए कॉर्नेलिया को लड़कों के साथ परीक्षा देने की अनुमति नहीं मिली. कॉर्नेलिया ने इसका विरोध किया तब जाकर उन्हें इसकी अनुमति मिली.
तमाम चुनौतियों से निपटते हुए आखिर उन्होंने अपनी कानून की पढ़ाई पूरी की और 1894 में भारत लौट आयीं. यहां पहुंचकर उन्होंने पर्दा प्रथा का सामना कर रही औरतों के मसलों को सुलटाने में जुट गयीं. पर्दानशीं औरतों की संपत्तियां आसानी से हड़प ली जा रही थी. कॉर्नेलिया कानूनी सलाहकार के तौर पर तो इन महिलाओं की मदद कर पा रही थीं लेकिन वे कोर्ट में उनकी पैरोकारी नहीं कर सकती थीं क्योंकि कानून इसकी इजाजत नहीं देता था. लेकिन हार मानना कॉर्नेलिया की फितरत में था ही नहीं.
1902 में उन्होंने महिलाओं और बच्चों के लिए कानूनी सलाहकार नियुक्त करने की गुजारिश सरकार से की और 1904 में उन्हें कोर्ट ऑफ वार्डस बंगाल में महिला सलाहकार नियुक्त किया गया. अगले तीन सालों में उन्हें बिहार, असम और उड़ीसा की जिम्मेदारी भी दे दी गयी. इस दौरान वे 500 से ज्यादा औरतों और यतीम बच्चों की मददगार बनीं. इस सबके बावजूद उनका कोर्ट में बच्चों और महिलाओं का पक्ष न रख पाना दुर्भाग्यपूर्ण था. अंततः साल 1932 में कानून बदला और महिलाओं को कोर्ट में वकालत करने की इजाजत मिल गयी. (India First Woman Lawyer)
कॉर्नेलिया को जैसे सालों से इस घड़ी का इन्तजार था. उन्होंने कलकत्ता हाईकोर्ट से वकालत की शुरुआत की लेकिन बार एसोसिएशन ने महिला होने की वजह से उन्हें सदस्यता नहीं दी. यह लड़ाई भी उन्हें जीतनी ही थी लेकिन तब पुरुषों के वर्चस्व वाले इस क्षेत्र ने उनके साथ भेदभाव करना शुरू कर दिया. लिहाजा उन्हें केस लड़ने के बजाय सलाह देने तक सीमित हो जाना पड़ा.
कॉर्नेलिया सोराबजी ने महिलाओं के कानूनी मुद्दों को उठाना जारी रखा. उन्होंने सती प्रथा का विरोध किया और विधवा पुनरुद्धार के लिए भी काम किया. 1929 में वे इंग्लैण्ड चली गयीं और जीवन का बाकी हिस्सा वहीँ बिताया. कॉर्नेलिया थीं तो आज कोर्टरूम में भी महिलायें हैं और जज की कुर्सी में भी. (India First Woman Lawyer)