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Monday, March 9, 2026
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भारत की पहली महिला अध्यापिका और जातिवाद विरोधी योद्धा

सावित्रीबाई फुले जो कि एक महान समाज सुधारक रहीं, जिन का पूरा जीवन एक योद्धा का जीवन रहा, जिन्होंने स्त्रियों की अशिक्षा, धार्मिक कुरीतियों के खिलाफ लगातार तीखा संघर्ष किया। आज उनके जन्म के 192वें वर्ष बाद यदि हम भारत में महिलाओं की समस्याओं को देखें तो पाते हैं कि जो लड़ाई सावित्रीबाई फुले ने शुरू की थी, वह अभी तक अपने मुकाम पर नहीं पहुंची है। आज भी महिलाऐं तमाम तरीकों से समाज में शोषित-उत्पीड़ित हैं। (India’s first female teacher)

आज भी वे बराबरी की जगह दोयम दर्जे की स्थिति जी रही हैं। सावित्रीबाई फुले का जीवन संघर्ष निश्चित ही आज भी महिलाओं को प्रेरणा देता है। उनका जीवन आज की भारतीय महिलाओं को कह रहा है कि वे आज की चुनौतियों का सामना करें जैसा कि उन्होंने किया।

▪️सावित्रीबाई फुले का जीवन

सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र में हुआ। महज 9 वर्ष की आयु में उनका विवाह 12 वर्षीय ज्योतिबा फुले के साथ हो गया। ज्योतिबा फुले ने सावित्रीबाई को पढ़ना-लिखना सिखाया। दोनों ने कंधे से कंधा मिलाकर सामाजिक कुरीतियों और स्त्री शिक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण कार्य किये। 1848 में पहला बालिका स्कूल खोला, जिसमें 9 बालिकाएं पढ़ती थीं। सावित्रीबाई फुले यहां की प्रथम अध्यापिका और प्रधानाचार्या रहीं। इस तरह कहा जा सकता है सावित्रीबाई फुले भारत में आधुनिक बालिका शिक्षा की पहली अध्यापिका रहीं। (India’s first female teacher)


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इसके बाद यह सिलसिला आगे बढ़ा और कई बालिका विद्यालय खोले गए। अछूत बालिकाओं के लिए अलग विद्यालय खोले गये। मजदूरों को पढ़ाने के लिए रात्रि कक्षाएं भी चलाई गईं सावित्रीबाई फुले स्त्री शिक्षा का काम ऐसे समाज में कर रही थीं जो पूरी तरह सवर्ण ब्राह्मणवाद के कोड़ से ग्रसित था। यह सवर्ण ब्राह्मणवाद स्त्रियों को पैर की जूती से अधिक कुछ नहीं समझता था। 8-9 वर्ष में ही बच्चियों की शादी कर दी जाती थी।

विधवा होने पर सर मुंडवा कर विधवा आश्रम भेज दिया जाता था। पति के मरने पर स्त्री को जिंदा जला कर उसे सती कर दिया जाता था। समाज का यह पिछड़ा हिस्सा सावित्रीबाई फुले की राहों में लगातार कांटे बिछाता रहा। सावित्रीबाई फुले इन कांटों भरी राह पर चलकर ही महानता के शिखर पर पहुंचीं। सावित्रीबाई फुले जब स्कूल जाती तो उसके ऊपर कीचड़-गोबर फेंका जाता। उन्हें गंदी गालियों का सामना करना पड़ता था। यहां तक कि उन्हें परिवार तक से निकाल दिया गया किंतु वे अपनी राह से डिगी नहीं बल्कि मजबूती से चलती रहीं। (India’s first female teacher)

स्त्री शिक्षा के साथ-साथ सावित्रीबाई फुले तमाम ब्राह्मणवादी धार्मिक कुरीतियों के खिलाफ भी लड़ी। विधवाओं को लेकर तमाम घृणित प्रथाओं के खिलाफ सावित्रीबाई फुले का लंबा संघर्ष रहा। विधवाएं समाज-परिवार के लिए अपशगुन मानी जाती थीं किंतु उन विधवाओं का तमाम ‘सम्मानित’ लोग लैंगिक उत्पीड़न करते थे। इन हालातों में यदि कोई विधवा गर्भवती हो जाती तो उसे कुल्टा चरित्रहीन कहकर उसका जीना हराम कर दिया जाता था।

ऐसे ही हालातों से घिरी एक महिला जब खुद का जीवन समाप्त करने जा रही थी तो सावित्रीबाई फुले ने उस विधवा के पुत्र को गोद लिया। प्रचलित कुरीतियों के अनुसार विधवा होने पर महिलाओं को गंजा कर दिया जाता था। सावित्रीबाई फुले द्वारा नाइयों को समझाकर विधवाओं के बाल ना उतारने को राजी किया। यह एक बड़ा आंदोलन समाज में पैदा हुआ। विधवाओं को फिर से नया जीवन शुरू करने और उनके सम्मान के लिए फुले ने अनवरत संघर्ष चलाया।(India’s first female teacher)

छुआछूत जैसी तमाम ब्राह्मणवादी सोच से भी वह लगातार लड़ती रहीं। 1852 में ‘महिला मंडल’ बनाया गया। जो उस समय का महिला आंदोलन का पहला संगठन कहा जा सकता है जिसके द्वारा स्त्रियों ने इन्हीं तमाम समस्याओं के खिलाफ संघर्ष को व्यापक किया। समाज में फैली प्लेग जैसी संक्रामक बीमारी के दौरान सावित्रीबाई और उनके दत्तक पुत्र लगातार मरीजों की सेवा करते रहे। ऐसे ही मरीजों की सेवा करने के दौरान सावित्रीबाई फुले को भी प्लेग की बीमारी लग गई और 28 नवंबर 1890 को एक महान योद्धा का निधन हो गया।


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एक महान समाज सुधारक का निधन हुआ। किंतु उनके द्वारा शुरू किए गए कामों को, उनके द्वारा देखे गये सपनों को साकार करने के लिए अभी लंबा संघर्ष बाकी है। सावित्रीबाई फुले के समय का भारत ब्रिटिश साम्राज्यवाद का गुलाम भारत था। जो सामंती ब्राह्मणवादी धार्मिक कुरीतियों की बेड़ियो में बुरी तरह जकड़ा हुआ था। इन बेड़ियों से सावित्रीबाई फुले लड़ी। समाज में चेतना पैदा हुई, संघर्ष और तीखे और व्यापक हुए। (India’s first female teacher)

अंततः भारत की मेहनतकश जनता अंग्रेजों को यहां से भगाने में कामयाब हुई किंतु आजाद भारत सामंती-ब्राह्मणवादी सोच में लिपटा एक पूंजीवादी समाज बना। इस कारण स्त्री मुक्ति का सवाल बचा रहा महिलाएं आज भी तमाम सामाजिक समस्याओं को झेल रही हैं। इन समस्याओं के खिलाफ लड़ रही जनता के लिए सावित्रीबाई की शिक्षाएं आज भी मार्गदर्शक का काम करती हैं।

नागरिक समाचार पत्र से साभार


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