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Monday, March 9, 2026
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पृथ्वी गोल है या नहीं? इसे पढ़कर खुल जाएंगे दिमाग के दरवाजे

  अशफाक अहमद-

ज़मीन स्थिर है, चपटी है और ब्रह्मांड का केंद्र है, तमाम सूरज, चांद, सितारे इसके दायें-बायें होते हैं… यह बातें आम जनमानस में मात्र चार-पांच सौ साल पहले तक एक अकाट्य फैक्ट के रूप में स्थापित रही हैं। इनपे चोट पड़नी तब शुरु हुई जब गैलीलियो और उसके बाद दूसरे लोगों ने स्पेस में झांकना शुरु किया। इसके बाद लगातार होती खोजों और नये स्थापित होते फैक्ट्स ने इन सब बचकानी बातों को पीछे छोड़ना शुरु कर दिया और सदियों तक जड़ रहे धार्मिकों की विचारधारा में भी इस हद तक बदलाव आना शुरु हुआ कि कभी गैलीलियो और ब्रूनो के लिये यातना का सबब बनने वाले ईसाइयों ने बाईबिल की अतार्किक बातों से किनारा करना शुरु कर दिया और माॅडरेट ईसाइयों में इसी अतार्किकता की वजह से धार्मिक रुझान नाम का बचा। उन्होंने नये सचों को अपनाया और वैज्ञानिक क्रांति के अगुवा बने। (Earth Round Or Not)

नये दौर में जहां अमेरिका योरप के इसाई उस जड़ता से बाहर निकल गये, वहीं अफ्रीका और एशिया के नये बने इसाई आज भी उसी जकड़न में फंसे हुए हैं, जो इस भूभाग का एक अभिशाप है। मुसलमानों में भी कुछ तबकों ने कुरान की सिंबोलिक बातों को नये अवतरित फैक्ट्स के हिसाब से एडजस्ट करने के लिये सिंबोलिक बातों के झोल का फायदा उठाते नई परिभाषाएँ गढ़ लीं, तो कुछ आज तक जड़ रहे।

हिंदुओं में सैकड़ों धर्मगुरुओं की भीड़ आज भी सामने बैठी लाखों की भीड़ को उन्हीं अतार्किक और अवैज्ञानिक बातों में उलझाये है, जो रामायण, महाभारत और पुराणों से निकली हैं। हां, कुछ लोगों ने उन बातों को रूपक, प्रतीक बता कर बचने का रास्ता खोज लिया है, तो कुछ ने मुसलमानों की तरह ही सिंबोलिक बातों को आज के नये उपलब्ध ज्ञान के हिसाब से एडजस्ट करके नई परिभाषाएँ गढ़ ली हैं.. हालांकि हिंदुओं में एक बड़ा तबका इस जड़ता से मुक्त भी हुआ है।

आज के दौर में देखेंगे तो पायेंगे कि अभी भी पुराने पीपल से लिपटे भूत बने धर्मगुरु ही वे बड़ी वजह हैं जो भारतीय भूभाग के जनमानस के वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने में बड़े बाधक रहे हैं, क्योंकि इनके पीछे एक बड़ी भीड़ होती है जो इनकी बातों को अकाट्य सत्य मानती है। स्कूल के शिक्षक बच्चों को वह ज्ञान नहीं दे पाते जो धार्मिक फ्लेवर के सहारे यह धर्मगुरु लोगों के डीएनए तक में रोपित कर देते हैं।

देश के दो बड़े धर्मों को देखें तो हिंदुओं के हर सेक्ट में ऐसे बाबाओं/गुरुओं की भरमार मिल जायेगी। मुसलमानों में जहां बाकी तबके अब दामन बचाने लगे हैं, वहीं बरेलवी तबके के लोग आज भी वहीं खड़े हैं जहां उनके एक स्थापनापुरुष अहमद रजा खाँ खड़े थे। (Earth Round Or Not)

इनके सिवा एक कबीला और भी है जो अपनी पहचान आदि किसान के रूप में दर्शाता है। इनकी चरस उन परंपरागत धार्मिकों से भी एक क़दम आगे की है, पृथ्वी गोल नहीं है, ग्रेविटी जैसी कोई चीज़ नहीं होती.. और तो और “भारत में सारा हिंदू धर्म थाइयों की देन है” से एक क़दम आगे बढ़ कर, भारत में कभी कोई मुगल-शुगल आये ही नहीं। बस अंग्रेज आये थे और उन्होंने ही सारी कहानियां लिख दीं, उन्हीं के बनवाये सब स्मारक हैं, मुगलों से सम्बंधित सारा लिटरेचर उन्हीं का लिखा हुआ है.. वगैरह-वगैरह। (Earth Round Or Not)

अब ऐसी बातों के सबूत देना, या इन पर कोई बहस करना भी फिजूल एनर्जी गंवाने जैसा ही है, लेकिन हम इनकी उन बातों को साथ में काउंट करके बात कर सकते हैं जो पृथ्वी के संदर्भ में भारतीय भूभाग के दूसरे धर्मगुरु या यह मौलाना साहब कह रहे हैं।

पृथ्वी का शेप साईज क्या है, यह जब तक नहीं पता था तब तक अंदाजे लगाना ठीक था, लेकिन अब उसी पर टिके रहने का कोई मतलब नहीं जब इंसान पृथ्वी की सीमा से बाहर अपने यान भेज चुका है, सेटेलाईट स्थापित कर चुका है, और तो और खुद स्पेस स्टेशन बना कर रह रहा है। अब यह कहने का कोई मतलब नहीं कि आप साईंस की मानेंगे या कुरानों हदीस की, अब वह मानिये साहब जो आपकी आँखों के सामने है, जिसे आप खुद से देख-परख सकते हैं। समझना चाहें तो कुछ प्वाइंट से समझ सकते हैं… (Earth Round Or Not)

पृथ्वी का शेप गोल है या नहीं, यह समझने के लिये दिन रात क्यों होते हैं, हर साल एक निश्चित समय पर मौसम क्यों रिपीट होते हैं, समंदर में दूर जब कोई चीज दिखती है तो उसका ऊपरी हिस्सा पहले क्यों दिखता है, जैसे मोटे-मोटे सवालों के जवाब में हल तलाश सकते हैं। अब कम से कम दिन रात क्यों होते हैं के जवाब में इस बेवकूफी से तो पार आ जाइये कि सूरज पृथ्वी के चक्कर लगा रहा है— किसी ऑब्जर्वेट्री में जा कर टेलिस्कोप के माध्यम से अपने सोलर सिस्टम के दूसरे ग्रहों को अपनी ख़ुद की आँखों से देख कर, बुद्धि का प्रयोग करते हुए यह अंदाजा लगा सकते हैं कि अगर बाकी सारे पिंड गोल हैं, तो अपने ग्रह ने ऐसी कौन सी खता की होगी जो गोल न हो.. साथ ही अगर सूरज अपनी जगह स्थिर है और बाकी पिंड उसके चक्कर लगा रहे हैं तो हमारा ग्रह क्यों नहीं ऐसा करेगा। ज्यादा डीप काॅस्मोलाॅजी नहीं समझ सकते, तो यह मोटे-मोटे बेसिक फंडे तो समझ ही सकते हैं।

आँखों देखी को ठुकरा कर अगर कुरानो हदीस पर ही जायेंगे तो हो सकता है कि हदीस में आपको यह भी पढ़ने को मिल जाये कि सूरज शाम को खुदा के सिंहासन के पीछे छिप जाता है और सुबह खुदा के हुक्म से निकलता है। सूरज कहीं नहीं छुपता, पृथ्वी उसके सामने गोल घूमती है— इसे परखने का सिंपल तरीका है कि पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद अपने जानने वालों से फोन पर उनके यहां का समय पता कर लीजिये और एक चार्ट में वह सारे टाईम नोट कर लीजिये। देखिये कि कैसे जब आपके सर पर सूरज होता है तो किसी हिस्से में कैसे आधी रात का वक़्त होता है। इससे न सिर्फ आपको पृथ्वी का घूर्णन पता चल जायेगा बल्कि इसके शेप और साइज का भी मोटा-मोटा अंदाजा हो जायेगा।

एक दूसरा तरीका यह भी है कि पृथ्वी के कक्ष में ढेरों मानव निर्मित उपग्रह स्थापित किये गये हैं, जो कम्यूनिकेशन, मौसम, मनोरंजन जैसी ढेरों चीज़ें उपलब्ध करा रहे हैं— समझिये कि इन्हें स्थापित करने के लिये एग्जेक्ट कैलकुलेशन की जरूरत होती है जो उसी आधार पर निकाली जाती है, जो पृथ्वी के शेप साईज के संदर्भ में साईंस के जरिये जाना गया है।

इन सेटेलाईट के माध्यम से खुद भी देख सकते हैं। हां, एक बात और कि गोल एक जनरल वे में कहा जाता है, एक्चुअल गोल नहीं होते यह पिंड, बल्कि निरंतर घूर्णन की वजह से अपने ध्रुवों पर थोड़ा दबे हुए होते हैं और इनके बीच वाले भाग पर एक इक्वीटोरियल बल्ज निकल आता है। (Earth Round Or Not)

इसी तरह ग्रेविटी पर जो लोग सवाल उठाते हैं, उन्हें समझना चाहिये कि पृथ्वी से बाहर निकलने, राॅकेट छोड़ने के लिये जो एस्केप विलाॅसिटी चाहिये होती है, वह ग्रेविटी की कैलकुलेशन के हिसाब से ही तय होती है और उसी के आधार पर सफल प्रक्षेपण हो पाते हैं।

पुरातन धारणाओं में जकड़े लोग अक्सर इस सवाल से भी जूझते है कि पृथ्वी घूम रही है, या नहीं.. उन्हें लगता है कि अगर घूम रही होती तो हमारे उछलने पर हमारे नीचे की ज़मीन बदल जाती, या भारत के आसमान में किसी जहाज के पहुंचने पर जमीन घूमने से अमेरिका खुद ही जहाज के नीचे आ जाता, या आसमान की तरफ उड़ा धुआं, पृथ्वी की गति के हिसाब से तो कुछ ही मिनटों में अमेरिका पहुंच जाता।

एक्चुअली इन सवालों के जवाब भी ग्रेविटी और जड़त्व के नियम में हैं, लेकिन सरल तरीके से समझना चाहें तो ट्रेन या बस से समझ सकते हैं। एक सौ किलोमीटर की गति से दौड़ती बस/ट्रेन के अंदर आप सामान्य रूप से कैसे चल फिर पाते हैं? अगर वहां ऊपर उछलते हैं तो क्या वापस उसी जगह नहीं गिरते, जहां से उछले थे? तब तो बस या ट्रेन आपके नीचे से नहीं निकल जाती? (Earth Round Or Not)

बस ऐसे ही पृथ्वी की ग्रेविटी, घूर्णन और जड़त्व वगैरह काम करते हैं कि सिर्फ पृथ्वी ही नहीं, उसके आसपास का पूरा वातावरण इस तरह साथ में घूम रहा होता है कि आप जमीन पर इस घूर्णन को महसूस ही नहीं कर सकते।

जैसे आपको लगता है कि सूरज एक जगह स्थिर है और उसके आसपास के सारे पिंड उसकी परिक्रमा कर रहे हैं एक सीमित क्षेत्र में.. जबकि सच यह है कि सूरज अपने परिवार समेत एक अकल्पनीय गति से भाग कर अपनी गैलेक्सी के केंद्र की परिक्रमा कर रहा है, लेकिन इस गति को इस सोलर सिस्टम के अंदर रहते आप महसूस ही नहीं कर सकते। (Earth Round Or Not)

(लेखक साइंस फिक्शन पर आधारित कई चर्चित किताबों के लेखक हैं, लेख उनकी फेसबुक वॉल से साभार)

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