Indus News TV Live

Thursday, March 12, 2026
spot_img

इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद : फिलिस्तीन के खिलाफ नरसंहार का आरोप

– Abdullah Mansoor

शनिवार 4 Oct 2023 को हमास ने इजराइल के ख़िलाफ़ ‘अल-अक़्सा स्टॉर्म’ अभियान छेड़ दिया। हमास की इस कार्रवाई ने किसी भी प्रकार से फिलिस्तीन का भला नहीं किया है। हमास को पहले से पता था वह एक ऐसा युद्ध छेड़ रहे हैं जिसमें वह हार जाएंगे और उनके इस कृत्य की सज़ा मासूम फ़िलिस्तीनियों को चुकानी होगी। दो महीनों में, मरने वालों की संख्या सात गुना से अधिक बढ़ गई है, 17 दिसंबर तक 19,000 से अधिक फिलिस्तीनी , जिनमें ज्यादातर महिलाएं और बच्चे थे इजरायली सैनिकों द्वारा मारे गए हैं। अब यह संख्या 24000 से ज़्यादा हो चुकी है। फिर यह सवाल तो बनता ही है कि आखिर इस हमले से लाभ क्या हुआ ? इसको समझने से पहले इस क्षेत्र का इतिहास समझते हैं। (Israel Palestine Conflict)

इज़राइल का इतिहास

फिलिस्तीन का विवाद उतना ही पुराना है जितना पुराना इन धर्मों का इतिहास है। फिर भी अगर इस विवाद को संक्षिप्त रूप से समझने की कोशिश करें तो इसकी शुरुआत हमें 19वीं शताब्दी से करनी होगी। 19वीं सदी के दौरान जब एंटी सेमेटिक विचार यहूदियों के नरसंहार का कारण बन रहा था ठीक उसी वक़्त यह विचार भी पैदा हुआ कि यहूदी “Land Without a People”।

19वीं सदी में, एक ऑस्ट्रो-हंगेरियन यहूदी पत्रकार, थियोडोर हर्ज़ल ने यहूदियों के लिए फिलिस्तीन में एक यहूदी मातृभूमि के विचार का प्रचार किया। इस विचार को ज़ायोनीज़्म के नाम से जाना गया। ऐतिहासिक रूप से यह बात सही नहीं थी क्योंकि यहूदी पहले से ही फिलिस्तीन में रह रहे थे।

19वीं सदी में,इज़राइल/फिलिस्तीन क्षेत्र में लगभग 87% मुस्लिम, 10% ईसाई और 3% यहूदी जनसंख्या थी। यहां इस बात को समझ लें कि ज़ायोनीज़्म एक राजनीतिक और राष्ट्रवादी विचारधारा है जो 19वीं सदी के अंत में उभरा। इस विचारधारा में धर्मनिरपेक्ष से लेकर धार्मिक और वामपंथी से लेकर दक्षिणपंथी तक कई प्रकार की विचारधाराएं शामिल हैं। (Israel Palestine Conflict)

द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले, 1917 की बाल्फोर घोषणा में फिलिस्तीन में “यहूदी लोगों के लिए राष्ट्र ” की स्थापना के लिए ब्रिटेन ने समर्थन व्यक्त किया। याद रहे उस वक़्त फिलिस्तीन ब्रिटेन का उपनिवेश ही था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यहूदियों के नरसंहार की भयावहता के कारण बच गए यहूदी लोगों के प्रति अंतर्राष्ट्रीय सहानुभूति बढ़ गई। मातृभूमि की मांग के कारण यहूदियों का इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में आगमन हुआ। इस घटना को “आलियाह” कहा जाता है।

आलियाह इजरायल में यहूदी आप्रवासन के लिए हिब्रू शब्द है। इसका उपयोग अक्सर यहूदियों द्वारा अन्य देशों से इजरायल जाकर स्थायी रूप से बसने के वर्णन करने के लिए किया जाता है। बड़ी संख्या में यहूदियों के आने से जब तनाव बढ़ गया तो अंग्रेजों ने समस्या को नव स्थापित संयुक्त राष्ट्र को सौंप दिया।1947 में, संयुक्त राष्ट्र ने फिलिस्तीन को विभाजित करके अलग फिलिस्तीनी और यहूदी राज्यों की स्थापना करने के लिए मतदान किया। इस योजना को अरबों ने अस्वीकार कर दिया।

14 मई, 1948 को यहूदी एजेंसी के प्रमुख डेविड बेन-गुरियन ने इजरायल राज्य की स्थापना की घोषणा की जिसके बाद से तनाव बढ़ गया। 1948 का युद्ध,1967 में छह दिवसीय युद्ध, 1973 में योम किप्पुर युद्ध, 1987 में पहला फ़िलिस्तीनी इंतिफ़ादा, 2000 में दूसरा फ़िलिस्तीनी इंतिफ़ादा, प्रथम लेबनान युद्ध 6 जून 1982- 5 जून 1985 तक हुआ दूसरा लेबनान युद्ध 2006, इस तरह आज तक यह क्षेत्र तनाव से घिरा हुआ है।

इजरायल खुद को “डेविड और गोलियथ” के मिथक से जोड़ता है। मिथक की उत्पत्ति डेविड की बाइबिल कहानी से हुई है, जो एक युवा चरवाहा था जिसने अपने गोफन के एक ही पत्थर से विशाल योद्धा गोलियथ को हरा दिया था। हास्यास्पद है कि फिलिस्तीन की 80% भूमि के साथ, उन्नत हथियार, एक उच्च प्रशिक्षित सेना और मजबूत अंतरराष्ट्रीय समर्थन के साथ भी इजरायल खुद को कमज़ोर चरवाहा साबित करने में सफल रहा है क्योंकि उसके पास अंतर्राष्ट्रीय मीडिया का समर्थन है इसीलिए आईडीएफ द्वारा कथित मानवाधिकारों के हनन और अंतर्राष्ट्रीय कानून के उल्लंघन की घटनाओं को नजरअंदाज किया जाता रहा है। आज भी इस युद्ध की रिपोर्टिंग गाज़ा से नहीं तेल अवीव से हो रही है। (Israel Palestine Conflict)

गाज़ा में हमास

गाज़ा में अमानवीय स्थितियां एक लंबे समय से चली आ रही रही हैं। यह आज के युद्ध का परिणाम नहीं है। गाजा 2007 से मुख्य रूप से इज़राइल और मिस्र द्वारा नाकाबंदी के अधीन है। यह नाकाबंदी गाज़ा के अंदर और बाहर लोगों, वस्तुओं और सेवाओं की आवाजाही को प्रतिबंधित करती है, चेक पोस्ट पर क्या गाज़ा में जाएगा इससे लंबी सूची इस बात की होती है कि गाज़ा में क्या नहीं जाएगा? जैसे घर बनाने के लिए सीमेंट नहीं जाएगी, बहुत सी दवाएं नहीं जाएगी, किसी मरीज़ का इलाज करना है तो इज़राइल से पर्मिट लगेगा।

इस नाकेबंदी से इस क्षेत्र के लोगों की आवश्यक संसाधनों तक पहुंच सीमित हो जाती है। गाज़ा दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में से एक है, जहां एक छोटे से क्षेत्र में 2 मिलियन से अधिक लोग रहते हैं। यह भीड़भाड़ बुनियादी ढांचे, आवास और बुनियादी सेवाओं पर अत्यधिक दबाव डालती है। गाज़ा में बार-बार बिजली कटौती एक दैनिक वास्तविकता है। (Israel Palestine Conflict)

वर्षों के संघर्ष, अस्थिरता और प्रतिबंधित जीवन स्थितियों ने आबादी के मानसिक स्वास्थ्य पर, विशेषकर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला है। नाकेबंदी के कारण गाज़ा पट्टी में बेरोजगारी और गरीबी का सामना करना पड़ता है, यह बात सर्वविदित है कि जहां मानवाधिकार का हनन होता है वहां हिंसा का जन्म होता है।

फ़िलिस्तीनियों का तर्क है कि उन्हें आत्मरक्षा का अधिकार है। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत, राष्ट्रों और राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों को आत्मरक्षा का अधिकार है। यह अधिकार संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 में निहित है। यह सशस्त्र हमले के जवाब में बल प्रयोग की अनुमति देता है। पर हमास जैसे कुछ फिलिस्तीनी समूहों द्वारा हिंसा का उपयोग, जैसे आत्मघाती बम विस्फोट या इजरायली नागरिकों को निशाना बनाने वाले रॉकेट हमलों की कई देशों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों द्वारा आतंकवाद के रूप में व्यापक रूप से निंदा की गई है। जिसे आतंकवाद कहा जाता है वह ‘स्वीकृत हिंसा’ के दायरे में नहीं आता।

दिलचस्प बात यह है कि इस ‘अस्वीकृत हिंसा’ जिसे आतंकवाद की श्रेणी में रखा गया है और ‘स्वीकृत हिंसा’ जिसमें सरकार चाहे तो किसी भी प्रकार का दमन कर सकती है, के बीच विभाजक रेखा बेहद महीन है। एक व्यक्ति की हत्या आतंकवाद कहा जा सकता है और एक लाख लोगों की हत्या को युद्ध।

हमास की बात करते हैं। इसकी स्थापना 1980 के दशक के अंत में प्रथम इंतिफादा के दौरान हुई थी, जो कि इजरायली कब्जे के खिलाफ एक फिलिस्तीनी विद्रोह था। यह एक जमीनी स्तर के आंदोलन के रूप में उभरा और इसे विशेष रूप से गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक में समर्थन मिला। (Israel Palestine Conflict)

2006 में, हमास ने फिलिस्तीनी विधान परिषद चुनावों में बहुमत हासिल किया, जिससे गाजा पट्टी पर उसका शासन स्थापित हो गया। इससे गाजा पर नियंत्रण रखने वाले हमास और वेस्ट बैंक में नियंत्रण बनाए रखने वाले फिलिस्तीनी प्राधिकरण (फतह) के बीच विभाजन हो गया।

2006 में शुरू हुई लड़ाई में हमास ने 2007 में फतह (पीएलओ को नियंत्रित करने वाला राजनीतिक समूह) को हराया था। हमास (जिसे कई लोग आतंकवादी समूह मानते हैं) 2008, 2012 और 2014 में विशेष रूप से महत्वपूर्ण लड़ाइयों के साथ इज़राइल के साथ लड़ रहा है। इस हमले के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारण है कि हमास अपनी महत्त्व को साबित करना चाहता है।

हमास का हालिया हमला इजरायल के साथ शांति समझौते की मांग करने वाले अरब देशों की बढ़ती प्रवृत्ति से प्रभावित हो सकता है, जिसका उदाहरण 2020 अब्राहम समझौता है, जिसमें सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, सूडान और मोरक्को शामिल हैं। ऐसी अटकलें भी हैं कि यूएई के बाद सऊदी अरब इज़रायल के साथ शांति समझौते पर विचार कर रहा है। ऐसे में अरब देशों की इज़रायल से नज़दीकिया घटेंगी और हमास और फिलिस्तीनियों के प्रति सहानुभूति बढ़ेगी। (Israel Palestine Conflict)

लेही और इरगुन: इज़राइल के आतंकवादी संगठन जिसे भुला दिया गया

अब लोगों को याद भी नहीं होगा कि इरगुन नाम का एक आतंकवादी संगठन इज़राइल के बनने से पहले काम करता था। जिसे आधिकारिक तौर पर इरगुन ज़वई लेउमी के नाम से जाना जाता है, यह 1931 से 1948 तक सक्रिय था। इसका लक्ष्य फ़िलिस्तीन में एक यहूदी राज्य की स्थापना करना था। यह ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध में शामिल होने और बमबारी और हमलों सहित अपने विवादास्पद कार्यों के लिए जाना जाता था जैसे फिलिस्तीनी बस्तियों को खाली करा कर याहूदी सेटेलमेंट बनाना।

1946 में यरूशलेम में किंग डेविड होटल पर बमबारी हुई, जिसमें बहुत से फिलिस्तीनी और ब्रिटिश नागरिकों की मौत हुई। यह घटना उस वक़्त की 9/11 जैसी घटना थी। इरगुन के सदस्य खुद को स्वतंत्रता सेनानियों के रूप में देखते थे पर ब्रिटिश अधिकारियों और अन्य लोगों द्वारा उन्हें आतंकवादी ही माना जाता था। इरगुन ने एक और बड़ी आतंकवादी घटना 9 अप्रैल, 1948 को अंजाम दी, इस दिन फ़िलिस्तीनी अरब गांव ‘दीर यासीन’ पर हमला किया था।

हमले का मकसद इस क्षेत्र में यहूदी बस्तियां बसाना था।हमला इतना भयावह था कि फिलिस्तीनी अपने घरों को ताला लगाकर जान बचाकर भागे इस जबरन विस्थापन और बेदखली को “नकबा” कहा जाता है जिसका अरबी में अर्थ है “तबाही”। (Israel Palestine Conflict)

1948 में इज़राइल राज्य की स्थापना के बाद, मेनकेम बेगिन, जो इरगुन के एक प्रमुख नेता थे, एक अर्धसैनिक नेता से एक राजनीतिक नेता बन गए। उन्होंने हेरुट नामक राजनीतिक दल की स्थापना की, जो इरगुन की विचारधारा और लक्ष्यों से जुड़ा था। हेरुट का बाद में लिकुड पार्टी में विलय हो गया। इज़राइल में बेगिन का राजनीतिक करियर महत्वपूर्ण था, और वह 1977 में इजरायल के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने 1983 तक प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया।

“लेही” का पूरा नाम “लोहामेई हेरुट इज़राइल” है, जिसका अंग्रेजी में अनुवाद “फाइटर्स फॉर द फ़्रीडम ऑफ़ इज़राइल” है। इस संगठन ने बैरन मोयने, जिन्हें वाल्टर गिनीज के नाम से भी जाना जाता की ह्त्या की थी। बैरन मोयने ने इज़राइल की स्थापना में ब्रिटिश नीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान मध्य पूर्व में रेजिडेंट ब्रिटिश मंत्री के रूप में, वह फिलिस्तीन में ब्रिटिश नीतियों को आकार देने में शामिल थे।

वह यहूदियों के हमदर्द थे और व्यवस्थित रूप से इज़राइल राज्य की स्थापना करना चाहते थे। हर साल कितने यहूदी फिलिस्तीन आकर बसेंगे, इस पर बैरन मोयने कंट्रोल रख रहे थे। यही बात ज़ायोनिस्ट आतंकवादियों को बुरी लगी, यह संगठन फिलिस्तीन के विनाश में ही इज़राइल का विकास देख रहे थे। लेही के दो आतंकवादियों एलियाहू बेट-ज़ुरी और एलियाहू हकीम ने बैरन मोयने की ह्त्या कर दी।

एलियाहू बेट-ज़ुरी और एलियाहू हकीम को सज़ा ए मौत दे दी गई पर 1975 में मरणोपरांत इनको “इज़राइल के हीरो” के रूप में अलंकृत किया गया, यह पुरस्कार इज़राइली सरकार द्वारा लॉर्ड मोयने की हत्या में उनके कार्यों को मान्यता देने के लिए दिया गया था। जिसे उन्होंने इज़रायली स्वतंत्रता के लिए एक महत्वपूर्ण योगदान के रूप में देखा। इज़राइल के गठन के बाद, लोहामेई हेरुत इज़राइल (लेही) लेही के कई सदस्य नवगठित इज़राइल रक्षा बलों (आईडीएफ) या अन्य सरकारी संस्थानों में शामिल हो गए। कुछ सदस्य राजनीतिक दलों में शामिल हो कर सरकार चलाने लगे। (Israel Palestine Conflict)

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में इज़राइल के खिलाफ नरसंहार का आरोप

नरसंहार ऐसी स्थिति नहीं है जो रातोंरात या बिना किसी चेतावनी के घटित हो जाए। नरसंहार के लिए संगठन की आवश्यकता होती है और यह वास्तव में एक सोची-समझी रणनीति होती है। यह रणनीति प्रायः सरकारों या राज्य तंत्र को नियंत्रित करने वाले समूहों द्वारा अपनाई जाती है। इसको ऐसे समझें क्या हिटलर ने होलोकॉस्ट सत्ता में आते ही शुरू कर दिया था? कोई भी जनसंहार फ़ौरन शुरू नहीं होता, उसके लिए माहौल बनाया जाता है।

हमने यह रवांडा और टुल्सा जनसंहार में भी देखा था। यहूदियों का जनसंहार भी फ़ौरन शुरू नहीं हुआ था। इस जनसंहार की भूमिका कई दशकों से तैयार हो रही थी। हिटलर ने बस उसे अमली जामा पहनाया था। हिटलर ने किस तरह होलोकास्ट को अंजाम दिया इसको समझने का सबसे अच्छा तरीका यह कि होलोकॉस्ट शुरू होने से पहले बनाए गए तमाम एंटी-सेमेटिक क़ानूनों को देखा जाए।

अध्ययन करने पर आप पाते हैं कि हिटलर ने बड़े सिलसिलेवार ढंग से यहूदियों के मुकम्मल दमन के इरादे को अंजाम दिया। यहूदियों की नरसंहार के बाद एक अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की सर्वोच्च अदालत के रूप में स्थापित किया गया, जिसे राज्य विवादों को निपटाने के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हेग, नीदरलैंड में स्थापित किया गया था। यह अदालत युद्ध अपराध और जनसंहार जैसे मामलों की जांच भी करती है।

हेग स्थित संयुक्त राष्ट्र की शीर्ष अदालत, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ)में वर्तमान में इज़राइल के खिलाफ नरसंहार के आरोपों की जांच कर रही है। यह कदम दक्षिण अफ़्रीकी सरकार द्वारा इज़राइल पर गाजा में फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ “नरसंहार करने वाले” कृत्य करने का आरोप लगाने के बाद उठाया गया है। अदालत ने यह भी स्वीकृति दी है कि दक्षिण अफ्रीका को इज़राइल के खिलाफ यह दावा लाने का अधिकार है क्योंकि नरसंहार कन्वेंशन के पक्षकार सभी देशों का नरसंहार की रोकथाम, दमन और सज़ा सुनिश्चित करने में साझा हित है।

संयुक्त राष्ट्र (UN) के अनुसार, नरसंहार एक ऐसा विनाश है जो किसी जातीय, नस्लीय, धार्मिक या राष्ट्रीय समूह को मंशापूर्ण और व्यवस्थित तरीके से नष्ट करता है। इसमें सामूहिक हत्या, जबरन स्थानांतरण और कठोर जीवन दशाएं शामिल हो सकती हैं, जो व्यापक रूप से मृत्यु का कारण बनती हैं। (Israel Palestine Conflict)

संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा के अनुसार, नरसंहार के अपराध में मानसिक तत्व और भौतिक तत्व शामिल होते हैं। मानसिक तत्व में राष्ट्रीय, जातीय, नस्लीय या धार्मिक समूह के पूर्ण या आंशिक नष्ट की मंशा शामिल है, जबकि भौतिक तत्व में समूह के सदस्यों की हत्या, गंभीर शारीरिक या मानसिक क्षति, और समूहों पर ऐसी जीवन दशा थोपना भी शामिल है जो व्यवस्थित तरीके से उस समूह को मृत्यु के करीब ले जाए।

गाज़ा में इज़राइली सेनाओं द्वारा बड़ी संख्या में फिलिस्तीनियों, विशेषकर बच्चों की हत्या, उनके घरों का विनाश, उनका निष्कासन और विस्थापन हो रहा है। इसमें गाज़ा पट्टी में भोजन, जल एवं चिकित्सा सहायता पर नाकाबंदी लागू करना, गर्भवती महिलाओं एवं शिशुओं की जीविता के लिये महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं को नष्ट करने के माध्यम से फिलिस्तीनी जन्म को रोकने के उपायों में शामिल है। यह सारे गतिविधि जनसंहार के दायरे में आती है।

अदालत के अध्यक्ष जोन ई. डोनॉग्यू ने कहा, “अदालत इस क्षेत्र में सामने आ रही मानवीय त्रासदी की सीमा से भली-भांति परिचित है और जीवन की निरंतर हानि और मानवीय पीड़ा के बारे में गहराई से चिंतित है।” दक्षिण अफ्रीका ने अदालत से कहा था कि वह इजरायल से “गाजा में और उसके खिलाफ अपने सैन्य अभियानों को तुरंत निलंबित करने के लिए कहे।” हालांकि, अदालत ने दक्षिण अफ्रीका की याचिका को अस्वीकार कर लिया और युद्धविराम को लेकर कोई आदेश नहीं दिया। (Israel Palestine Conflict)

दक्षिण अफ़्रीका ने ICJ से मांगा है कि ‘अनंतिम उपायों’ (provisional measures) का इस्तेमाल करके इज़राइल को गाज़ा पट्टी में अपराध से रोकने के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं। उनका तर्क है कि ‘जेनोसाइड कन्वेंशन’ के तहत फिलिस्तीनी लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए अनंतिम उपाय आवश्यक है।

यहां इस बात को समझें की यहूदी विशेषत: इजरायल राष्ट्र खुद को जनसंहार का विक्टिम बताते आया है अब उसे पर जनसंहार करने का आरोप लगा है। ऐसे में भले ही इजरायल अमेरिकी और उसके दूसरे यूरोपीय दोस्तों द्वारा बचा लिया जाए फिर भी यह आप उसकी विक्टिमहूड की छवि को पूरी तरह बदल देगा।

भारत सरकार का पक्ष

भारत ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद लंबे समय तक इज़राइल के साथ किसी कूटनीतिक संबंध का संचयन नहीं किया, जिससे प्रकट होता है कि भारत फिलिस्तीन के पक्ष में था। हालांकि, 1992 में भारत औपचारिक रूप से इजराइल के साथ संबंध बनाया और अब ये संबंध रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। फिलिस्तीन की समस्याओं के प्रति भारत की सहानुभूति है, और फिलिस्तीनियों के साथ मित्रता बनाई रखी है, जो भारतीय विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

भारत ने फिलिस्तीन से संबंधित कई प्रस्तावों का समर्थन किया है, जैसे कि संयुक्त राष्ट्र परिसर में फिलिस्तीनी ध्वज लगाने का समर्थन। भारत ने इजराइल का भी समर्थन किया है, और दोनों देशों के साथ अपनी संतुलित नीति बरकरार रखी है। शनिवार को आतंकी संगठन हमास द्वारा इजरायल पर किए गए हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इजराइल के साथ एकजुटता व्यक्त की थी।

पीएम मोदी ने इसे ‘आतंकवादी हमला’ बताकर इसकी कड़ी निंदा की थी। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, ‘इजरायल में आतंकवादी हमलों की खबर से गहरा सदमा लगा है। हमारी संवेदनाएं और प्रार्थनाएं निर्दोष पीड़ितों और उनके परिवारों के साथ हैं। इस कठिन घड़ी में हम इजरायल के साथ एकजुटता से खड़े हैं।’ आज जब इजरायल पर जनसंहार का मामला दर्ज हुआ है तो भारत इसराइल से युद्ध विराम करने की और उसे क्षेत्र में शांति बहाल करने की सिफारिश कर रहा है। (Israel Palestine Conflict)

तेल अवीव के लिए भारत का अटूट समर्थन भारत के सुरक्षा हितों पर आधारित है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत की मध्य पूर्व नीति में जो सबसे महत्वपूर्ण बदलाव आया है वह है- क्षेत्रीय कूटनीति का धर्म से अलगाव। भारत सरकार यह समझती है कि फिलिस्तीन इज़राइल का संघर्ष यहूदी-मुसलमान संघर्ष नहीं है।

2017 में भारतीय प्रधानमंत्री ने पहली बार इज़राइल का दौरा किया और 2018 में वे पहली बार फ़िलिस्तीन की आधिकारिक यात्रा की। भारत ने 2017 में एकतरफा मतदान करके पूरे यरूशलम को इज़राइल की राजधानी घोषित करने के प्रयास का खंडन किया। भारतीय नीति में स्पष्टता है- वह आतंकवाद की निंदा करता है, लेकिन अंधाधुंध प्रतिशोधात्मक बमबारी का समर्थन नहीं करता। इज़राइल-फ़िलिस्तीन संघर्ष पर भारत की आधिकारिक धारा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, और भारत दोनों देशों को अच्छे पड़ोसी के रूप में मानता है।

आगे का रास्ता क्या हो?

एक समाधान जिसे भारत सहित कई देश मानते हैं वह यह है कि दो अलग और स्वतंत्र राज्यों का गठन हो इज़राइल और फ़िलिस्तीन। इज़राइल तो बन चुका है तो अब फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र राज्य बनाने की ओर कदम बड़ाना होगा। अरब देश जब तक इजरायल के अस्तित्व को नहीं मानते तब तक यह संभव नहीं। भारत, संयुक्त राष्ट्र, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोपीय संघ और रूस जैसे अंतर्राष्ट्रीय अभिनेता बातचीत की सुविधा प्रदान कर सकते हैं और विवादों में मध्यस्थता करने में मदद कर सकते हैं।

बातचीत का लक्ष्य दोनों राज्यों की भौगोलिक सीमाओं को परिभाषित करना होगा। संघर्ष के दौरान विस्थापित हुए फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों का मुद्दा जटिल और भावनात्मक है। समाधान में वित्तीय मुआवजा, नए फ़िलिस्तीनी राज्य में पुनर्वास, या आपसी समझौते के अधीन शरणार्थियों को अपने पैतृक घरों में लौटने की अनुमति देना शामिल हो सकता है। एक समाधान में नई यहुदी बस्तियों के निर्माण को रोकना और संभावित रूप से कुछ मौजूदा बस्तियों को हटाना शामिल होगा ताकि एक फ़िलिस्तीनी राज्य की स्थापना की जा सके।

बुनियादी ढांचे, शिक्षा और नौकरी के अवसरों में निवेश इज़राइल और फिलिस्तीन दोनों की आर्थिक स्थिरता में योगदान दे सकता है और दोनों पक्षों के बीच विश्वास पैदा कर सकती हैं। दोनों राज्यों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सर्वोपरि है। इज़राइल को आतंकवाद रोकने की चिंता है तो फिलिस्तीन को अपनी संप्रभुता और सुरक्षा की, सुरक्षा उपायों में फिलिस्तीनी राज्य का विसैन्यीकरण, अंतर्राष्ट्रीय शांति सेना की मौजूदगी और संयुक्त सुरक्षा व्यवस्था शामिल होना हो सकता है। किसी समझौते पर पहुंचने के बाद शांति स्थापित करने और बनाए रखने के लिए दीर्घकालिक प्रयासों की आवश्यकता होती है। (Israel Palestine Conflict)

आतंक का स्त्रोत कुछ भी हो, युद्ध किसी भी पक्ष द्वारा शुरू किया गया हो या किस देश व संगठन को कितना समर्थन प्राप्त है ये सारी बातें बेबुनियाद सी लगती हैं जब इंसानियत सिसक रही हो। ये बहुत ही आसान है मीडिया द्वारा एक देश का पक्ष ले लेना, इतिहास की घटनाएं गिनवा कर सही और गलत का सिरा बुन लेना। पर असल में बम और गोलाबारी में अनाथ होते बच्चे और जवाबी कार्रवाई में होने वाले जुल्म को सही और गलत से कोई वास्ता नहीं होता, उनकी जिंदगी अब रोज की आज़माइश है और उनके सवालों का जवाब कोई नहीं देना चाहता।

क्या हम कभी एक जमीन के टुकड़े पर रहने वालों की भूख और तकलीफ पर बात करने लायक हो सकेंगे, इस सवाल को किनारे करके कि वो जमीन किसके हक में जाना चाहिए? वैश्विक पटल पर ये घटनाएं हमें खबर की तरह न लेते हुए सबक की तरह लेना चाहिए और समाधान के तौर पर इंसानी मूल्यों को तरजीह देनी चाहिए, दोनों ही तरह के आतंक को खारिज करना चाहिए।

(लेखक, पसमांदा एक्विस्ट तथा पेशे से शिक्षक हैं। Youtube चैनल Pasmanda DEMOcracy के संचालक भी हैं।)


यह भी पढ़ें: इस्लाम का जन्म और विकास : पुस्तक समीक्षा


(आप हमें फेसबुक पेजइंस्टाग्रामयूट्यूबट्विटर पर फॉलो कर सकते हैं।)

Related Articles

Recent