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Thursday, March 12, 2026
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कांशीराम साहब ने सीएम दिग्विजय सिंह से कहकर ख़त्म कराए थे वीरांगना फूलन देवी के सभी मुकदमे – दद्दू प्रसाद, पूर्व मंत्री

10 अगस्त 1963 वीरांगना फूलन देवी सांसद मिर्जापुर का जन्मदिन है. वीरांगना फूलन देवी वास्तव में संघर्ष के जीती जागती मिशाल थीं. जिसने ना केवल शूद्रों के अपमान के खिलाफ बल्कि नारी समुदाय के अपमान के खिलाफ लड़ने की शक्ति पैदा की. एक रास्ते का निर्माण किया. उसका विश्वास लोकतंत्र में था, शांति और अहिंसा में था; परंतु जब लोकतंत्र को कुचला गया तो उसने बंदूक का रास्ता भी चुन कर दिखाया. और उसमें विजय प्राप्त किया.

उसने साबित किया कि जहां पर सहनशीलता की सीमा समाप्त होती है वहीं पर क्रांति का उदय होता है. जुल्म करने वाले से जुल्म सहने वाला ज्यादा कसूरवार होता है. हम जो ज़ुल्म को सहते हैं इसलिए जालिम का हौसला बढ़ता है, और वह भारी से भारी जुल्म करता है. जुल्म के खिलाफ यदि हम पलट कर खड़े हो जाएं तो जालिम भागता हुआ नजर आता है. वह हमारा मुकाबला नहीं कर सकता है. आवश्यकता हमें पलटी मारने की है, बदल कर खड़े होने की है.

यह सब फूलन देवी ने अपने जीवन में करके दिखाया था. उन्होंने बैलेट और बुलेट दोनों के रास्ते पर विजय प्राप्त करके दिखाई. वीरांगना फूलन देवी इतनी साहसी बहादुर और महान थीं कि बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम जी भी उसके ऊपर गर्व करते थे, ग्वालियर जेल में अनेकों बार अपने संदेश वाहकों के माध्यम से पत्राचार किया पूर्व सांसद मा. विशंभर प्रसाद निषाद इसके गवाही और संदेशवाहक हैं.

दिसंबर 1993 में जब मध्यप्रदेश में कांग्रेस पार्टी की अल्पमत की सरकार बनी और दिग्विजय सिंह उसके मुख्यमंत्री बने तो बहुजन समाज पार्टी के 11 विधायकों का भी समर्थन दिग्विजय सिंह सरकार को मिला. मान्यवर कांशीराम जी का दिग्विजय सिंह से एक ही आग्रह था की फूलन देवी को जेल से रिहा करने के लिए मध्यप्रदेश में फूलन देवी के ऊपर चलाए जा रहे सभी मुकदमें वापस किए जाएं और तत्कालीन दिग्विजय सिंह की सरकार को बसपा विधायकों का समर्थन प्राप्त करने के लिए फूलन देवी के ऊपर चलाए जा रहे सभी मुकदमे मध्यप्रदेश से भी समाप्त करना ही पड़ा. फूलन देवी भी जेल से बाहर आने के बाद 26 फरवरी 1994 को 12 गुरुद्वारा रकाबगंज रोड नई दिल्ली में बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम जी से जाकर मिलीं और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया. उस दिन बहन मायावती मथुरा गई हुई थी. बहन मायावती के ईर्ष्यालु स्वभाव के कारण वह बसपा में ज्यादा दिनों तक नहीं रह सकीं.

वीरांगना फूलन देवी के मन में भारत की शोषणकारी सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश कूट-कूट कर के भरा था और वह इस देश की सामाजिक व्यवस्था को बादल डालना चाहती थी. उनके वक्तव्य और भाषणों में यह स्पष्ट रूप से झलकता है. उनके संघर्ष के आधार पर उनको हजारों तोपों की सलामी भी कम पड़ जाती है परंतु उनके साथ विश्वासघात हुआ और धोखे से एक वीरांगना को मारा गया.

-दद्दू प्रसाद, पूर्व कैबिनेट मंत्री, उत्तर प्रदेश & राष्ट्रीय संयोजक, सामाजिक परिवर्तन मिशन, भारत

 


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