पसमांदा समाज के खिलाफ नया सिनेमाई नमूना
अगर आपसे पूछा जाए कि किसी फिल्म का नाम अंसारी, मंसूरी, गद्दी, हलालखोर हो तो आपका जवाब क्या होगा? सोचिए, जरा इस पर। पठान फिल्म आज रिलीज हो गई और मेनस्ट्रीम मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक, इसकी चर्चा है। कमाल की बात है कि औसत दर्जे की इस फिल्म ने बॉलीवुड में एडवांस बुकिंग का रिकॉर्ड बनाया है। फिल्म विरोधी उग्र लोगों की नहीं चली या वे फिल्म की प्रचार नीति का हिस्सा बनकर इस्तेमाल हो गए। अब हो गए तो हो गए, कोई क्या कर सकता है, जब सामान्य बुद्धि विवेक से ही परहेज होने लगा हो। (Cinematic Sample Against Pasmanda)
बहरहाल, फिल्म पठान को लेकर शोर में ऐतराज की वजहें और ऐतराज की इंतहा काफी हास्यास्पद रही। लेकिन, फिल्म ने जिस बीमारी को परोसा है, वह जेरे बहस नहीं है। इस मसले पर कोई बात नहीं हुई । ऐसा सिर्फ इसलिए कि हिंदी सिनेमा का यही असल कैरेक्टर है। पठान, शेख, सैयद करने वाले हिंदी सिनेमा की नजर में मुसलिम पसमांदा, यानी पिछड़ी मुस्लिम बिरादियों को कैसे लिया जाता है, इस पर Indus News 24×7 के सलाहकार संपादक अब्दुल्ला मंसूर का विश्लेषण सुनिए। (Cinematic Sample Against Pasmanda)