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Thursday, March 12, 2026
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‘मंगलेश डबराल’ स्मृति दिवस पर पढ़िए उनकी कविता ‘तानाशाह’

मंगलेश डबराल


तानाशाह को अपने किसी पूर्वज के जीवन का

अध्ययन नहीं करना पड़ता।

वह उनकी पुरानी तस्वीरों को जेब में नहीं रखता

या उनके दिल का एक्स-रे नहीं देखता।

यह स्वतःस्फूर्त तरीके से होता है कि (‘Manglesh Dabral’ Memorial Day)

हवा में बंदूक की तरह उठा हुआ उसका हाथ या

बंधी हुई मुट्ठी के साथ पिस्तौल की नोक की तरह

उठी हुई अंगुली किसी पुराने तानाशाह की

याद दिला जाती है या

एक काली गुफा जैसा खुला हुआ उसका मुंह

इतिहास में किसी ऐसे ही खुले हुए मुंह की

नकल बन जाता है।

वह अपनी आंखों में (‘Manglesh Dabral’ Memorial Day)

काफी कोमलता और मासूमियत लाने की कोशिश करता है

लेकिन क्रूरता, कोमलता से ज्यादा ताकतवर होती है,

इसलिए वह एक झिल्ली को भेदती हुई बाहर आती है

और इतिहास की सबसे ठंढी क्रूर आंखों में तब्दील हो जाती है।

तानाशाह मुस्कुराता है

भाषण देता है और

भरोसा दिलाने की कोशिश करता है कि

वह एक मनुष्य है

लेकिन इस कोशिश में उसकी मुद्राएं और भंगिमाएं

उन दानवों-दैत्यों-राक्षसों की

मुद्राओं का रूप लेती रहती हैं

जिनका जिक्र प्राचीन ग्रंथों-गाथाओं-धारणाओं- विश्वासों में मिलता है।

वह सुंदर दिखने की कोशिश करता है

आकर्षक कपड़े पहनता है

बार-बार बदलता है (‘Manglesh Dabral’ Memorial Day)

लेकिन इस पर उसका कोई वश नहीं कि

यह सब एक तानाशाह का मेकअप बन कर रह जाता है।

इतिहास में तानाशाह कई बार मर चुका है

लेकिन इससे उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता

क्योंकि उसे लगता है, उससे पहले कोई नहीं हुआ है।

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