अरुण माहेश्वरी
“बचपन में एक बार मेरे पिता राजा बलदेव सिंह (एक रियासत के राजा) को देखने गए जो बीमार थे, उनके साथ मैं भी गया। वहां मेरी मुलाकात दो राजकुमारों से हुई, उन्होंने मुझे अपने खिलौने दिखाए और मुझसे पूछा, “डॉक्टर के बेटे ! तुम्हारे पास क्या है दिखाने को ?” मैंने झेंप कर कहा, ‘कुछ नहीं है’। उन्होंने मेरी जेब टटोलकर उसमें से सफ़ेद हत्थी वाला चाकू निकाल लिया। जब मैंने अपना चाक़ू मांगा तो राजकुमारों ने नहीं दिया। मैंने उन्हें चांटा मार दिया। वो दोनों मुझ पर पिल पड़े और ख़ूब मारा। मेरे रोने पर पिताजी आये और माजरा जानकर उन्होंने मुझे ही चांटा मारते हुए कहा “बदमाश ! राजकुमार पर हाथ उठाता है” वह चाकू वापस नहीं मिला’। (Hindi Urdu writer Krishna Chander)
यह तो मुझे बाद में मालूम हुआ कि लोग इसी तरह करते हैं। सफ़ेद हत्थी वाला चाकू, कोई हसीन लड़की, ज़रख़ेज़ ज़मीन का टुकड़ा, सब इसी तरह हथिया लेते हैं। फिर वापस नहीं करते। इसी तरह तो जागीरदारी चलती है। मगर अच्छा नहीं किया इन लोगों ने। दो आने के चाक़ू के लिए इन्होंने मुझे अपना दुश्मन बना लिया। वो सफ़ेद चाक़ू आज तक मेरे दिल में खुबा हुआ है। इसी तरह आज तक मैंने जो कुछ लिखा है वो इसी सफ़ेद चाकू को वापस लेने के लिए लिखा है’ ।
– कृश्न चंदर
भेड़िया आया ! भेड़िया आया !
– सरला माहेश्वरी
भेड़िया आया भेड़िया आया की
पंचतंत्र की कहानी में अब
भेड़िया की जगह घुसपैठिया ने ले ली है
वैसे भी अब जंगल जंगल कहाँ रहा !
और जंगल में रहने वालों को
जंगली जानवरों से नहीं
अब शहरी लोगों से !
लगता है बहुत डर !
लेकिन रुकिये !
कहानी सिर्फ़ इतनी ही नहीं बदली है !
और कहानियों-कविताओं का क्या है !
वे भी कभी-कभी बहुत डराती रहती हैं !
कृश्न चंदर के जामुन के पेड़ की तरह !
बेचारा शायर पेड़ के नीचे दबा पड़ा है !
और सरकार धर्म-संकट में !
क्या करे ! किसे बचाए ! (Hindi Urdu writer Krishna Chander)
पेड़ को या शायर को !
किसी घुसपैठिये की साज़िश भी हो सकती है !
सरकार को बदनाम करने वालों की कमी थोड़े न है !
तो साज़िश का पर्दाफ़ाश करते-करते
बेचारा शायर !
उसकी ज़िंदगी का तो पटाक्षेप हो ही जाता है !
और साथ ही ऐसी नामुराद कहानी को भी
घुसपैठिया साबित कर
बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है !
तो अब पंचतंत्र का भेड़िया !
उसकी क्या मजाल !
वो तो जंगल में छुपकर कहीं
अपनी जान की खैर मना रहा होगा !
अब चरवाहा करे तो क्या करे !
कैसे मन बहलाए !
कैसे लोगों को भगाए !
कैसे उन्हें सताए ! (Hindi Urdu writer Krishna Chander)
तो लीजिए ! जहाँ चाह वहाँ राह !
भेड़िये की जगह आ गया घुसपैठिया !
काम शुरु ! वो भी इतना बड़ा काम !
देश के लिये देशभक्ति का काम !
सब चाक-चौबंद !
हज़ारों-करोड़ों का वारा-न्यारा !
लोग हैं कि दौड़ रहें हैं, एक दफ़्तर से दूसरे दफ़्तर !
अपनी ज़िंदगी की सारी पूँजी के बदले बस
लेने को कुछ काग़ज़ के टुकड़े !
अब ऐसे काग़ज़ के टुकड़ों का भी क्या !
देखा नहीं रवीश तो दिखा रहे थे कि
एक शिक्षक तीन ज़िलों में नौकरी कर रहा है !
बाक़ायदा आधार कार्ड है ! पैन कार्ड है !
सारे सबूत हैं ! बस एक नाम के
आदमी के बदले तीन आदमी हैं !
तो लीजिये सरकार ! (Hindi Urdu writer Krishna Chander)
एनआरसी भी हो गया तैयार !
नोटबंदी की तरह होकर घोड़े पर सवार !
अरे ! ये क्या !
हमारी आँखों में डाल रहे हो धूल !
बना रहे हो हमें अप्रैल फूल !
अबे ये तो वो घुसपैठिये नहीं !
हमारे अपने ही देशवासी हैं !
हमें ये नहीं !
वो वाले घुसपैठिये चाहिये ! (Hindi Urdu writer Krishna Chander)
(लोक माध्यम से साभार)