सुप्रीमकोर्ट ने खारिज की याचिका, सामूहिक दुष्कर्म-नरसंहार देखने वाली बिलकिस बानो नहीं ‘इरिटेट’
सुप्रीमकोर्ट ने बिलकिस बानो की याचिका ख़ारिज कर दी. बिलकिस की विनती सिर्फ़ इतनी थी कि सामूहिक दुष्कर्म और नरंसहार के जिन 11 दोषियों को गुजरात सरकार ने रिहा किया है. उस फ़ैसले और आदेश पर सर्वोच्च न्यायालय में अतिशीघ्र सुनवाई की जाए. भारत के चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष याचिका पहुंची. चीफ़ जस्टिस ने बिलकिस की याचिका खारिज करते हुए टिप्पणी की, बार-बार एक ही बात का ज़िक्र न किया करें, ये बहुत इरिटेटिंग लगता है. (SC dismisses plea Bilkis)
बिलकिस बानो 2002 के गुजरात दंगों की पीड़िता हैं. एक भीड़ ने उनके घर में घुसकर मां-बाप, भाई-बहन और बेटी समेत 14 लोगों की हत्या कर दी थी. और बिलकिस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार किया था. घटना के वक़्त बिलकिस प्रेगनेंट थीं. सामूहिक बलात्कार और नरसंहार के 11 लोग दोषी पाए गए. जिन्हें उम्रक़ैद की सज़ा हुई.

इन्हीं 11 दोषियों को इसी साल 15 अगस्त के दिन गुजरात सरकार ने जेल से रिहा कर दिया है. तब, बिलकिस बानो इरिटेट नहीं हुईं. हो भी नहीं सकतीं, उन्हें तो इरिटेट होने का हक़ भी नहीं है. वो बार-बार अदालत की दहलीज पर पहुंचकर इंसाफ़ मांग रही हैं. (SC dismisses plea Bilkis)
बिलकिस बानो की वकील शोभा गुप्ता ने अदालत के समक्ष कहा, याचिका को कल सुनवाई के लिए लिस्ट किया गया था. लेकिन इसे लिया नहीं गया. सीजेआई ने कहा-तो क्या? बार-बार एक बात न रखें, इसे सूचिबद्ध किया जाएगा. हालांकि अदालत ने ये भरोसा दिलाया है कि मामले को सुना जाएगा-थोड़ा सब्र रखें.
इससे पहले सीजेआई ने मामले की सुनवाई के लिए जिस बेंच का गठन किया था. जस्टिस बेला एम त्रिवेदी ने उस बेंच से ख़ुद को अलग कर लिया था. (SC dismisses plea Bilkis)
जेल में चरित्र निर्माण के आधार पर रिहाई
बिलकिस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार और उनके परिवार के सामूहिक नरंसहार के 11 दोषी 15 अगस्त के दिन जब जेल से बाहर आए थे. तो उनका भव्य स्वागत किया गया. फूल-मालाओं के साथ तिलक लगाकर अभिनंदन हुआ. कहा गया कि उनका चाल-चरित्र अच्छा है. 15 साल की सज़ा काटने के बाद इसी आधार पर उन्हें रिहाई मिली है.
अब क्या चाहती हैं बिलकिस बानो
गोधरा दंगों की ख़ौफनाक त्रासदी में अपने परिवार की जान-माल, आबरू, सब कुछ गवां चुकी बिलकिस बानो को इस लड़ाई से क्या हासिल होगा? आख़िर वो चाहती क्या हैं? क्यों और कैसे लड़ रही हैं ये लड़ाई? जवाब स्पष्ट है. इस लड़ाई से बिलकिस को शायद कुछ भी हासिल नहीं होगा. और न ही कुछ हासिल करने के लिए वो लड़ रही हैं. ये लड़ाई तो संवैधानिक, क़ानून और इंसानी मूल्य और महिला अधिकारों की है? (SC dismisses plea Bilkis)
अपनी लड़ाई तो वो बहुत पहले जीत चुकी हैं, जब इस त्रासदी को झेलने के बाद भी उन्होंने लड़ने की हिम्मत और हौसला दिखाया. क़ानून पर अपने भरोसे को ज़िंदा रखा. इससे आगे की लड़ाई अब उन महिलाओं के लिए है, ज़ोर के दम पर दबाए-कुचले जा रहे समाज के लिए है. देश की संस्थाओं में आम लोगों का भरोसा क़ायम रखने के लिए है. जिसे रौंदने की कोशिशें जारी हैं.
गुजरात दंगों के कई केस बंद हो चुके हैं. बिलकिस की तरह ही पूर्व सांसद अहसान जाफरी की बीवी जाकिया जाफरी भी एक हैं, जिन्होंने इंसाफ़ के लिए इस लड़ाई को आख़िरी सांस तक लड़ने का साहस दिखाया है. बार-बार हार के बाद भी जाकिया जाफरी लड़ती आ रही हैं. (SC dismisses plea Bilkis)