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Thursday, March 12, 2026
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सुप्रीम कोर्ट को याद आए बाबा साहब, सरकार को दिया ये हुक्म

संविधान निर्माता बाबा साहब डॉ.भीमराव आंबेडकर की वजह से आज के दिन फिर बड़ा फैसला हुआ। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट ने किया और बाबा साहब का नाम लेकर किया। जस्टिस भट्ट ने फैसला सुनाते समय बाबा साहब की इस बात को दोहराया, “हमारी लड़ाई सत्ता के धन के लिए नहीं है। यह स्वतंत्रता की लड़ाई है। यह मानव व्यक्तित्व के पुनरुद्धार की लड़ाई है।” (Supreme Court remembered Baba Saheb)
लाइव लॉ के अनुसार, जस्टिस भट्ट ने फैसले के खास हिस्से को भी पढ़ा, कहा- “यदि आपको वास्तव में सभी मामलों में समान होना है तो संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 15 (2), 17 और 23 और 24 जैसे मुक्तिदायक प्रावधानों को लागू करके समाज के सभी वर्गों को जो प्रतिबद्धता दी है, हममें से प्रत्येक को अपने वादे पर खरा उतरना होगा। संघ और राज्य यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य हैं कि हाथ से मैला ढोने की प्रथा पूरी तरह से समाप्त हो जाए। हममें से प्रत्येक, आबादी के इस बड़े हिस्से के प्रति कृतज्ञ है, जो अमानवीय परिस्थितियों में व्यवस्थित रूप से फंसे हुए, अनदेखे, अनसुने और मौन बने हुए हैं। संघ और राज्यों पर अधिकारों और दायित्वों की नियुक्ति का मतलब है कि वे प्रावधानों को अक्षरश: लागू करने के लिए बाध्य हैं।”

जस्टिस एस रवींद्र भट्ट और जस्टिस अरविंद कुमार की खंडपीठ ने मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोजगार पर प्रतिबंध और उनके पुनर्वास अधिनियम 2013 के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को चौदह दिशा-निर्देश भी जारी किए। खंडपीठ ने पुनर्वास के लिए सक्रिय उपायों का भी निर्देश दिया। साथ ही पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए छात्रवृत्ति और अन्य कौशल कार्यक्रम सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया। खंडपीठ डॉ. बलराम सिंह बनाम भारत संघ मामले में फैसला सुना रही थी, जो मैनुअल स्कैवेंजरों के रोजगार के खिलाफ दायर जनहित याचिका है।
यह आज यानी 20 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट का वाकया है, जब सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. बलराम सिंह बनाम भारत संघ याचिका पर फैसला दिया। फैसले में केंद्र और सभी राज्य सरकारों को हाथ से मैला ढोने की प्रथा का पूर्ण उन्मूलन सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट निर्देश जारी किया गया। (Supreme Court remembered Baba Saheb)

घृणित प्रथा के जारी रहने पर गहरी नाराजगी जताकर सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि सीवर में होने वाली मौतों के मामलों में मुआवजा बढ़ाकर 30 लाख रुपए किया जाना चाहिए। इस काम की वजह से उत्पन्न स्थायी दिव्यांगता के मामलों में मुआवजे को बढ़ाकर 20 लाख रुपये करने को कहा और अन्य प्रकार की दिव्यांगता के लिए मुआवजा 10 लाख रुपये से कम नहीं होने का निर्देश दिया।
जस्टिस भट्ट ने फैसला पढ़ा, हम सभी नागरिकों पर सच्चे भाईचारे को साकार करने का कर्तव्य है। यह बिना कारण नहीं है कि हमारे संविधान ने गरिमा और भाईचारे के मूल्य पर बहुत जोर दिया है। हमें अपने गणतंत्र की उपलब्धियों पर गर्व करते हुए जागना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने बहुत महत्वपूर्ण बातें कहीं हैं, लेकिन जिनसे यह उम्मीद की है, क्या वे इस काम को करने की मानसिकता रखते हैं? यह तीस लाख का मुआवजा देने की खानापूरी कर सकते हैं, लेकिन लगभग इतनी ही कीमत की मशीन नहीं लेंगे, जिससे इस प्रथा का अंत हो जाए।

हाथ से मैला ढोने की प्रथा को तो दशकों पहले खत्म हो ही जाना चाहिए था, जब इसका कानून बन चुका था। मैनुअल स्कैवेंजर्स और पुनर्वास (पीईएमएसआर) अधिनियम, 2013 के रूप में रोजगार के निषेध के तहत मैनुअल स्कैवेंजिंग एक गैरकानूनी प्रथा है, लेकिन हर साल सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई करते समय कितने ही लोग मर जाते हैं।
ये दुर्घटना का जख्म नहीं है, जिस पर कुछ मुआवजा फाहा रख दे। उनको समाज में कोई सम्मान नहीं मिलता, उनको अछूत मानकर बर्ताव होता है, उनकी बस्तियां अलग बसी हैं, उनको कोई किराए का कमरा तक नहीं देता, भले ही वे मैला न ढोते हों। वे जातिवाद के कलंक से पीड़ित हैं, तीस लाख की जगह तीस करोड़ भी उनको इस जंजाल से मुक्ति दिलाने में सक्षम नहीं है। (Supreme Court remembered Baba Saheb)
21वीं सदी के इस कलपुर्जा युग में, जब फोर्थ इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन हो चुकी है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से काम होने लगा है, वहां हमारे देश में लाखों लोग अछूत हैं, मैला ढोना और सीवर या सैप्टिक टैंक में घुसना उनकी मजबूरी है। जुलाई महीने में केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने खुद ही कहा है, कि 2018 और 2023 के बीच, भारत में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान 339 लोगों की जान चली गई।
सरकार का ही बयान है, “सीवर और सेप्टिक टैंकों की खतरनाक सफाई और मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोजगार पर प्रतिबंध और उनके पुनर्वास अधिनियम, 2013 और एमएस नियम 2013 के तहत निर्धारित सुरक्षा सावधानियों का पालन न करने के कारण राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में मौतें हुई हैं।”

क्या सफाईकर्मियों की मुक्ति और पुनर्वास की स्व-रोजगार योजना को बजट 2023-24 से हटा दिया गया है। इस सवाल पर मंत्री रामदास अठावले ने कहा कि इस योजना का नाम बदलकर नमस्ते (NAMASTE) कर दिया यानी कि नेशनल एक्शन फॉर मैकेनाइज्ड सैनिटेशन इकोसिस्टम। लेकिन लग ऐसा ही रहा है कि वाकई में योजना को ‘नमस्ते’ कर दिया गया। नहीं तो मशीनें आ गईं होतीं और मौत के आंकड़ों को जुटाने की मशक्कत नहीं करना पड़ती राष्ट्रवादी सरकार को।
केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा 2013 और 2018 में किए गए दो सर्वेक्षणों के अनुसार, सरकार का अनुमान है कि 58,000 मैनुअल स्कैवेंजर हैं। यह इस ‘नमस्ते’ का नतीजा है। आंकड़ों से बाहर भी हमेशा कुछ लोग हाेते ही हैं। (Supreme Court remembered Baba Saheb)
2014 में जब पहली बार केंद्र में भाजपा सरकार आई, तब से आज तक शौचालय निर्माण मिशन चल रहा है। हकीकत में और आंकड़ों में जमीन आसमान का अंतर है, जाे कोई भी देख सकता है। शौचालय निर्माण करके स्वच्छता की बात तो अब भी हो रही है, लेकिन इससे मैला ढोने की प्रथा से कोई संबंध कभी नहीं गिनाया गया। इसी वजह से यह एक अलग मसला बना रहा और आज सुप्रीम कोर्ट को बाबा साहब और संविधान के हवाले से बहुत कुछ कहना पड़ा।

शौचालय निर्माण का कीर्तिमान रचने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोच अब बदल गई है या नहीं, यह तो वही जानते होंगे। पहले वह मैला ढोने को आध्यात्मिक अनुभव बता चुके हैं। इस सिलसिले में 2014 में बीबीसी हिंदी ने एक लेख छापा था, जिसमें उनकी किताब ‘कर्मयोग’ के बारे में बताया गया। इस किताब की 4000 प्रतियां छपीं, लेकिन विवाद के चलते उनका वितरण रोक लिया गया था।
बीबीसी में लिखे लेख के अनुसार, अपनी किताब ‘कर्मयोग’ के पृष्ठ नंबर 48 पर नरेंद्र मोदी लिखते हैं, “आध्यात्मिकता के अलग-अलग अर्थ होते हैं। शमशान में काम करने वाले के लिए आध्यात्मिकता उसका रोज़ का काम है- मृत देह आएगी, मृत देह जलाएगा। जो शौचालय में काम करता है उसकी आध्यात्मिकता क्या? कभी उस वाल्मीकि समाज के आदमी, जो मैला साफ़ करता है, गंदगी दूर करता है, उसकी आध्यात्मिकता का अनुभव किया है?

इसी पन्ने पर वे आगे लिखते हैं, “उसने सिर्फ़ पेट भरने के लिए यह काम स्वीकारा हो मैं यह नहीं मानता, क्योंकि तब वह लंबे समय तक नहीं कर पाता। पीढ़ी दर पीढ़ी तो नहीं ही कर पाता। एक ज़माने में किसी को ये संस्कार हुए होंगे कि संपूर्ण समाज और देवता की साफ़-सफ़ाई की ज़िम्मेदारी मेरी है और उसी के लिए यह काम मुझे करना है।”

मोदी लिखते हैं, ”इसी कारण सदियों से समाज को स्वच्छ रखना, उसके भीतर की आध्यात्मिकता होगी। ऐसा तो नहीं होगा कि उसके पूर्वजों को और कोई नौकरी या धंधा नहीं मिला होगा। ” (Supreme Court remembered Baba Saheb)

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