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Monday, March 9, 2026
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‘द मर्डरर, द मोनार्क एंड द फ़क़ीर’: गांधी हत्याकांड के रोचक तथ्य

विजय शंकर सिंह- 

द मर्डर, द मोनार्क एंड द फकीर इस साल सावरकर पर आने वाली तीसरी महत्वपूर्ण किताब है। “वीर सावरकर की द मैन हू कैन हैव प्रिवेंटेड पार्टिशन”, विक्रम संपत की किताब और सावरकर-ए कंटेस्टेड लिगेसी पर खूब चर्चाएं हुई और सावरकर को धो पोंछ कर बेहतर तरीके से दिखाने की कोशिश भी की गई, पर इस नयी किताब पर बहुत अधिक चर्चा नहीं हुई। (Interesting Facts About Gandhi)

यह किताब गांधी हत्या में दर्ज मुक़दमे की विवेचना और अभियोजन पर केंद्रित है और एक महत्वपूर्ण सवाल उठाती है कि क्या सावरकर के खिलाफ पर्याप्त रूप से सुबूत न मिलना दोषपूर्ण पुलिस तफ्तीश का परिणाम तो नहीं है? उदय माहुरकर और विक्रम संपत की किताब सावरकर की ‘वीरता’ पर केंद्रित हैं जबकि यह किताब गांधी हत्या की साज़िश में सावरकर की संलिप्तता पर इसी साल सितंबर-अक्टूबर में जारी हुई नई किताब “द मर्डरर, द मोनार्क एंड द फकीर – महात्मा गांधी की हत्या की एक नई जांच” पर एक नई बहस को शुरू करती है।

पत्रकार अप्पू एस्थोस सुरेश और प्रियंका कोटमराजू द्वारा संयुक्त रूप से लिखी यह किताब, हार्पर कॉलिंस, इंडिया द्वारा प्रकाशित की गई है और प्रिंट व किंडल दोनों ही रूपों में उपलब्ध है। लेखक अंतर्राष्ट्रीय असमानता संस्थान लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस में सीनियर अटलांटिक फेलो हैं।

किताब पढ़ने से लगता है कि लेखकों ने गहनता से शोध करके सामग्री इकट्ठा की और उनकी तार्किक विवेचना भी की है। उन्होंने पुलिस विवेचना जैसे नीरस और जटिल पुलिस जांच को सुगमता से प्रस्तुत किया, जिससे उत्सुकता और रोचकता बनी रहे । उन्होंने राष्ट्रीय अभिलेखागार, एनएमएमएल, बॉम्बे पुलिस रिकॉर्ड और जीवन लाल कपूर आयोग की रिपोर्ट के अनेक अंश लिए हैं। (Interesting Facts About Gandhi)

गांधी हत्या पर तथ्यात्मक विश्लेषण करती एक और किताब पिछले साल आई, अशोक कुमार पांडेय की, ‘उसने गांधी को क्यों मारा’। इस किताब का अनुवाद, अन्य भारतीय भाषाओं में भी हुआ है और यह प्रकाशित होते ही लोकप्रिय भी खूब हुई। द मर्डरर, द मोनार्क, एंड द फकीर में साजिश के बारे में जो बातें कही गई हैं उनका उल्लेख “उसने गांधी को क्यों मारा’ किताब में भी काफी हद तक किया है।

यह पुस्तक, उस समय आयी जब पुलिस तफ्तीश में वैज्ञानिक तकनीक का अभाव था और विवेचना में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रति कोई उत्सुकता भी नहीं थी,और किताब इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि, ‘तब की गई इस अपराध की विवेचना, हमारी आपराधिक जांच पद्धति में व्याप्त गंभीर दोषों को भी उजागर करती है।

तब आज की तरह सीबीआई, एनआईए जैसी विशिष्ट जांच एजेंसियां, जो विभिन्न स्थानों पर हुई साजिश की सूक्ष्मता से जांच करती हैं, नहीं थीं। प्रत्यक्षदर्शियों के आधार पर जो साक्ष्य एकत्रित किए जा सके, किए गए पर हत्या की साज़िश की परतें प्रोफेशनल तरह से नहीं खोली जा सकीं, जिनके आधार पर सदी की सबसे जघन्य हत्या को अंजाम तक पहुंचाया गया। (Interesting Facts About Gandhi)

किताब में यह सवाल भी उठाया गया है कि अभियोजन ने किन कानूनी बिंदुओं और साक्ष्यों की कमी के कारण, वीडी सावरकर के खिलाफ उनके ही अंगरक्षक अप्पा रामचंद्र कसार और सचिव गजानन विष्णु दामले द्वारा 4 मार्च 1948 को बॉम्बे पुलिस को दी गई साजिश में शामिल होने के सबूत को, मुकदमे में क्यों नहीं पेश किया? वे साज़िश के महत्वपूर्ण साक्ष्य थे, जो अदालत में कभी पेश ही नहीं किए गए। (Interesting Facts About Gandhi)

लेखकों के अनुसार, “यदि वे बयान, साक्ष्य परीक्षण के दौरान प्रस्तुत किए गए होते, तो मुक़दमे का परिणाम भिन्न हो सकता था”।

लेखक दिवंगत जेडी नागरवाला, पुलिस उपयुक्त, बॉम्बे की केस डायरी का हवाला देते हैं, जिसमें दिया गया है कि “आरोपी एनवी गोडसे ने पूछताछ के दौरान उल्लेख किया था कि उसने बैठक के बाद दादर में कॉलोनी रेस्तरां में भोजन किया था।” (Interesting Facts About Gandhi)

क्राइम रिपोर्ट में 29 फरवरी 1948 के अनुसार, कॉलोनी रेस्तरां के मालिक सीताराम अनंतराव शटे का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि सावरकर के पास आने वाले लोग उनके रेस्तरां में भोजन करते थे और कभी-कभी उनके पैसे दामले द्वारा भुगतान किए जाते थे।”

रेस्तरां मालिक ने कहा कि, ”23 और 25 जनवरी, 1948 के बीच “नाथूराम भोजन के लिए उनके होटल गए थे और उस समय वह विशेष रूप से भ्रमित अवस्था में पाए गए थे”।

लेखकों का कहना है कि, “1 फरवरी 1948 की केस डायरी में गजानन विष्णु दामले और अप्पा रामचंद्र कसार से पूछताछ के दौरान जो बताया था, वे महत्वपूर्ण सबूत “सावरकर की मृत्यु के बाद, 1960 के दशक के अंत तक दबे ही रहे और उन्हें तब तक सामने कभी भी नहीं लाया गया।” (Interesting Facts About Gandhi)

किताब में 1 फरवरी 1948 को नागरवाला को उद्धृत करते हुए लिखा गया है कि, “इन दो व्यक्तियों द्वारा जो कहानी और बातें बताई गई हैं, उनसे ऐसा प्रतीत होता है कि इन दो व्यक्तियों के साथ सावरकर की इन बैठकों में महात्मा जी को खत्म करने की योजना को अंतिम रूप दिया गया था।”

“नागरवाला के अंतर्गत, बॉम्बे पुलिस द्वारा की गई जांच ने सावरकर के साजिश में शामिल होने को निर्णायक रूप से साबित कर दिया था। यह तथ्य कि गोडसे और आप्टे सावरकर के प्रयास से पहले और वास्तविक हत्या से पहले संपर्क में थे।” (Interesting Facts About Gandhi)

लेकिन कपूर आयोग की रिपोर्ट सामने आने तक यह तथ्य देश के सामने नहीं आ पाए थे। उनका कहना है कि मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने कभी भी दामले और अप्पाराव के बयानों के साथ सावरकर का सामना नहीं कराया और न ही इनके बयानों के आलोक में सावरकर का क्रॉस एग्जामिनेशन यानी जिरह ही कराई गई।

लेखकद्वय गांधी जी को उनकी हत्या से बचाने में एक और प्रशासनिक विफलता का उल्लेख करते हैं। वे कहते हैं कि,“मदनलाल पाहवा ने प्रोफेसर जेसी जैन से संपर्क किया था, जिन्होंने पहले शरणार्थी के रूप में उसकी मदद की थी और सावरकर व अन्य द्वारा गांधी जी के खिलाफ की जा रही हिंसक गतिविधियों के बारे में भी संकेत दिया था। जेसी जैन ने उन्हें तब तक गंभीरता से नहीं लिया जब तक कि उन्होंने 20 जनवरी, 1948 को हत्या के असफल प्रयास के बारे में अखबारों में नहीं पढ़ा था। (Interesting Facts About Gandhi)

इसके बाद वे बॉम्बे के गृह मंत्री मोरारजी देसाई के पास पहुंचे, जिन्होंने डिप्टी कमिश्नर बॉम्बे पुलिस नागरवाला को यह निर्देश दिया कि वे करकरे को गिरफ्तार करें और सावरकर पर कड़ी नजर रखें। लेकिन यह जितनी गम्भीरता से होना चाहिए था, नहीं किया गया।”

“केसरी” (पुणे) के संपादक गजानन विश्वनाथ केतकर के एक दावे के बाद हंगामा मचने के बाद जीवन लाल कपूर आयोग को जांच के लिए नियुक्त किया गया था। केतकर ने कहा था कि “उन्हें गांधी की हत्या की संभावना का पूर्व ज्ञान था।” (Interesting Facts About Gandhi)

प्रकरण इस प्रकार है, 12 नवंबर 1964 को पुणे में गोपाल गोडसे, मदनलाल पाहवा और विष्णु करकरे को सजा की अवधि पूरी होने के बाद, उन्हें सम्मानित करने के लिए एक समारोह आयोजित किया गया था। केतकर ने उस समारोह में यह बात कही थी। उन्होंने यह भी दावा किया कि “उन्होंने यह बात “बालुकाका कानिटकर” को बताई थी, जिन्होंने बॉम्बे राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीजी खेर को यह बात बता दी थी।”

उस आयोजन में कही गई गजानन विश्वनाथ केतकर की इस बात के बाद संसद में काफी हंगामा हुआ। तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री गुलजारीलाल नंदा ने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और सांसद गोपाल स्वरूप पाठक के नेतृत्व में इस संदर्भ की जांच के लिए एक जांच दल का गठन किया। समस्त रिकॉर्ड की जांच के बाद उन्हें अपनी रिपोर्ट देने के लिए 3 महीने का समय दिया गया। बालुकाका कानिटकर और बीजी खेर दोनों तब तक जीवित नहीं थे।

इसी बीच, गोपाल स्वरूप पाठक केंद्रीय मंत्री बना दिए गए, और वे इस कारण, जांच का काम पूरा नहीं कर सके। केंद्र सरकार ने जांच कार्य जारी रखने के लिए 21 नवंबर 1966 को न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) जीवन लाल कपूर को एक सदस्यीय जांच आयोग के रूप में नियुक्त किया। (Interesting Facts About Gandhi)

जांच के जो संदर्भ तय किए गए थे, वे थे, क्या किसी को महात्मा गांधी की हत्या के बारे में पूर्व जानकारी थी? और हत्या को रोकने के लिए बॉम्बे सरकार द्वारा क्या कदम उठाए गए थे? कपूर आयोग ने 162 बैठकों के दौरान 101 गवाहों से पूछताछ की और 30 सितंबर 1969 तक काम पूरा कर लिया।

“केएम मुंशी ने महात्मा गांधी के प्रति वैमनस्य और दुश्मनी का संकेत दिया है और उनकी नीतियों और नेतृत्व को सावरकर के नेतृत्व वाले समूह की तरफ़ झुकाव के लिए जाना जाता था।”

अदालत ने बॉम्बे पुलिस की इस त्रुटिपूर्ण विवेचना के लिए भर्त्सना (स्ट्रिक्चर ) भी की है, जो पृष्ठ 322-323 पर अंकित है। “करकरे और आप्टे का पता लगाने और महात्मा की रक्षा करने में समन्वय की कमी के लिए बॉम्बे राज्य पुलिस के खिलाफ सख्त रुख था।”हत्या के बाद पुलिस सक्रियता पर तंज करते हुए कपूर कमीशन ने जो कहा है वह एक तीखी टिप्पणी है। (Interesting Facts About Gandhi)

“हत्या के बाद पुलिस अचानक सक्रिय हो गई, और उंसकी गतिविधियां अचानक देश भर में बढ़ गईं, जिनको हत्या के पहले इस साजिश का कुछ पता ही नहीं था।“

अनदेखी, खुफिया रिपोर्टों और पुलिस रिकॉर्ड के आधार पर यह पुस्तक महात्मा गांधी की हत्या की परिस्थितियों, इससे जुड़ी घटनाओं और उसके बाद की जांच को फिर से बताती है। ऐसा करके यह किताब एक ऐसी साजिश को बताती है जो इस जघन्य अपराध से कहीं अधिक गहरी है।

द मर्डरर, मोनार्क और फकीर इस उथल-पुथल भरी घटना के महत्व को उजागर करने के लिए एक खोजी पत्रकारिता और नए सबूतों पर आधारित है। यह किताब न तो राजनीतिक घटनाओं का विश्लेषण करती है और न ही तत्कालीन परिस्थितियों का विवेचन। किताब खुद को गांधी हत्या के मुकदमे की तफ्तीश और अदालत में उसके अभियोजन की पड़ताल तक ही सीमित रखती है। (Interesting Facts About Gandhi)

हत्या, यदि क्षणिक आवेश में नहीं की गई है तो निश्चित ही उस अपराध के पीछे कोई न कोई साज़िश होती है। गांधी जी की हत्या की साज़िश रचना न तो किसी एक व्यक्ति के बस में था और न ही इसके तार इतने सरल थे कि उन्हें आसानी से सुलझाया जा सके।

हत्यारे और साजिशकर्ता यह बात बहुत ही अच्छी तरह से जानते थे कि जो जघन्य कृत्य वे करने जा रहे हैं, उसका असर दुनियाभर में पड़ सकता है और भारत मे तो वह कृत्य भूचाल ला देगा। हत्यारे तो मौके पर पकड़ लिए गए, पर इस हत्या की साज़िश की तफ्तीश उतने प्रोफेशनल तरह से नहीं की गई, जैसा कि उसे किया जाना चाहिए था।

साज़िश के सारे सबूत हालांकि वीडी सावरकर की तरफ इंगित करते हैं और कपूर कमीशन तो इस निष्कर्ष पर पहुंच ही चुका था, पर उसे अदालत में साबित नहीं किया जा सका और कुछ सबूतों को तो अदालत में लापरवाही से रखा भी गया और जितनी कुशलता से जिरह की जानी चाहिए थी, उतनी दक्षता न्यायालय में अभियोजन ने दिखाई भी नहीं। साज़िश को साबित कर पाना कठिन तो होता है पर अभियोजन की सफलता भी तो उसी कठिन कार्य को सम्पन्न करना है। (Interesting Facts About Gandhi)

(लेखक स्वतंत्र ब्लॉगर और रिटायर्ड आईपीएस हैं। यह उनके निजी विचार हैं)


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