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Thursday, March 12, 2026
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इस तरह ओबीसी हिजड़े भी बन गए

एक भगवान हैं अर्धनारीश्वर। अर्धनारीश्वर मतलब, जिनके अंदर आधी नारी और आधा पुरुष शामिल है। यही रूप जब समाज में वास्तविक तौर पर मौजूद है तो चारों धाम और 12 ज्योतिर्लिंगों की पीठ का प्रमुख उन्हें बनाया जा सकता है? उनकी तरक्की के लिए ईडब्ल्यूएस या आर्थिक रूप से कमजाेर वर्ग के खाने में रख दिया जाए तो कैसा रहेगा? (OBCs also became Transgender)

यह दोनों ही बातें कुछ लोगों को खराब और बेहूदा लग सकती हैं। अलबत्ता, इस पर उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं आ रही कि मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार ने किन्नरों को ओबीसी कोटे में शामिल करके आरक्षण का हकदार बना दिया। कुदरती देन के तौर पर मानव जाति में अर्धनारीश्वर जैसा शरीर और मन लेकर हजारों लोग पैदा होते हैं। लेकिन उनका सम्मान नहीं होता, उनका जीवन और अंत भी सामान्य लोगों के बीच नहीं रहता।

सामाजिक तौर पर उनका तिरस्कार न हो और सामान्य जीवन जी सकें, इसके लिए कोशिशें होना जरूरी हैं। उनकी विशेष रूप से मदद करने से यह रास्ता निकल सकता है। लेकिन जाति व्यवस्था के चलते सामाजिक रूप से वंचित दूसरे वर्गों के अधिकार से कटौती करके उनको राहत देना शायद गलत होगा। बाबा साहब भीमराव आंबेडकर के जन्मदिन से दो दिन पहले 12 अप्रैल को मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की कैबिनेट ने ट्रांसजेंडर्स को आरक्षण दे दिया, लेकिन ओबीसी कोटे में शामिल करके। (OBCs also became Transgender)

राज्य की ओबीसी सूची में 93 जातियां रही हैं, कैबिनेट के फैसले के बाद किन्नरों के शामिल होने से अब यह संख्या 94 हो गई है। मतलब ये भी हुआ कि ट्रांसजेंडर अब नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए मध्यप्रदेश में ओबीसी को निर्धारित 14 प्रतिशत कोटे के तहत आवेदन कर सकते हैं। मध्यप्रदेश में लगभग 30 हजार ट्रांसजेंडर हैं, जिनकी फिक्र शिवराज सरकार को खाए जा रही थी।

ऐसा भी लगता है कि वह ओबीसी में उनको शामिल करने को काफी व्याकुल रहे हैं। सीएम शिवराज ने राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के रूप में ट्रांसजेंडर आरक्षण पर कई बयान दिए हैं। एक प्रेस कांफ्रेस में उन्होंने ट्रांसजेंडर समुदाय के कल्याण और सशक्तिकरण के लिए अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की और कहा कि आरक्षण उन्हें ज्यादा मौके मुहैया कराएगा और विभिन्न सामाजिक कल्याण योजनाओं और लाभों तक उनकी पहुंच बनेगी।


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उन्होंने जोर देकर कहा कि ओबीसी के रूप में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का आरक्षण समानता और गैर-भेदभाव के संवैधानिक वादे को पूरा करने की दिशा में एक कदम है। ओबीसी के रूप में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का आरक्षण एक ऐतिहासिक निर्णय है जो ट्रांसजेंडर समुदाय की अनूठी चुनौतियों और जरूरतों को पहचानता है। (OBCs also became Transgender)

12 अप्रैल को ओबीसी सूची में ट्रांसजेंडर्स को शामिल करने के कैबिनेट के फैसले के बाद स्वास्थ्य शिक्षा मंत्री विश्वास सारंग ने प्रेस ब्रीफिंग में कहा, हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने किन्नरों को थर्ड जेंडर की मान्यता देकर शैक्षणिक संस्थानों और भर्तियों में इस समुदाय को आरक्षण देने को निर्देशित किया था। कैबिनेट के फैसले को लेकर हलचल तो मचना ही थी।

ओबीसी महासभा की कोर कमेटी के सदस्य धर्मेंद्र कुशवाहा ने त्वरित प्रतिक्रिया में कहा, ये फैसला लेकर शिवराज सिंह चौहान और उनकी कैबिनेट ने जातिगत तौर पर पिछड़े वर्ग की बेइज्जती की है। संविधान सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार देता है, लेकिन लैंगिक मामले को जाति से घालमेल नहीं कर सकते। ओबीसी आरक्षण जाति के आधार पर है। लैंगिक मुद्दे से इसे क्यों जोड़ दिया गया?

ग्वालियर में अधिवक्ता धर्मेंद्र कुशवाहा ने कहा कि ओबीसी महासभा कैबिनेट के फैसले के विरोध में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी। हम लैंगिग भेदभाव के तहत नहीं आते हैं, लेकिन ओबीसी विरोधी भाजपा सरकार लगातार पिछड़ा वर्ग को निशाना बना रही है। (OBCs also became Transgender)

चेतावनी के लहजे में उन्होंने कहा, भाजपा को इस बेइज्जती का हिसाब विधानसभा चुनाव में चुकाना पड़ेगा। कुशवाहा ने कहा कि 2011 की जनगणना के अनुसार मध्यमप्रदेश में 51.5 प्रतिशत ओबीसी जनसंख्या है। अनुसूचित जाति का आरक्षण 16 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति को 20 प्रतिशत आरक्षण निर्धारित है। जबकि सामान्य वर्ग के पास 50 फीसद नौकरियां हैं।

ओबीसी जनसंख्या सबसे ज्यादा है, फिर भी सिर्फ 14 प्रतिशत आरक्षण मिलता है। हम भाजपा सरकार के ताजा कदम की निंदा करते हैं और अदालत का रुख करेंगे। अगर सरकार ट्रांसजेंडर्स को आरक्षण देना ही चाहती है तो अलग से दे, न कि हमारे हिस्से से काटकर दे. उन्होंने कहा यहां बता दें, भारत सरकार बनाम राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण केस की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कहा गया था.

ट्रांसजेंडर को न सिर्फ थर्ड जेंडर की मान्यता दी जाए, बल्कि इस समुदाय को सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग की तरह ट्रीट किया जाना चाहिए। इस फैसले को मानते हुए हुए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने सितंबर 2021 में कैबिनेट नोट से ट्रांसजेंडर्स को केंद्र की ओबीसी सूची में शामिल कर लिया। लेकिन इस तरह के संशोधन में राष्ट्रपति के आदेश की भी जरूरत होती है। (OBCs also became Transgender)


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जिसके बाद संसद से उसे पास कराना होता है। यह संवेदनशील मुद्दा था और सीधे तौर पर देश की आधी से ज्यादा आबादी को प्रभावित करता, लिहाजा केंद्र सरकार ने इसे संसद में रखना टाल दिया। साल 2021 में कर्नाटक ट्रांसजेंडर्स को सभी सरकारी नौकरियों में 1 प्रतिशत आरक्षण देने वाला देश का पहला प्रदेश बना था। कर्नाटक के आधार पर हाईकोर्ट के आदेश से बिहार में भी इस तरह की व्यवस्था देने के प्रयास हुए हैं। लेकिन, यहां ओबीसी से उनको क्लिप नहीं किया गया।


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