भारतीय विश्वविद्यालयों में राजनीतिक जातिवाद, भाई-भतीजावाद और विशेष जाति-आधारित पक्षपात सदियों से व्याप्त है, जो शिक्षा के मंदिरों को नैतिक पतन और शोषणकारी मानसिकता का अड्डा बनाता जा रहा है। उच्च शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान, समानता और नैतिकता को बढ़ावा देना है, किंतु वास्तविकता में यहाँ राजनीतिक स्वार्थ, जातिगत भेदभाव और संकीर्ण रणनीतियाँ हावी हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन और प्राध्यापक वर्ग अक्सर सत्ता और प्रभाव के खेल में लिप्त रहते हैं, जिसके चलते योग्यता और प्रतिभा को दरकिनार कर जाति, संबंध और राजनीतिक निष्ठा को प्राथमिकता दी जाती है। यह कुंठित मानसिकता छात्रों के प्रति शोषणकारी व्यवहार को जन्म देती है, जहाँ उनकी प्रतिभा का मूल्यांकन निष्पक्षता के बजाय पक्षपातपूर्ण नीतियों पर आधारित होता है। ऐसी व्यवस्था न केवल छात्रों के मनोबल को तोड़ती है, बल्कि समाज में असमानता और अन्याय को भी बढ़ावा देती है। यह स्थिति शिक्षा के उच्च आदर्शों को चोट पहुँचाती है और विश्वविद्यालयों को नैतिकता के निम्न स्तर पर लाकर खड़ा कर देती है। इस गंभीर समस्या का समाधान निष्पक्षता, पारदर्शिता और नैतिक शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता से ही संभव है। जहां शिक्षा के मंदिरों में शिक्षकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वह सभी छात्रों के साथ समान व्यवहार और आचरण करेंगे परंतु यहां जितना ही शिक्षा का स्तर उच्च होता जाता है वैसे ही नैतिक स्तर निम्न होता जाता है। शिक्षकों में तानाशाही रवैया राजनीतिक परिचर्चा करना और अपने जाति समूह के छात्रों को नंबर अधिक देना या उनका हर कदम सहयोग करना एवं अन्य छात्रों की हमेशा उपेक्षा करना यह शिक्षा जगत के लिए एक विष के समान है जहां हम न्यायपूर्ण शिक्षा व्यवस्था और समानता की बात करते हैं वही यह शिक्षक भेदभाव का माहौल और अपने पसंदीदा लोगों को लाभ पहुंचाने का काम कर रहे हैं समाज के दबे कुचले वंचित और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आए हुए छात्रों को हमेशा अनदेखी की जाती है। विश्वविद्यालय में देखा गया है कुछ शिक्षक ऐसे हैं जिनका उद्देश्य सिर्फ राजनीति करना और अपने जाति के लोगों से संपर्क करना और राजनीति पर चर्चा करना और अन्य शिक्षकों की बुराई करना है। (Universities are centres of caste discrimination)
विश्वविद्यालयों में जातिवाद और शोषणकारी व्यवस्था: एक गंभीर सामाजिक चुनौती
भारत के विश्वविद्यालय न केवल उच्च शिक्षा के केंद्र हैं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और बौद्धिक विकास के प्रतीक भी माने जाते हैं। हालांकि, इन संस्थानों में जातिवाद, शोषण और भेदभाव की समस्याएं गहरे तक जड़ें जमाए हुए हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), लखनऊ विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी जातिगत भेदभाव और शोषणकारी व्यवहार के मामले सामने आए हैं। यह लेख इन विश्वविद्यालयों में व्याप्त जातिवाद, छात्रों के प्रति शिक्षकों की पक्षपातपूर्ण मानसिकता, और शोषणकारी व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालता है। साथ ही, यह उन कारणों और समाधानों पर भी चर्चा करता है जो इस गंभीर समस्या को हल करने में सहायक हो सकते हैं।
विश्वविद्यालयों में जातिवाद: एक ऐतिहासिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य
जातिवाद भारतीय समाज की एक पुरानी और जटिल समस्या है, जो शिक्षा क्षेत्र में भी अपनी छाप छोड़ चुकी है। विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव न केवल छात्रों के बीच, बल्कि शिक्षकों और प्रशासन के स्तर पर भी देखा जाता है। सामाजिक संरचना में जाति आधारित विशेषाधिकार और शक्ति का असंतुलन विश्वविद्यालयों के परिसरों में भी प्रतिबिंबित होता है। विशेष रूप से, दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़े वर्गों के छात्रों को अक्सर भेदभाव, अपमान और शोषण का सामना करना पड़ता है। यह भेदभाव नंबर देने, शोध अवसर प्रदान करने, छात्रवृति आवंटन, और यहां तक कि कक्षा में चर्चा के दौरान भी प्रकट होता है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय: जातिगत हिंसा और प्रशासनिक उदासीनता
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जिसे कभी “पूर्व का ऑक्सफोर्ड” कहा जाता था, हाल के वर्षों में जातिगत भेदभाव और छात्रों के साथ दुर्व्यवहार के मामलों के लिए सुर्खियों में रहा है। 2024 में एक गंभीर घटना सामने आई, जिसमें एक छात्र ने आरोप लगाया कि चीफ प्रॉक्टर ने उसे अपने कार्यालय में बुलाकर अपमानित किया, उसकी पैंट उतरवाने का प्रयास किया, और मां-बहन की गालियां दीं। इस घटना ने न केवल विश्वविद्यालय प्रशासन की संवेदनहीनता को उजागर किया, बल्कि यह भी दिखाया कि कैसे उच्च पदों पर बैठे लोग अपनी शक्ति का दुरुपयोग करते हैं। https://x.com/nsui/status/1753367019540599076
एक अन्य मामले में, दलित छात्रों ने विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों और कुलपति पर जातिवादी मानसिकता के आधार पर भेदभाव करने का आरोप लगाया। सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट में दावा किया गया कि दलित छात्रों के साथ मारपीट की गई और उनके खिलाफ लाठियां चलाई गईं। यह घटनाएं विश्वविद्यालय में व्याप्त गहरे जातिगत पूर्वाग्रह को दर्शाती हैं। शिक्षकों की मानसिकता अक्सर इस तरह के भेदभाव को बढ़ावा देती है, जहां वे छात्रों की जाति के आधार पर उनकी योग्यता का आकलन करते। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कार्यरत प्रोफेसर विक्रम हरिजन ने कई साल पहले या बयान दिया था कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में नंबर, नाम और जाति देखकर दिए जाते हैं वह कहीं ना कहीं ऐसा सही साबित होता आ रहा है। शिक्षा शास्त्र विभाग के छात्र ने कुछ शिक्षकों के नाम लेकर उनके व्यवहार और कार्यशैली के बारे में विस्तार रूप से बताया उसमें एक दो ऐसे शिक्षक है जिनको इतनी नफ़रत है ऐसे छात्रों से जो समान शिक्षा और अधिकार की बात करते हैं इन शिक्षकों के पास हर वक्त ऐसे छात्रों के नुकसान और बुराई के अलावा कुछ नहीं है यह छात्र कुछ पूछने भी जाएंगे तो सीधे मुंह बात करना उचित नहीं समझेंगे। छात्र ने बताया कि वह कुछ पूछने के लिए बोलता “सर” वह नज़र अंदाज करते हुए आगे बढ़ जाते है और दूर से बोलते है- “बोलो क्या है” यह कैसा व्यवहार ? क्या यही शिक्षक छात्र- संवाद है? ऐसे ही एक शिक्षिका महोदया के बारे कहा जाता है कि वे नंबर तो काटेंगी लेकिन कोई छात्र पूछने जाएगा तो उनके पास या तो समय नहीं होगा या बताना उचित नहीं समझेंगी। नंबर कम देने की शिकायत अगर उनसे कोई करता है तो कहेंगे तुम्हारा हमेशा यही रहता जब आप कुछ गलत हमेशा करते हो तभी छात्र शिकायत करने आया और किसी के साथ यह क्यों नहीं होता। कुछ बताने की बात अलग और उनके द्वारा दिए गए नंबर को भी दिखाया और ऐसा कई छात्रों के साथ किया जा रहा है यह भी बताया। यह छात्रों की कमी नहीं है इन शिक्षकों की कमी है जो अपने शिक्षण और अपने व्यवहार का मूल्यांकन नहीं करेंगे छात्रों का मूल्यांकन अनुचित तरीके से करेंगे। वो छात्र फेल नहीं हुए हैं यह शिक्षक फेल हुए हैं जो कुंठित मानसिकता के साथ एक घिनौना खेल खेलते हैं। छात्रों से बातचीत करने के बाद यह सामने आया है कि कुछ प्रोफेसर जो अपनी व्यक्तिगत मनसा और कुंठा के कारण व्यक्ति से दोष रखते हैं और उसे कहीं ना कहीं प्रवेश परीक्षा या नंबर देने की प्रक्रिया में प्रयोग करते हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एक छात्र ने यह भी बताया है कि यदि आप इन शिक्षकों के खिलाफ कुछ बोलते हैं या लिखते हैं तो यह शिक्षक अन्य शिक्षकों को भी भड़काते हैं और अन्य शिक्षक भी चुपचाप इनकी सूझी समझी राजनीति का हिस्सा बन जाते हैं और यह अपनी जाति के छात्रों के साथ मिलकर साज़िश करते है और कहीं ना कहीं छात्रों का नुकसान करने के लिए एक सूझी समझी रणनीति के तहत काम करते हैं। एक छात्रा का कहना है कि आप किसी भी छात्र की कॉपी का मिलान अन्य छात्रों के असाइनमेंट और कॉपी से कर लीजिए सब कुछ सही लिखा होने के बावजूद भी उसको नंबर सिर्फ पास होने लायक ही दिए जाते हैं और इसके अलावा फेल करने की पूरी साजिश होती है। विभाग से जुड़े अन्य लोगों से जानकारी प्राप्त हुई की जो शिक्षक जिस विषय के विशेषज्ञ हैं उस विषय को छोड़कर अन्य सभी विशेष को पढ़ाने की चेष्टा रखते हैं चाहे उन्होंने इसकी डिग्री दूरस्थ शिक्षा से ही क्यों न प्राप्त की हो या उस विषय विशेषज्ञ की डिग्री ना हो। छात्रों के साथ यह भेदभाव कब समाप्त होगा इसका कुछ पता नहीं राजनीतिक शिक्षक अपनी जाति से संबंधित शिक्षकों को एक विशेष वर्ग के प्रति इस प्रकार तैयार कर देते हैं कि वह विशेष वर्ग के प्रति हमेशा ही गलत अवधारणा के साथ व्यवहार करते और उनके प्रति हमेशा एक दुश्मनी जैसा बर्ताव करते हैं जब एक शिक्षक ने खुद एक शिक्षक के गुणों को धारण नहीं किया है तो वह क्या शिक्षा देगा? क्या सिखाएगा? उसके व्यवहार में हमेशा एक भेदभाव जैसा बर्ताव देखने को मिलेगा। दलित, पिछड़े छात्रों के साथ यह व्यवहार सदियों से होता आया है इसी में एक दो छात्रों को अपने पक्ष में करने के लिए रणनीतिक रूप से नंबर देकर अपना बचाव करने की कोशिश की जाती है जिससे यह कुछ छात्र कहे हमें सही नंबर मिले और होनहार छात्रों का मनोबल कम हो जाए और अपने अंदर कमी मानकर चुप बैठ जाएँ, कहीं ना कहीं यही दिखता है। यह शिक्षक कितने भ्रष्ट हैं और छात्रों के भविष्य को बर्बाद करने के लिए तुले हुए हैं। यह भूल रहे इनके कर्मों की सजा इनके साथ इनकी आने वाली पीढ़ियां को भी भुगतनी पड़ेगी समय एक सा नहीं रहेगा। https://x.com/bawra_upkar/status/1714867865189486718
दिल्ली विश्वविद्यालय: संरचनात्मक भेदभाव और अवसरों की असमानता
दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) भारत के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक है, लेकिन यहां भी जातिगत भेदभाव और शोषण की घटनाएं असामान्य नहीं हैं। डीयू के कॉलेजों में दलित और आदिवासी छात्रों को अक्सर कक्षा में उपेक्षा, अपमानजनक टिप्पणियों और असमान नंबर वितरण का सामना करना पड़ता है। एक अध्ययन के अनुसार, डीयू में शिक्षकों द्वारा नंबर देने में पक्षपात देखा गया है, जहां उच्च जाति के छात्रों को समान प्रदर्शन के बावजूद बेहतर अंक दिए जाते हैं।
इसके अलावा, डीयू में आरक्षित वर्ग के छात्रों को छात्रवृत्ति और शोध अवसरों में बाधाओं का सामना करना पड़ता है। कई बार, शिक्षक और प्रशासन उन छात्रों को निशाना बनाते हैं जो जातिगत भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाते हैं। उदाहरण के लिए डीयू के कुछ कॉलेजों में दलित छात्र संगठनों को अपनी बात रखने के लिए मंच नहीं दिया जाता, और उनके आयोजनों को प्रशासन द्वारा रद्द कर दिया जाता है। यह शिक्षकों और प्रशासन की उस मानसिकता को दर्शाता है जो सामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांतों के विपरीत है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय: प्रगतिशील छवि के पीछे की सच्चाई
जेएनयू को अक्सर प्रगतिशील विचारधारा और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष का प्रतीक माना जाता है, लेकिन यह विश्वविद्यालय भी जातिगत भेदभाव से अछूता नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में, जेएनयू में दलित और आदिवासी छात्रों ने शिक्षकों और प्रशासन पर भेदभावपूर्ण रवैये का आरोप लगाया है। विशेष रूप से, शोध छात्रों को उनके सुपरवाइजर्स द्वारा जातिगत टिप्पणियों और अनुचित व्यवहार का सामना करना पड़ा है।
जेएनयू में एक उल्लेखनीय घटना में, एक दलित छात्र ने अपने प्रोफेसर पर आरोप लगाया कि उसने उसे जानबूझकर कम नंबर दिए और उसकी थीसिस को अनावश्यक रूप से देरी से स्वीकृत किया। इस तरह की घटनाएं शिक्षकों की उस मानसिकता को उजागर करती हैं, जो सामाजिक समानता की बात तो करती है, लेकिन व्यवहार में जातिगत पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं है। इसके अलावा, जेएनयू में छात्र संगठनों के बीच भी जातिगत तनाव देखा गया है, जो परिसर के सामाजिक माहौल को और जटिल बनाता है। (Universities are centres of caste discrimination)

लखनऊ विश्वविद्यालय: शोषण और उपेक्षा का केंद्र
लखनऊ विश्वविद्यालय में भी जातिगत भेदभाव और शोषण के मामले सामने आए हैं। हाल ही में, एक शिक्षिका ने अपने पति, जो स्वयं एक शिक्षक है, पर शारीरिक और मानसिक शोषण का आरोप लगाया। यह घटना न केवल व्यक्तिगत स्तर पर शोषण को दर्शाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि शिक्षक समुदाय के भीतर भी नैतिकता और समानता की कमी है। ( https://basicshikshakhabar.com/2025/05/r-811/ )
छात्रों के संदर्भ में, लखनऊ विश्वविद्यालय में दलित और पिछड़े वर्ग के छात्रों ने शिक्षकों पर जाति के आधार पर भेदभाव करने का आरोप लगाया है। कई छात्रों ने बताया कि उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जाता, और जो छात्र सामाजिक मुद्दों पर आवाज उठाते हैं, उन्हें प्रशासन द्वारा निशाना बनाया जाता है। यह शिक्षकों की उस कुंठित मानसिकता को दर्शाता है, जो सत्ता और विशेषाधिकार को बनाए रखने के लिए असमानता को बढ़ावा देती है।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय: परंपरा और भेदभाव का संगम
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में जातिगत भेदभाव और शोषण की घटनाएं भी असामान्य नहीं हैं। बीएचयू में दलित और आदिवासी छात्रों ने शिक्षकों और प्रशासन पर जातिगत टिप्पणियां करने और उन्हें अपमानित करने का आरोप लगाया है। एक उल्लेखनीय मामले में, एक दलित छात्र को उसके प्रोफेसर ने कक्षा में अपमानजनक टिप्पणी करते हुए कहा कि “तुम्हारी जाति के लोग पढ़ाई में अच्छे नहीं हो सकते।“ इस तरह की टिप्पणियां न केवल छात्रों के आत्मविश्वास को ठेस पहुंचाती हैं, बल्कि उनकी शैक्षिक प्रगति को भी बाधित करती हैं।
बीएचयू में प्रशासनिक स्तर पर भी भेदभाव देखा गया है। आरक्षित वर्ग के छात्रों को छात्रावास आवंटन, छात्रवृति, और अन्य सुविधाओं में बाधाओं का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, विश्वविद्यालय में उन छात्रों को दबाने की कोशिश की जाती है जो जातिगत भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाते हैं। यह शिक्षकों और प्रशासन की उस मानसिकता को दर्शाता है, जो परंपरागत सामाजिक संरचना को बनाए रखने के लिए भेदभाव को सामान्य मानती है एक सोनकर नाम के छात्र ने तीन बार परीक्षा अच्छे नंबर से उत्तीर्ण की। हद तो जब हो गई जब एक बार उसने परीक्षा में टॉप दो में स्थान पाया परंतु उसे पी.एच.डी में प्रवेश नहीं दिया गया।(Universities are centres of caste discrimination)
शिक्षकों की मानसिकता: भेदभाव का मूल कारण
विश्वविद्यालयों में व्याप्त जातिवाद और शोषण का एक प्रमुख कारण शिक्षकों की मानसिकता है। कई शिक्षक सामाजिक पूर्वाग्रहों और जातिगत श्रेष्ठता की भावना से ग्रस्त हैं। वे छात्रों की योग्यता को उनकी जाति के आधार पर आंकते हैं, जिसके परिणामस्वरूप नंबर देने, शोध अवसर प्रदान करने, और कक्षा में व्यवहार करने में पक्षपात होता है। [](https://testbook.com/question-answer/hn/a-teacher-suffers-from-prejudices-and-behaves-impr–60ffecccfd444093f79e401d)
शिक्षकों की यह मानसिकता अक्सर उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि और शिक्षा प्रणाली में गहरे निहित पूर्वाग्रहों से प्रभावित होती है। कई बार, शिक्षक उन छात्रों के प्रति कुंठा और दोष का भाव रखते हैं जो सामाजिक मुद्दों पर सवाल उठाते हैं या प्रशासन के खिलाफ आवाज बुलंद करते हैं। यह व्यवहार न केवल शैक्षिक नैतिकता के खिलाफ है, बल्कि विश्वविद्यालयों के मूल उद्देश्य—ज्ञान और समानता के प्रसार—को भी कमजोर करता है। मानता हूं कभी-कभी छात्रों की गलती होती है और वह परीक्षा में सही से अपनी परफॉर्मेंस नहीं दे पाते हैं परंतु जो छात्र अच्छे हैं जिनका शैक्षिक रिकार्ड अच्छा रहा है और अन्य शिक्षकों ने उन्हें अच्छे नंबर भी दिए हैं वह छात्र जब शोषण का शिकार होते हैं किसी विशेष वर्ग के शिक्षक के द्वारा किया गया दुर्व्यवहार यहां कहीं ना कहीं इन शिक्षकों पर सवाल खड़ा करता है जो छात्रों के साथ भेदभाव कर रहे हैं जो अपनी जाति के छात्रों या अपने प्रिय छात्रों को बढ़ावा देकर अन्य छात्रों के साथ भेदभाव का व्यवहार और उनकी योग्यता पर सवाल खड़ा करते हैं उन्हें हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं।
समाधान और सुधार के उपाय
जातिवाद और शोषणकारी व्यवस्था को समाप्त करने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं:
1.संवेदनशीलता प्रशिक्षण: शिक्षकों और प्रशासनिक कर्मचारियों के लिए नियमित रूप से जातिगत संवेदनशीलता और समावेशिता पर कार्यशालाएं आयोजित की जानी चाहिए। इससे उनकी मानसिकता में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।
2.कठोर नियम और सजा: भेदभाव और शोषण के मामलों में कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए। दोषी शिक्षकों और प्रशासनिक अधिकारियों को निलंबित या बर्खास्त किया जाना चाहिए।




