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Thursday, March 12, 2026
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भारत-चीन सीमा पर आखिर चल क्या रहा है

चंद्र भूषण


संसद के मौजूदा सत्र में कई मुद्दों पर गर्मागर्म बहसें सुनने को मिलीं लेकिन जो बात अभी देश के लिए सबसे ज्यादा चिंता का विषय है, उसी पर कोई चर्चा नहीं हो पा रही है। बीते 9 दिसंबर को भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलओएसी) के तवांग सेक्टर में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक टकराव हुआ, जिसमें दोनों तरफ के कुछ फौजी घायल हुए। यह घटना ढाई साल पहले एलओएसी के पश्चिमी हिस्से में गलवान घाटी की झड़प जैसी ही थी। (What going India-China)

फर्क सिर्फ इतना था कि इसमें कोई सैनिक शहीद नहीं हुआ। संसार की सबसे बड़ी आबादी वाली दो शक्तिशाली सैन्य-आर्थिक शक्तियों के बीच इतने लंबे समय तक तनाव रहना और थोड़े-थोड़े समय पर उनका इस तरह आपस में भिड़ जाना दुनिया के लिए भी कोई अच्छी खबर नहीं है। इस मसले पर हर जगह जितने मुंह उतनी बातें सुनाई पड़ रही हैं। फिर वजह क्या है जो भारतीय संसद में इस मुद्दे पर कोई व्यवस्थित बातचीत नहीं देखने को मिल रही?

हां, इसके इर्दगिर्द के जिन मुद्दों पर अक्सर जोशीली तकरीरें सुनने को मिल रही हैं, संसदीय विमर्शों के पैमाने पर वे बचकाने ही कहे जाएंगे। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने राजस्थान की किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि ‘मीडिया मुझसे हर चीज के बारे में सवाल करेगा, लेकिन चीन ने हमारी दो हजार वर्ग किलोमीटर जमीन दबा ली, उसकी फौज हमारी सीमा में घुसकर हमारे सैनिकों की पिटाई कर जा रही है, इस बारे में एक भी सवाल मुझसे कभी नहीं किया जाएगा।’ (What going India-China)

बहस टालने के बहाने

भारतीय नेताओं के बयानों पर गौर करें तो रोज ही न जाने कितनी अल्लम-गल्लम बातें होती रहती हैं। एक ऐसा राजनेता, जो न किसी सरकार के जिम्मेदार पद पर है, न ही किसी पार्टी के, उसे ढंग से घेर पाने की संभावना वैसे भी ज्यादा नहीं रहती। फिर भी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से की गई इस मांग ने संसद का काफी वक्त खाया कि वे कठपुतली नहीं हैं तो भारतीय सेना का अपमान करने के लिए राहुल गांधी को अपनी पार्टी से बाहर करें।

इसके अगले दिन खुद मल्लिकार्जुन खरगे का ही एक बयान चर्चा का विषय बन गया। राजस्थान में ही किसी जगह उन्होंने कहा कि ‘इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने देश के लिए कुर्बानी दी, बीजेपी के लोग बताएं कि क्या उनमें से किसी के घर के एक कुत्ते ने भी देश के लिए अपना बलिदान दिया है।’ (What going India-China)

यहां ‘कुत्ता’ शब्द पकड़ में आ गया और एक जनसभा में दिए गए इस भाषण की असंसदीयता को लेकर संसद का अच्छा-खासा वक्त बर्बाद किया गया। भारतीय लोकतंत्र में सत्ता पक्ष ही अगर किसी बात को लेकर संसद में चर्चा न कराने पर अड़ जाए तो विपक्ष लाख कोशिशों के बाद भी यह काम नहीं कर पाएगा। ऐसे में हंगामा, बहिर्गमन और बहिष्कार का रास्ता ही बचता है, जिसके लिए लोकतांत्रिक कार्यकर्ता और संविधानविद प्रायः चिंता व्यक्त करते रहते हैं।

लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे पर भी अगर संसद में बहस न हो तो इससे संसद के औचित्य पर सवाल खड़े होने लगते हैं और इसकी गरिमा घटती है। ध्यान रहे, यह कोई औपचारिक मामला नहीं है। चीन के साथ बार-बार हो रहे टकरावों के साथ कुछ बहुत बड़े विरोधाभास जुड़े हैं। मसलन यह कि पूर्वी लद्दाख में लगातार तीसरे साल भीषण ठंड में एक लाख सैनिकों की आमने-सामने की तैनाती के बावजूद चीन से भारत को होने वाले आयात में हर साल 25 प्रतिशत या इससे भी ज्यादा की बढ़त देखी जा रही है। (What going India-China)

पांच साल पहले तक चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के साथ भारतीय प्रधानमंत्री के दोस्ताना संबंध पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बने रहते थे। बीच में कोरोना के दो वर्षीय फासले के बाद इंडोनेशिया के बाली द्वीप में जी-20 शिखर सम्मेलन के वक्त दोनों की भेंट हुई तो टीवी कैमरों की नजर में दोनों का आपसी सौहार्द पहले जैसा ही दिखा।

ये बातें बुरी नहीं हैं। प्रौढ़ कूटनीति का लक्षण यही है कि सीमा तनावों का सीधा असर आपसी कारोबार पर न पड़े और राष्ट्राध्यक्षों के बीच रिश्ते ऐसे हों कि बुरे से बुरे दौर में भी संवादहीनता की स्थिति न बने। लोगों के बीच सवाल यही उठ रहा है कि इस प्रौढ़ कूटनीति का लाभ सीमा पर क्यों नहीं मिल रहा। पूर्वी लद्दाख में तनाव का बेकाबू न होना, कम से कम दो बिंदुओं- पैंगोंग त्सो और गोगरा-हॉटस्प्रिंग में आमने-सामने खड़े फौजियों का पीछे हटना, बीच में तात्कालिक रूप से ‘नो पैट्रोलिंग जोन’ बनाया जाना अच्छी बात थी, लेकिन इन दोनों फैसलों के घटित हुए लंबा वक्त गुजर चुका है। (What going India-China)

सबसे बुरी बात यह है कि दोनों तरफ भरोसे का रिश्ता कायम करने की कोई पहल नहीं दिख रही है और एक जगह आग ठंडी होने से पहले ही दूसरी जगह धुआं उठने लग रहा है। पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने इस संदर्भ में जो पांच सवाल संसद में सरकार से पूछे हैं, उनमें एक भी ऐसा नहीं है जिसका जवाब देने से मोदी सरकार की सीमा रणनीति में कोई झोल पैदा होने की संभावना बनती हो।

इनका संबंध सिर्फ इस जिज्ञासा से है कि भारत और चीन का सत्ताशीर्ष अभी के सीमा विवाद को ठंडा करने के लिए क्या कर रहा है। अच्छा होगा कि इतने बड़े मामले में स्वयं प्रधानमंत्री आगे आएं और संसद के मंच से ऐसे सभी सवालों का समाधान कर दें। (What going India-China)

युद्ध और शांति

एक बात अभी बिल्कुल साफ दिखती है कि चीन के साथ अपनी धुंधली सीमारेखा को भारत सरकार गंभीरता से ले रही है और इसके नजदीक इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। काम की रफ्तार को देखते हुए कहा जा सकता है कि सन 2025 तक वास्तविक नियंत्रण रेखा के हर बिंदु से 15-20 किलोमीटर की दूरी पर एक ठीक-ठाक सड़क गुजर रही होगी, जिससे होकर टैंक और बाकी फौजी साजोसामान किसी भी टकराव की जगह पर तैनात किए जा सकेंगे। (What going India-China)

वायुसेना और नौसेना की तैयारियों की रफ्तार भी अच्छी है, कोई बड़ी कमजोरी एकबारगी नहीं दिख रही। किसी बड़े तनाव की स्थिति अगर बनती भी है तो यकीनन मामला एकतरफा तौर पर चीन की ओर नहीं झुका रहेगा। पुरानी कहावत है, कोई भी देश हर क्षण युद्ध के लिए तैयार रहकर ही अपने लिए शांति सुनिश्चित कर सकता है।

भारत का प्रबल सैन्य ढांचा चीन के सामने बराबरी से खड़ा हो जाए तो उसके लिए दुस्साहस का कोई अवसर नहीं रहेगा। लेकिन ऐसा करते हुए देश को भरोसे में लिया जाना चाहिए और शीर्ष स्तर पर इस मसले का स्थायी हल निकाला जाना चाहिए। (What going India-China)

(ये लेखक के निजी विचार हैं, लोक माध्यम से साभार)


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