
एक दिन कक्षा में दो विषयों के बीच के अंतराल में मुझे और मेरे सहपाठियों को विचार आया कि हम मित्रता को एक कदम और आगे बढ़ाएं। मेरी सहेली ने मुझसे पूछा तुम्हारे फेवरेट भगवान कौन हैं? मैंने थोड़ा सोचा कि घर के मंदिर में कौन कौन से ऑप्शंस हैं। मेरे घर में इतनी विभिन्नता तो थी कि हिंदू मित्रों को मुझसे निराशा नहीं होती। पर मुझे हनुमान सबसे सही ऑप्शन लगा। और मुझे चिंता होती थी कि अब साईं जी को जिस तरह सभी लोग फ़ॉलो कर रहे, कहीं हनुमान जी आउटडेटेड न हो जाए। (Who is your favourite God)

घर पर मां ने कभी पूजा करने पर जोर नहीं मारा, हनुमान जी की पूजा सिर्फ लड़के करते थे उस वक्त तो मुझे लगता था कि मेरा पूजा करने का अधिकार छीना जा रहा। पर ये गुस्सा जल्दी ही ठंडा हो जाता क्यूंकि पूजा पाठ के अपने नियम होते हैं और नियम धर्म तो मुझे बचपन में समझ नहीं आते थे।
कभी कभी मैं सवाल कर लिया करती कि मेरे हनुमान जी शंकर जी के अवतार हैं वो सबसे बड़े भगवान हैं वो राम के सेवक क्यूं हैं। राम से मुझे कोई दिक्कत नहीं थी पर हनुमान की बात ही अलग थी वो उड़ सकते थे, बड़े बड़े काम चुटकी में कर देते थे। मुझे पूरा विश्वास था कि अगर कभी मुझे जरूरत पड़ी तो वो हनुमान ही होंगे। और नैतिक शिक्षा के विषय में मुझे ठीक ठाक अंक मिल जाते थे इसलिए राम कभी मेरे मन में जगह बना नहीं पाए। मुझे नहीं पता था कि असली सिलेबस तो राम पर ही बनने वाला है। (Who is your favourite God)
बचपन का नारीवाद बड़ा हुआ और मैं दुर्गा जी पर शिफ्ट हो गई। दुर्गा जी भी ऑलमोस्ट सबकी फेवरेट हैं लेकिन उनके लिए सीजनल भक्ति ही चलता है। अब अगर नवरात्रों के दिन में मासिक धर्म शुरू हो जाए तो अपने ही भगवान से दूर किए जाने की वेदना एक त्रासदी है। वो भी तो औरत हैं फिर मेरे साथ ऐसा अछूत वाला बर्ताव क्यो भई? हम सत्य की खोज और स्वयं की खोज से पहले ब्रह्म की खोज पर ज्यादा ध्यान देते हैं। अलग अलग धर्म और अलग अलग आपके पसंदीदा भगवान।

घर की किसी भी धार्मिक पुस्तक में निर्गुण भक्ति का उल्लेख नहीं मिलता था पर हिंदी विषय ने मेरे ब्रह्म की खोज को निर्गुण भक्ति से मिला दिया। तो मतलब अब मेरे भगवान अमीबा जैसे भी हो सकते थे और नहीं भी हो सकते थे। भगवान की शक्ल तो होनी चाहिए। बिना कान के वो कैसे सुन सकेंगे कि मुझे किस विषय में उनकी सहायता चाहिए। पर ये भगवान जो निराकार थे इनकी भक्ति के लिए कोई कर्मकांड नहीं करना है, ये बात सही लगी। इन किताबों में बाकी किसी धर्म के भगवानों का कोई जिक्र हुआ हो ऐसा मुझे नहीं याद। ये भी तो दिक्कत है कि बाकी के धर्मों में इतने भगवान के ऑप्शन भी नहीं हैं। (Who is your favourite God)
दूरदर्शन पर भी ज्यादातर हिंदू भगवान को ही काम मिला। और मुझे यकीन है कि भारत में बुद्ध जैन सिख मुस्लिम ईसाई सभी के फेवरेट भगवान हिंदू धर्म का ही कोई भगवान होगा। वो बोल नहीं सकते पर आप कभी ऑप्शन देकर देखिएगा। और ऑप्शन में उनके भगवान को हटा दीजिएगा। गायत्री मंत्र लिखने के 2 अंक मिलते थे परीक्षा में। सभी धर्म के छात्र छात्राओं को 2 अंक के श्लोक अगली कक्षा में उत्तीर्ण कर सकते थे, और 2 अंक अर्जित करना कोई बुरी बात तो नहीं ना।
शुद्ध संस्कृत की बात ही अलग होती है। अब बस NASA जल्दी से जल्दी संस्कृत को विज्ञान और कंप्यूटर की मूलभूत भाषा साबित कर दे फिर हम सबको ये हिंदी जैसी अवैज्ञानिक भाषा से निजात मिल जाए। शायद यही वजह है कि हमारे वैज्ञानिक स्वभाव वाले भगवान हमारी बात नही समझ पा रहे क्यूंकि उनकी भाषा तो संस्कृत है।
मुझे विज्ञान की एक बात बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती कि ये धीरे धीरे ब्रह्मांड के सारे रहस्य उजागर करता जा रहा पर हबल टेलीस्कोप को एक भगवान का धाम नहीं मिल सका, क्षीरसागर ही ढूंढ लेता। जरूर वो सच्चे चित से भगवान को नहीं ढूंढ रहे। कहते हैं कि ॐ का अनहद नाद ही ब्रह्मांड की आवाज है हमें जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप को उस आवाज़ के पीछे पीछे भेज देना चाहिए, जरूर शिव जी का पूरा लोक मिल जाएगा।

इतने बड़े बड़े कंप्यूटर्स पर माथापच्ची करने से बेहतर था की ये वैज्ञानिक हमारे ब्राह्मणों से आकर ज्योतिष विज्ञान सीख लेते। हमारे ऋषि मुनियों ने तो बहुत पहले ही सब कुछ लिख कर छोड़ रखा है। अब ये न्यूटन, आइंस्टीन सिर्फ़ साक्ष्यों को ही तो जुटा रहे। और साक्ष्य कहते हैं कि प्रकृति विज्ञान के नियमों पर चलती है न कि शेषनाग के फन पर। बताओ ये हमारे ऋषि मुनियों को चुनौती देंगे जिन्होने इतनी तपस्या और साधना की है। शेषनाग भी मिल जाएगा एक दिन।
मुझे डर है कि हमारे सारे भगवान क्रोधित होकर किसी और ही लोक में चले गए हैं। पर हमने तो इतने सारे मंदिर बना दिए, अब तो विदेशों में भी हमारे मंदिरों के ब्रांचेस हैं। भगवान को खुश होना चाहिए कि कलियुग में भी हम राम, कृष्ण सभी को कितना याद कर रहे। (Who is your favourite God)
पूरा का पूरा सोशल मीडिया उन्हीं के नाम पर चल रहा और हमारी तो सरकार भी उन्हीं की है। हमने अपने लिए अस्पताल, विद्यालय, अनुसंधान केंद्र सबको बस्ते में डाल कर भगवान के लिए भव्य मंदिर बनवाए। हनुमान जी आप को तो खुश होना चाहिए आपके राम का भव्य मंदिर बन रहा है। जल्दी ही आपका भी अपना मंदिर बनेगा। हमें फिक्र नहीं की हमें रोजगार के अवसर नहीं मिल रहे और हमारी जिंदगी बदतर होती जा रही पर हम आपकी भक्ति में जगराते कर रहे।
आपने कहा कि ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धा रखो, हमने ठीक वैसा ही किया गरीब ब्राह्मणों और सवर्णों को अपने ही संविधान को ठेंगा दिखाकर आरक्षण दिया। अब कैसे साबित करें कि हम कितने भक्ति से ओत प्रोत हैं। हमें पता है कि आखिर हमसे गलती हुई कहां। अंग्रेज लोगों ने अपना नुक्ता नजर हमारे लोगों को पढ़ा दिया जिसमें बराबरी, आज़ादी और अधिकारों की बात थी और इसके लिए किसी राजा या ब्राह्मण और भगवान पर नही आश्रित रहना था। बात यहां से बिगड़ गई क्यूंकि इससे पहले जब भी इस तरह की बेतुकी बातें हुई हमने उन विचारधाराओं को पनपने ही नहीं दिया बल्कि उस विचारधारा को खुद एक भगवान का दर्ज़ा देकर एक और मंदिर बना दिया।
अब यूरोपीय लोगों ने खुद धर्म को हटा कर एक ऐसे समाज की कल्पना कर डाली जिसमे इंसान खुद का राजा खुद ही चुनता है, खुद के इंसाफ के लिए खुद ही नियम बनाता है और कानून को बराबरी से सब पर लागू करने की बात करता है। बस यही से अधर्म का पथ शुरू हुआ क्यूंकि बराबरी की बात बहुत पिछड़ी सोच है हम तो बहुत विकसित सभ्यता थे हमारे ऋषि मुनियों के आशीष मात्र से औरतें पुत्र रत्न की प्राप्ति कर लिया करती थी। ऐसे विकसित तकनीकी ज्ञान के समक्ष हमें नतमस्तक होना चाहिए था पर नहीं हमें तो एक तुक्ष चीज की अभिलाषा थी, समानता का अधिकार।

मानव ने चार पैरों पर चलना छोड़ा और आग का आविष्कार किया, अपनी अपनी भाषा का विकास किया ये सब तो ठीक था पर अब इतनी हिम्मत की खुद को दो पैरों वाला इंसान बना ले, भगवान नाराज नहीं होगा तो क्या करेगा। पर भगवान कितना दयालु है की हमें वापस से चार पैर वाला जानवर नहीं बना रहा।
शायद यही उनका आशीर्वाद है कि हम राम के सिवा कुछ सोच ही नहीं पा रहे। इन हिंदुस्तानी मुस्लिमों का भी बहुत बड़ा हाथ है हमारे इस अगाध भक्ति में। उनका डर नहीं होता तो हम हिंदू इंसानियत के विकास की अंधी दौड़ में पता नहीं भगवान को कहा छोड़ आते। भला हो इन मुस्लिमों का, ये भी जरूर ही किसी न किसी हिंदू भगवान का अवतार ही होंगे जो इस धरती पर हमें सद्बुद्धि देने पधारे हुए हैं। (Who is your favourite God)
भगवान जी दो चार मंदिर और चाहो तो ले लो बस ये ग्लोबल हंगर इंडेक्स में हमारी भुखमरी मिटा दो। ये प्रार्थना हिंदी में पूरी हो जाएगी या ब्राह्मणों से संस्कृत में प्रेषित कर दूं? वैसे मेरे फेवरेट भगवान तो अब आप ही हो राम जी.
(लेखिका पायल श्रीवास्तव एक स्वतंत्र लेखिका हैं, इंस्टाग्राम चैनल Graphite_Voice के माध्यम से सामाजिक पृष्ठभूमि के कार्टून बनाने के लिए प्रसिद्ध हैं। व्यंगात्मक रूप से लिखे यह विचार उनके निजी है। लेख में प्रस्तुत तस्वीरों काे इबलीस की फेसबुक प्रेस नामक फेसबुक पेज से साभार ली गई हैं।)
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