आधुनिक होते गांव और सिकुड़ते सामाजिक संबंध
कुलदीप समदर्शी, कासगंज, उ.प्र
हमारे देश के गांव हमेशा से ही आपसी सहयोग, भाईचारे और सामूहिक जीवन का प्रतीक रहे हैं। लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में हमेशा साथ खड़े होते थे,और हर घर के बीच एक अटूट रिश्ता होता था। गांव की ये खासियतें उन्हें शहरी जीवन से अलग बनाती थीं। लेकिन जैसे-जैसे गांवों में आधुनिकता का प्रवेश हो रहा है, वैसे-वैसे सामाजिक संबंधों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। हम आधुनिकता अपनाने में अपने गांव की मूल प्रवृत्ति भूलते जा रहे हैं। हम आधुनिक बनने के क्रम में बहुत दिखावे, बनावटी पने के शिकार हो गए हैं। और हम इतने आधुनिक हो गए कि अपना असल रूप भूलते जा रहे हैं। आधुनिक बनने के चक्कर में बहुत खोखले, दिखावटी, बनावटी हो गए है। (Modernizing villages & relations)
आज के समय में हमारे इर्द-गिर्द कई लोग होते हैं, लेकिन फिर भी हमें अक्सर ऐसा लगता है कि कोई हमें पूरी तरह से नहीं समझता। हम एक ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं, जहां हम अपने आप को बहुत अकेला महसूस करते हैं। यह अकेलापन इसलिए नहीं है कि लोग नहीं हैं, बल्कि इसलिए है क्योंकि अब लोगों के पास एक-दूसरे के लिए समय नहीं है। हम इस हद तक आधुनिकता को अपनाने में व्यस्त हो गए हैं कि हमने अपने रिश्तों और संवाद को पीछे छोड़ दिया है।
आधुनिकता ने हमें आगे बढ़ाया है, लेकिन इसके साथ ही यह हमें एक अजीब दौड़ में भी डाल दिया है। हर कोई अपनी जिंदगी की आपाधापी में लगा हुआ है, और इस दौड़ में हम भूल गए हैं कि हमारे आसपास के लोग भी महत्वपूर्ण हैं। पहले लोग एक-दूसरे के साथ बैठकर बातें करते थे, एक-दूसरे की समस्याओं को समझते थे, और उन्हें हल करने में मदद करते थे। लेकिन अब, हम इतनी व्यस्त जिंदगी जी रहे हैं कि किसी के पास दूसरों के लिए समय ही नहीं बचा है। (Modernizing villages & relations)
विश्वास की कमी भी एक बड़ी समस्या बन गई है। पहले लोग बिना झिझक अपने दिल की बातें एक-दूसरे से साझा करते थे। लेकिन अब, हमें किसी पर पूरी तरह से विश्वास करना मुश्किल लगता है। अगर हम किसी पर भरोसा करना भी चाहते हैं, तो उनके पास हमारे लिए समय नहीं होता। यह एक बड़ी विडंबना है कि हम इंसान, जो कि समाज के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से हैं, अब एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं।
यह स्थिति विशेष रूप से उन युवाओं के लिए चिंताजनक है, जो अपने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण अवस्था से गुजर रहे हैं। युवा अवस्था में हमें शिक्षा के साथ-साथ इंसानियत और रिश्तों को भी समझने की जरूरत होती है। लेकिन आज के समय में युवा भी इस दौड़ का हिस्सा बन गए हैं। उन्हें केवल यही सिखाया जाता है कि कैसे सफलता की सीढ़ियां चढ़नी हैं, लेकिन यह नहीं बताया जाता कि इंसान के रूप में कैसे संवेदनशील बने रहना है।
हमारे सपने भी अब हमारे नहीं रहे। समाज ने हमें यह सिखा दिया है कि हमें क्या करना है, कैसे जीना है, और क्या सपने देखने हैं। हम खुद को जानने की कोशिश तक नहीं करते कि हम असल में क्या चाहते हैं। क्या हम सच में खुश हैं? क्या हम सच में वही जीवन जी रहे हैं, जो हमने चाहा था?
आज के समय में इंसान मशीन की तरह काम कर रहा है। संवेदनाएं, भावनाएं और संबंध कहीं खो गए हैं। लोग केवल अपने काम में लगे हुए हैं, जैसे कि वे किसी मशीन का हिस्सा हों। इंसान को आधुनिक बनाने की प्रक्रिया में हमने अपनी इंसानियत कहीं खो दी है।
गांव, जो कि कभी समाज के सबसे मजबूत आधार हुआ करते थे, अब धीरे-धीरे बदल रहे हैं। गांवों में भी आधुनिकता ने अपने पैर जमा लिए हैं, और इसके साथ ही सामाजिक संबंधों में भी कमी आई है। पहले गांवों में हर कोई एक-दूसरे का हाथ थामे रहता था, सुख-दुख एक दूसरे के साथ बांटे जाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। तकनीक ने हमें करीब तो लाई है, लेकिन हमारे रिश्तों को दूर कर दिया है। (Modernizing villages & relations)
आधुनिकता के साथ आगे बढ़ना जरूरी है, लेकिन यह भी जरूरी है कि हम अपने सामाजिक संबंधों को न भूलें। हमें यह समझना होगा कि इंसानियत और रिश्तों से बढ़कर कुछ नहीं है। अगर हम एक-दूसरे से बातचीत करेंगे, तो यह समय की बर्बादी नहीं होगी, बल्कि यह हमारी जिंदगी को और भी सुंदर बनाएगा।
आज के समय में यह जरूरी है कि हम थोड़ा रुकें, सोचें, और अपने रिश्तों को फिर से जीवित करें। हमें यह याद रखना चाहिए कि हम इंसान हैं, और इंसान होने का मतलब है एक-दूसरे के साथ जुड़ना, एक-दूसरे की भावनाओं को समझना और उनकी मदद करना। अगर हम ऐसा नहीं करेंगे, तो शायद वह दिन दूर नहीं जब इंसानियत विलुप्त हो जाएगी और हम केवल एक मशीन की तरह जीते रहेंगे, जिसमें संवेदनशीलता का कोई स्थान नहीं होगा। सामाजिक संबंध जैसे शब्द सुनने को भी शायद न मिले।
–कुलदीप समदर्शी, नवोदित लेखक