बिहार की मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर उठा ‘वोट चोरी’ विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और चुनाव आयोग को कड़ी फटकार लगाई, साथ ही यह स्पष्ट किया कि यदि बड़े पैमाने पर त्रुटि साबित होती है, तो चुनावी प्रक्रिया को रद्द भी किया जा सकता है।
बिहार में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत मतदाता सूची के संशोधन में 65 लाख से अधिक नाम हटाए जाने का मामला सुर्खियों में है। आरोप है कि तकनीकी प्रक्रिया के नाम पर बड़ी संख्या में असली मतदाताओं को सूची से बाहर कर दिया गया, जिससे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हो रहा है।
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार और चुनाव आयोग दोनों से जवाब मांगा। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता से समझौता किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं है और यदि गड़बड़ी साबित हुई, तो इसे ‘लोकतंत्र के साथ खिलवाड़’ माना जाएगा।
राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने अदालत में दो ऐसे मतदाताओं को पेश किया, जिन्हें चुनाव आयोग ने “मृत” घोषित कर सूची से हटा दिया था, जबकि वे जीवित हैं। यादव ने कहा कि SIR अब तक की सबसे बड़ी ‘डिलीशन ड्राइव’ बन गई है, जहां नए नाम जोड़ने की बजाय पुराने नाम हटाने पर जोर दिया जा रहा है।
उनकी इस प्रस्तुति से अदालत भी चौंक गई। चुनाव आयोग के वकील ने इसे ‘ड्रामा’ बताते हुए कहा कि गलती सुधारने के लिए फॉर्म भरना चाहिए, लेकिन अदालत ने नागरिकों द्वारा सीधे न्यायालय में आने को लोकतांत्रिक जागरूकता का अच्छा संकेत बताया।
राहुल गांधी ने इसे सीधे-सीधे ‘वोट चोरी’ करार दिया और कहा कि यह लोकतंत्र के खिलाफ साजिश है। कांग्रेस ने ‘लोकतंत्र बचाओ मशाल मार्च’ निकाला, जिसमें राहुल और प्रियंका गांधी ने भाग लिया और ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ के नारे लगे।आरजेडी ने आरोप लगाया कि यह सिर्फ चोरी नहीं बल्कि ‘डकैती’ है। अखिलेश यादव, शशि थरूर और कई विपक्षी नेताओं ने भी राहुल गांधी के रुख का समर्थन किया और इसे लोकतंत्र पर हमला बताया।
बीजेपी नेता भूपेंद्र यादव ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी और विपक्ष जानबूझकर संवैधानिक संस्थाओं की साख गिरा रहे हैं और गलत आंकड़े पेश कर जनता को गुमराह कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और चुनाव आयोग को विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। अगले हफ्ते होने वाली सुनवाई में तय हो सकता है कि SIR प्रक्रिया में सुधार होगा या इसे रद्द कर नया संशोधन अभियान शुरू किया जाएगा।
यह मामला आने वाले विधानसभा चुनावों के राजनीतिक समीकरणों को गहराई से प्रभावित कर सकता है।