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Thursday, March 12, 2026
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असंतोषजनक शिक्षक-छात्र व्यवहार एवं नई शिक्षा नीति की अवधारणा

वर्तमान में शिक्षा मानव जीवन के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण तत्व बन चुका है बिना शिक्षा और ज्ञान के मानव जीवन कठिन है। मनुष्य और जानवर में अंतर यही है कि मनुष्य में सोचने समझने की क्षमता होती है बुद्धि और विवेक होता है। शिक्षा का स्तर जैसे- जैसे बढ़ रहा है वैसे- वैसे मूल्यों का ह्रास भी हो रहा है। आज इंसान भोग विलासिता में इतना खो गया है कि वह नैतिक मूल्य और सामाजिक मूल्य से आत्मसात करने में विफल होता जा रहा है और व्यवहार ऐसा हो गया है कि वह समाज से अपने आप को अलग-थलग स्थापित कर रहा है। जब बात शिक्षा और मानवीय मूल्यों की आती है तो हम देखते हैं कि प्राचीन कल से ही शिक्षक-छात्र संबंध, नैतिक मूल्य, आदर्श आचरण के बारे में बहुत कुछ कहा और लिखा गया है। भारत की पहचान विश्व स्तर पर इन्हीं मूल्यों के कारण बनी है अन्य देशों की अपेक्षा हमारे मूल्य बहुत ही उच्च हैं। जैसे- जैसे शिक्षा का व्यवसायीकरण हो रहा है और शिक्षा निजी हाथों में पहुंची रही वैसे-वैसे शिक्षा इनपुट और आउटपुट की प्रक्रिया में आ रही है। शिक्षा में जितना पैसा हम देंगे उतनी शिक्षा मिलेगी। मतलब शिक्षा बेची जा रही है और बेचने वाला व्यापारी हो गया तो अब उसका उद्देश्य मानवीय मूल्यों का विकास करना नहीं रह गया उसको तो पैसे से मतलब आपके ज्ञान और व्यवहार के परिवर्तन से नहीं रह गया। कहते अकसर सुना होगा कि मैं अपने जीवन में बहुत ही प्रैक्टिकल हो गया हूं। प्रैक्टिकल शब्द का आशय लेन-देन वाले संबंध स्थापित हो रहे है यदि आपकी उपयोगिता नहीं है तो इंसान तुरन्त आपसे संबंध रखना पसंद नहीं करेगा। यह सब सामाजिक प्रणाली के विरोधाभासी है। यह समाज में भाईचारा और प्रेम को बढ़ावा नहीं देता है, प्राथमिक से उच्च स्तर या शोध पर हम पाते हैं कि शिक्षक छात्र संबंध और शिक्षा प्रणाली में अमूल चूल परिवर्तन हुए हैं। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। अगर कोई भी शिक्षा प्रणाली या नियम बनाया गया है तो वह समय काल परिस्थिति के अनुसार बदला जाएगा परंतु उसका सही तरीके से क्रियान्वयन बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। नई शिक्षा नीति 2020 लागू हो गई है जो बहुत अच्छी है तो कुछ कमियां भी है।

प्राथमिक स्तर पर शिक्षा को धीरे-धीरे बेहतर किया जा रहा है परंतु निजी संस्थाएं मजबूती के साथ स्थापित हो रही इनके स्थापित होने के पीछे बहुत से कारण हैं सरकार की नीतियाँ एवं व्यावसायिक वर्ग की मजबूत शाखाएं एवं आर्थिक मजबूती के साथ सरकारी शिक्षकों के निजी स्वार्थ एवं अपने कार्य के प्रति जवाबदेही न होना भी सरकारी स्कूलों को कमजोर कर रहा है। शिक्षकों को हर स्तर पर प्रयास करना चाहिए कि सरकारी संस्थाएं बची रहे; अगर सरकारी संस्थाएं हैं तभी तक उनका अस्तित्व है, अन्यथा उनका अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा। शिक्षा प्रणाली में नैतिक मूल्य और व्यवहार कुशल होना बहुत ही महत्वपूर्ण है जो धीरे-धीरे खत्म हो रही है यह एक चिंता का विषय है अब शिक्षक और छात्र संबंधों में वह बात नहीं देखी जाती जिसकी हम अपेक्षा करते रहते हैं। अब शिक्षक छात्रों के साथ वैसा व्यवहार नहीं कर पा रहे हैं कि छात्र का लगाओ शिक्षा के प्रति और रुचिकर बने जबकि दंडात्मक प्रणाली को खत्म कर दिया गया है इसके बावजूद नामांकन में उतनी वृद्धि नहीं हुई जितनी आशा की गई थी। 20वी सदी से व्यवहार कुशलता पर अधिक बल दिया जा रहा है। परंतु परेशानियां भी जन्म ले रहीं है इसके राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक कारण हैं परंतु शिक्षक का शिक्षा के प्रति लगाओ और छात्रों के प्रति समर्पण भाव में कमी को मुख्य रूप से देखा जा सकता है। जब शिक्षक व्यवहार कुशल नहीं होते फिर उनसे अच्छे व्यवहार की अपेक्षा करना निरर्थक है।

एक शिक्षक को यह अंदाजा नहीं रहेगा कि हम किस कक्षा के छात्रों को पढ़ा रहे और उनके साथ किस स्तर का व्यवहार कर रहे हैं तो उसका शिक्षण कार्य व्यर्थ है और वह शिक्षा नहीं दे रहा वह शिक्षा के नाम पर विष घोल रहा। विश्वविद्यालय स्तर पर अध्ययन के दौरान यह देखा है कि जैसे-जैसे शिक्षा का स्तर उच्च हो रहा है वैसे-वैसे शिक्षक और छात्र में संबंध निम्न स्तर का हो रहा है। शिक्षकों में अपने आत्मसम्मान को लेकर बहुत सजगता रहती। एक विश्वविद्यालय के छात्रों से प्राप्त आंकड़े के अनुसार लगभग 30% से 40% शिक्षक पूर्ण ईमानदारी के साथ और अपने कार्य के प्रति बहुत ही जवाबदेही है और चाहते हैं कि हमारे पढ़ाए हुए छात्र आगे बढ़े और नाम रोशन करें। प्रोफेसर एल.आर. शर्मा गर्मियों की छुट्टियों में भी छात्रों को पढ़ाने विश्वविद्यालय आ जाते थे। वहीं प्रोफेसर एस.के शर्मा ने DSW का पद इसलिए छोड़ दिया था क्योंकि वह बच्चों को पढ़ा नहीं पाते थे। उनका कहना था मेरी नियुक्ति पढ़ाने के लिए हुई अगर इससे फुर्सत मिलेगी तब ही किसी और की ज़िम्मेदारी ले सकता हूँ वहीं दूसरी तरफ़ कुछ शिक्षक प्रशासनिक पद पाने के लिए हमेशा प्रयासरत और पद मिलते अपना असली रूप दिखाना शुरू कर देते हैं। बहुत से ऐसे शिक्षक है जो हमेशा छात्रों के सवालों का जवाब देने के लिए तैयार रहते हैं और हमेशा हौसला बढ़ाते रहते हैं कि सवाल पूछा करो जो भी मन में आए मैं तो इसीलिए हूं। वहीं कुछ ऐसे भी शिक्षक जिनसे कुछ पूछना मतलब अपराध करना है एक सवाल का जवाब देने से पहले 10 सवाल वह छात्र से पूछते हैं और तंज कसने में माहिर होते तुम हिंदी अच्छी बोलते, तुम अंग्रेज़ी अच्छी बोलते; उसके बाद छात्र उनसे कोई सवाल नहीं करता वहीं कुछ यह भूल जाते हैं कि वह शिक्षक है उनका व्यवहार एक तानाशाह की तरह रहेगा और हमेशा छात्रों की कमियां देखेंगे और मूल्यांकन के दौरान अपनी भड़ास निकलते हैं; यह कक्षा कक्ष हो या बाहर हो वह हमेशा अपनी और अपने ज्ञान की प्रशंसा करेंगे और दूसरे शिक्षकों की आलोचना। तुम्हारा भविष्य मेरे हाथ में है ऐसी धमकी देते अगर किसी छात्र का व्यवहार पसंद नहीं आता है।“I am the best” का भाव एक शिक्षक में नहीं होना चाहिए उसका ध्यान छात्रों को सिखाने पर होना चाहिए। विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान मैंने पाया एक शिक्षक अपने आप को दर्शनशास्त्र का बहुत बड़ा विद्वान समझते हैं और शिक्षण के दौरान घटिया उदाहरण देते; यह संवाद के दौरान छात्रा से कहते हैं कि तुम जब तक बच्चा नहीं पैदा करोगी तो बच्चा पैदा करने का अनुभव कैसे प्राप्त करोगे वह दर्द कैसे सहोगी पहले तुमको बच्चा पैदा करना होगा तभी जान पाओगी कि उसमें क्या-क्या समस्याएं होती है। परन्तु ऐसे शिक्षकों से उनके मन मुताबिक सवाल नहीं किया जाता तो उस सवाल को बहुत ही घटिया और छात्र के स्तर को बहुत निम्न बता देते हैं; उदाहरण की एक सीमा होती है यदि हम अच्छे उदाहरण कक्षा कक्ष में प्रस्तुत करेंगे तो छात्रों में एक सकारात्मक सोच विकसित होगी।

एक अन्य संवाद में वह शिक्षक कहते हैं कि तुमको अपनी सोच को उच्च करना चाहिए और सवाल ऐसी करनी चाहिए जो यह बताएं कि तुम अब बड़े कक्षा में अध्ययन कर रहे हो, जब छोटी कक्षा कक्ष में उसे जो नहीं सिखाया गया तो सवाल करेगा यह भी शिक्षक को समझना चाहिए। विश्वविद्यालय स्तर पर कुछ शिक्षकों में आत्म सम्मान, गरिमा उच्च स्तर पर होती है परंतु शिक्षण कार्य निम्न स्तर का होता है। किसी शिक्षक को किसी विशेष ज्ञान में कोई महारत हासिल है तो वह अपने आप को बहुत ही विद्वान समझता है और उस ज्ञान को सिखाने समझाने से पहले वह छात्र के साथ बहुत ही अपमानजनक व्यवहार करता है जैसे वह छात्र गुलाम हो। उनका कोई भी सामान छात्र उपयोग नहीं कर सकते एक पैसा छात्रों के हित में खर्च नहीं करेंगे वहीं प्रोफ़ेसर एन बी सिंह आपदा आने पर छात्रों के साथ आम राहगीरों के जलपान में सहायता के लिए अपना वेतन खर्च कर देते है।जब शिक्षक शिक्षण कार्य में दक्ष नहीं होता वह कक्षा हो या कक्षा के बाहर हमेशा राजनीति करते मिलेंगे इसके साथ हमेशा अपने विरोधियों की खोज और सबक सीखने की रणनीति तैयार करते रहते है। यह सब व्यवहार जब एक छात्र देखता है तो उसके मन में उस शिक्षक के प्रति नकारात्मकता आ जाती और वह उस शिक्षक के साथ सामंजस्य स्थापित करने में असहज महसूस करता है।

भ्रष्ट शिक्षक – भ्रष्ट भविष्य:शिक्षा क्षेत्र में भ्रष्टाचार का एक और प्रकार धोखाधड़ी और शैक्षणिक बेईमानी है जो पदाधिकारियों के ज्ञान और समर्थन से की जाती है। इसमें साहित्यिक चोरी, अकादमिक शोध में डेटा को गलत तरीके से प्रस्तुत करना और छात्रों को ऐसे अंक देना शामिल है जिसके वे हकदार नहीं हैं। इस प्रकार की प्रथाएँ समाज की सेवा करने वाले विभिन्न व्यवसायों की योग्यता और साख में विश्वास को कम करके संपूर्ण शिक्षा प्रणाली की नींव को कमजोर करती हैं। इसके अलावा, जब शिक्षक भ्रष्ट तरीके से व्यवहार करते हैं, तो यह छात्रों की ईमानदारी, निष्ठा और निष्पक्षता के बारे में विश्वास और दृष्टिकोण को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है, जिसका उनके अपने भविष्य के व्यवहार पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है। प्रोफेसर विक्रम कहते हैं कि छात्रों के नाम देखकर नंबर दिए जाते छात्रों के साथ दुर्व्यवहार होता है उनके सामाजिक स्तर को देखकर व्यवहार किया जाता है। जो शिक्षक अपने आप को बहुत बड़ा विद्वान समझते हैं या किसी विषय का विशेषज्ञ समझते हैं वह छात्रों के साथ सामंजस्य स्थापित करने में हमेशा पीछे रहते हैं और वह सिर्फ अपने कुछ चाहते छात्रों के साथ ही मधुरता से पेश आते हैं अन्य छात्रों के साथ हमेशा उनका व्यवहार कठोर रहता है और अन्य छात्रों के साथ अपमान की दृष्टि से संवाद करते हैं।जितनी भी शिक्षा नीतियों बनी है उनमें हमेशा ही नैतिक मूल्यों और छात्र संबंध के बारे में बात की गई है।नई शिक्षा नीति 2020 में शिक्षक-छात्र संबंध और नैतिक मूल्यों पर जोर दिया गया है। नीति में कहा गया है कि:
1. शिक्षक-छात्र संबंध: यह संबंध समर्पण और विश्वास पर आधारित होना चाहिए। शिक्षकों को छात्रों के मानसिक और भावनात्मक विकास में मदद करनी चाहिए।
2. नैतिक मूल्य: नैतिक और सामाजिक मूल्यों को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा, ताकि छात्र अच्छे नागरिक बन सकें। मूल्य आधारित शिक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी।
3. व्यावहारिक दृष्टिकोण: शिक्षा में नैतिकता और जीवन कौशल को शामिल करने का प्रयास किया जाएगा, जिससे छात्र व्यवहारिक जीवन में इन मूल्यों का पालन कर सकें।

इस नीति का मुख्य उद्देश्य एक समग्र और समावेशी शिक्षा प्रणाली को विकसित करना है, जिसमें शिक्षक और छात्र दोनों के लिए सकारात्मक और सहयोगात्मक वातावरण हो। शिक्षकों को सभी छात्रों के साथ समान व्यवहार करना होगा और यह भी समझना होगा कि हमारा व्यवहार और ज्ञान छात्र के जीवन के लिए उपयोगी है कभी भी उनके सवाल को अपने आत्म सम्मान से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए इसलिए ऐसा न करें जिससे छात्र के मन और मस्तिष्क में गलत अवधारणा विकसित हो जाए। जैसे व्यवहार की अपेक्षा हम छात्रों से करें वैसा व्यवहार पहले अपनी आदत में लाना होगा। किसी भी छात्र के साथ दुश्मन या गुलाम के भाव के साथ संवाद नहीं करना चाहिए। आप के व्यवहार या शिक्षण कार्य से एक भी छात्र असंतुष्ट है तो आप असफल माने जायेंगे। आपकी सफलता और आपके ज्ञान का प्रत्यक्ष प्रमाण आपके छात्र हैं छात्रों का जान और व्यवहार ही आपकी पहचान विकसित करेगा ।यही भाव एक शिक्षक में होना चाहिए।

[आशीष कुमार (शोधार्थी), इलाहाबाद विश्वविद्यालय,प्रयागराज ]


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