अपना दल (सोनेलाल) का ओबीसी पर कांग्रेस-सपा से दो टूक सवाल
डॉ. विश्वंभर नाथ प्रजापति (पीएचडी,जेएनयू), असिस्टेंट प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, यू.एन.पी.जी कॉलेज पडरौना- कुशीनगर
राजनीति को सत्ता के एक मजबूत हथियार के रूप में देखा गया है जो समाज में कई तरह के बदलावों को लाता है. राजनीति का एक उद्देश्य संघर्षों का हल (कनफ्लिक्ट रेजोल्यूशन) और लोक कल्याण भी है. समाज में व्याप्त संघर्षों को कम करना और उसको एक सही दिशा देकर सामाजिक न्याय की राजनीति करना सृजन की राजनीति करना है . इस सृजन की राजनीति को आज आगे बढ़ा रहा है अपना दल (एस). 14 दिसम्बर 2016 में अपना दल(एस) की स्थापना से लेकर आज तक दल ने तथागत गौतम बुद्ध, बाबा साहेब अंबेडकर, सरदार वल्लभभाई पटेल, शाहू जी महाराज, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले की विचारधारा को अपनाया. यशाकायी डॉ०सोनेलाल पटेल के सपने को साकार किया है. वंचित वर्गों के लिए सृजन का काम किया है. अपना दल का उद्देश्य है “…जहां सभी जाति, पंथ व संप्रदाय के लोगों को स्वतंत्र रूप से विकास का समान अवसर हो तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं , प्रशासनिक व्यवस्थाओं आदि स्थानों में भेदभाव रहित समाज के सभी वर्गो की हिस्सेदारी व भागीदारी हो जिससे समता-समरसतायुक्त और शोषणमुक्त समाज की स्थापना हो.” संघर्षों के हल और लोक कल्याण के लिए सत्ता पक्ष में रहते हुए भी उसने ओबीसी के हितों के लिए काम कराए हैं और जहां जरूरत पड़ी है वहां पर विपक्षियों पर सवाल भी दागे हैं. सरकार से भी अपनी चीज मनवाई है और जो सरकार के विरोध में रहे हैं उनको भी कटघरें में खड़ा किया है. अपना दल कास्ट सेंसस, ऑल इण्डिया ज्युडिशियल सर्विसेज, यूपी में 69000 शिक्षकों की भर्ती की लड़ाई से कभी भी समझौता नहीं किया. राजनीति करने के कई तरीके हो सकते हैं. एक सत्ता में रहकर, एक विपक्ष में रहकर. जहां विपक्ष सत्ता पक्ष को घेरने के फिराक में रहता है और सत्ता पक्ष अपने हर किए-धरे को सही ठहरने में लगा रहता है.ऐसे में सहयोगी दलों की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण होती है. वास्तव में यही मध्यम मार्ग है और सृजन की राजनीति है जो की विपक्ष को अति आक्रामक होने से और सत्ता पक्ष को अहंकारी होने से बचाता है. छोटे दल अपने मुख्य उद्देश्यों के लिए अनवरत लगे रहते हैं. आज इसका परिणाम यह है कि विधानसभा में प्रतिनिधियों के लिहाज से अपना दल (सोनेलाल) यू पी की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है .
नीट में ओबीसी आरक्षण कांग्रेस के सरकार में बिल्कुल भी नहीं रहा. सन 2014 से पहले कांग्रेस को कभी होशो हवास भी नहीं था कि यह कोई बहुत बड़ा मुद्दा है लेकिन अनुप्रिया पटेल ने यह मामला बड़ा ही जोर-शोर से उठाया था. यही नहीं ओबीसी के मामले को हल करने के लिए उन्होंने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि अगर इस देश में अलग से माइनॉरिटी के लिए मिनिस्ट्री हो सकती है अलग से ट्राइबल के लिए मिनिस्ट्री हो सकती है तो भारत का सबसे बड़ा समुदाय ओबीसी है जिसकी आबादी 60 फ़ीसदी के करीब है उसके लिए आज तक ओबीसी मिनिस्ट्री क्यों नहीं है? और इसके लिए वह लगातार प्रयत्नशील भी हैं. एनडीए नीत गठबंधन में भी यह बात लगातार वह बोलती रहती हैं. उनको पूरा उम्मीद है कि जैसे बाकी मसलों को पिछड़ों-वंचितों के लिए हल कर लिया वैसे ही इसको भी हल कर लेंगे.
इसके साथ वह पुरवर्ती कांग्रेस और सपा से सवाल पूछती हैं कि क्या ओबीसी ने कांग्रेस को माफ कर दिया है यह बहुत बड़ा सवाल है ? क्या राहुल गांधी के कह देने मात्र से ओबीसी को उनकी बात से खुश हो जाना चाहिए. कांग्रेस ने काका कालेलकर कमेटी भी लागू करना तो दूर की बात है उसको सुधार करके लागू करने की भी कोशिश नहीं की. सन 1955 में बना आयोग 1980 तक लागू नहीं कभी हुआ. मण्डल कमीशन बनाना पड़ा. प्रश्न उठता है कि अगर 70% लोग आरक्षण के दायरे में आ जा रहे थे तो आखिर कांग्रेस को इससे दिक्कत क्या थी? अभी भी तो कितने राज्यों में 70% आरक्षण हो रहा है. कांग्रेस जब विपक्ष में होती है तब वह ओबीसी की बातें करती है. राहुल गांधी दिखावा करने के लिए हाथ में संविधान ले के घूमते हैं लेकिन सत्ता में आते ही कांग्रेस अपने मूल चरित्र संविधान विरोधी, ओबीसी विरोधी और दलित विरोधी हो जाती है. इसका एक छोटा सा बानगी हम लोग देखते हैं. सन 1977 के उपचुनाव में फुलपरास (मधुबनी) से जब भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर जनता पार्टी से चुनाव लड़ रहे थे वहां पर कांग्रेस ने एक यादव को कैंडिडेट खड़ा किया और यह प्रचार-प्रसार किया कि मधुबनी यादव बाहुल्य है, हमने यादव कैंडिडेट दिया है यहां से कर्पूरी ठाकुर को हराइए क्यूंकि अगर कर्पूरी ठाकुर जीत गए तो यादवों का वर्चस्व ख़त्म हो जायेगा. पिछड़ों की वर्गीय राजनीति पर ‘जाति की राजनीति’ कांग्रेस ने ही शुरू करवाई है जबकि कायदे से राजनीति दलित-पिछड़ों, वंचितों और समाजवाद की होनी थी लेकिन कांग्रेस ने बाबा साहब अम्बेडकर की तरह कर्पूरी ठाकुर को भी निशाने पर लिया हालांकि कांग्रेस खुद ही मुंह की खाई. कर्पूरी ठाकुर की लोकप्रियता इतनी ज्यादा थी और पिछड़े वर्गों में जाति अभी उतना हावी नहीं हुआ था इस वजह से वह जीत गए. जननायक कर्पूरी ठाकुर को अनुप्रिया पटेल पिछड़ों का सबसे बड़ा आदर्श नेता मानती हैं. उनके कार्यों को रेखांकित करते हुए अपना दल ने लगातार उनके लिए पहले भी भारत रत्न की मांग की थी. बाद में एनडीए सरकार ने भारत रत्न दिया. वहीँ कांग्रेस की करतूत देखिए, कांग्रेस ने कभी बाबा साहब को भारत रत्न नहीं दिया, उनको चुनाव में हराने की कोशिश की थी. वहीं गलती करीब तीन दशकों बाद कांग्रेस ने फिर से दोहराई. कर्पूरी ठाकुर को विधानसभा के चुनाव में हराने की कोशिश की. भारत रत्न भी कभी नहीं दिया. भारत रत्न एनडीए सरकार में मिला. अब प्रश्न उठता है कि कांग्रेस ऐसा क्यों करती रही है? क्या यही ‘मोहब्बत की दुकान’ है?जिसमें दलित-पिछड़ों के नेतृत्व को कुचलने की पूरी कोशिश होती है. ओबीसी कमीशन के पास दशकों तक कोई भी संवैधानिक अधिकार नहीं रहा. ओबीसी कमीशन को इतना कमजोर बनाया गया कि ओबीसी का हक बचाना तो दूर की बात थी कमीशन अपना अस्तित्व बचाने में ही लग रहा. कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए कभी भी उसको संवैधानिक दर्जा ही नहीं दिया. क्या किसी ने कांग्रेस को मना किया था? तो क्या ओबीसी ने यह छल भुला दिया है? सन 1947 से अप्रैल 1967 तक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार में कैबिनेट में पिछड़े वर्ग का कोई भी मंत्री नहीं हुआ. यही नहीं छेदीलाल साथी कमीशन (1975-1977) ने उत्तर प्रदेश सरकार को 17 मई 1977 को अपनी संस्तुति दी जिसने ओबीसी आरक्षण बढ़ाने और तीन हिस्सों में वर्गीकृत करने की बात की थी: पिछड़ा वर्ग, सर्वाधिक पिछड़ा वर्ग और बैकवर्ड मुस्लिम. रिपोर्ट सौपनें के कुछ दिन बाद राम नरेश यादव मुख्यमंत्री बने वह चाहते तो कर्पूरी ठाकुर की तरह साथी कमीशन की रिपोर्ट लागू करके यूपी के लिए जननायक बन सकते थे लेकिन वह नाकामयाब रहे. कांग्रेस ने कभी उस कमीशन को लागू ही नहीं होने दिया और काका कालेलकर रिपोर्ट की तरह छेदी लाल साथी रिपोर्ट भी इतिहास के तहखाने में दब गई. इस रिपोर्ट को विधानमंडल के दोनों सदनों में कभी रखा ही नहीं गया. प्रश्न यह उठता है कि आखिर कांग्रेस ने ऐसा क्यों किया? इस तरह से कांग्रेस ने बड़ी ही निर्दयता से पिछड़ों के अधिकारों के लिए बने कमीशन की बातों को दरकिनार करते हुए उसे मामले को ही सदा के लिए रफा-दफा कर दिया.
अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण बात, कुछ लोगों को लगता है कि कांग्रेस बहुत बढ़िया बात कर रही है. बहुत सारे लोगों को नहीं मालूम है की ओबीसी को भी पदोन्नति में आरक्षण मिलता रहा है. बीपी सिंह के समय में भी कांग्रेस इस कदर हावी रही कि उसने ओबीसी के हितों को बहुत ही भयानक नुकसान पहुंचा जिसकी आज तक भरपाई नहीं हो पाई है. 30 सितंबर, 1981 को उत्तर प्रदेश की कांग्रेस सरकार से एक शासनादेश आया जिसने ओबीसी के जले पर नमक छिड़क दिया. शासनादेश जी. ओ. संख्या 5119/चालीस-1-8-1-15(28) 80 के माध्यम से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का आरक्षण पदोन्नति में तो जारी रखा गया लेकिन इसी शासनादेश से ओबीसी का पदोन्नति में आरक्षण खत्म कर दिया गया. कांग्रेस ने बहुत ही बड़ा ऐतिहासिक छल किया ओबीसी के साथ. ज्ञात हो कि सपा ने भी सन 2012 में पदोन्नति में आरक्षण का विरोध करके हजारों लाखों अनुसूचित जाति और जनजाति के कर्मचारियों को पद-अवनति की तरफ धकेल दिया. कांग्रेस तीन दशक पहले ही उत्तर प्रदेश में पूरे ओबीसी को धकेल चुकी थी. छल की समानता देखिये, आज कांग्रेस-सपा में गठबंधन है. दोनों का काम एक जैसा हुआ. कांग्रेस ने पिछड़ों का हकमरी किया उनका पदोन्नति का अधिकार हमेशा के लिए छीन लिया. सपा ने शेड्यूल कास्ट और शेड्यूल ट्राइब के अधिकारों के साथ खिलवाड़ किया. कांग्रेस पीडीए का पूरा पी(पिछड़ा) ही चबा गयी और सपा पीडीए का पूरा डी (दलित) ही निगलने की कोशिश करती रही है. अब ए का मतलब केवल अशराफ है. तो क्या बार-बार हुए छल को पिछड़े वर्ग को भूल जाना चाहिए? क्या माफी और कह देने देने मात्र से ओबीसी के साथ हुआ अन्याय खत्म हो जाएगा. इसलिए वर्तमान एनडीए सरकार कांग्रेस की बहुत सारे पुरानी गलतियों को सुधार रही है जिसमें बड़ी भूमिका अपना दल (सोनेलाल) की है जिसने दलितों, पिछड़ों, वंचितों के लिए सामाजिक न्याय और विकास सुनिश्चित कराया है.