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Friday, October 16, 2026
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बरेली सनराइज अस्पताल कांड: 9वें दिन भी धरना जारी, CMO पर सवाल, रिपोर्ट के बाद कार्रवाई क्यों नहीं ?

बरेली के सनराइज अस्पताल में उर्वेश यादव की संदिग्ध मौत मामले में नौ दिन से अनिश्चितकालीन धरने पर बैठा पीड़ित परिवार इंसाफ की गुहार लगा रहा है, लेकिन सिस्टम अब भी खामोश है। मामला सनराइज अस्पताल में हुए कथित गलत इलाज से जुड़ा है, जहां गलत इलाज के कारण उर्वेश यादव की मौत हुई। कानूनी कार्यवाही में इसे फिलहाल गैर इरादतन हत्या BNS 106 के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन पीड़ित परिवार इसे जानबूझकर की गई गैर इरादतन हत्या मानते हुए BNS की धारा 105 बढ़ाने की मांग कर रहा है। इसके साथ ही आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर पीड़ित परिवार 9 दिन से बरेली के सेठ दामोदर स्वरूप पार्क में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठा है।
हैरानी की बात यह है कि तीन महीने पहले आई चिकित्सा विभाग की रिपोर्ट में गंभीर लापरवाही, विशेषज्ञता से बाहर इलाज और आयुष्मान घोटाले की पुष्टि होने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। सिर्फ 2 लाख 70 हजार रुपये वापस कर दिए गए, और मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। ऊपर से बताया जा रहा है कि यह रुपए दे दिए गए अब कार्यवाही पूरी।
रिपोर्ट में खुद चिकित्सा विभाग ने अस्पताल को आयुष्मान योजना से हटाने, भारी जुर्माना लगाने और यहां तक कि अस्पताल को बंद करने अर्थात सस्पेंशन की संस्तुति की है। इसके बावजूद अस्पताल धड़ल्ले से चल रहा है। सवाल साफ है, जब विभाग खुद दोष तय कर चुका है, तो कार्रवाई क्यों नहीं?
जब इंडस न्यूज़ टीवी ने 23 मार्च को जिलाधिकारी से बात की, तो उन्होंने जिम्मेदारी सीएमओ पर डाल दी। सीएमओ से जवाब मांगने पर पहले “कल आओ”, फिर “शाम को आओ”, और फिर “दो दिन बाद बताएंगे” — यह टालमटोल खुद बहुत कुछ कह रही है। इतना ही नहीं, तीन महीने बाद “विधिक राय” लेने की बात करना भी सवालों के घेरे में है, क्या इतने समय तक फाइल दबाकर रखी गई?
हालांकि सीएमओ ने यह जरूर माना कि आरोपी डॉक्टर रेहान अहमद एनेस्थीसिया विशेषज्ञ हैं और किडनी/गंभीर बीमारी का इलाज नहीं कर सकते—जो मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट से मेल खाता है। यानी लापरवाही पर विभाग खुद मुहर लगा चुका है, फिर भी कार्रवाई शून्य।
दूसरी तरफ, आज मोंटी शुक्ला फिर धरना स्थल पहुंचे और साफ कहा कि जब तक अस्पताल बंद नहीं होता और परिवार को न्याय नहीं मिलता, आंदोलन जारी रहेगा।
कानूनी रूप से देखें तो Clinical Establishments Act, 2010 के तहत ऐसी स्थिति में अस्पताल का रजिस्ट्रेशन रद्द कर तुरंत सील अर्थात् Closure किए जाने का प्रावधान है। वहीं आयुष्मान घोटाले में नियमों के तहत ब्लैकलिस्ट और दंड का प्रावधान है। आपराधिक कानून में भी BNS की धारा 105, 106, 318, 316 जैसी धाराओं में कार्रवाई बनती है। यानी कानून हर स्तर पर कार्रवाई की मांग कर रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है।
अस्पताल के खिलाफ और भी गंभीर सवाल हैं—बिल्डिंग मानक पूरे नहीं, पार्किंग नहीं, फायर सेफ्टी व्यवस्था संदिग्ध, ब्लड बैंक संचालन पर भी सवाल—फिर भी सब कुछ “नॉर्मल” दिखाया जा रहा है। क्या यह सब सीएमओ की जानकारी के बिना हो सकता है?
अब बड़ा सवाल यही है—क्या यह सिर्फ लापरवाही है या फिर जानबूझकर कार्रवाई रोकी जा रही है? गरीब परिवार 9 दिन से सड़क पर बैठा है, पहले अस्पताल ने लूटा और अब सिस्टम उसे न्याय के लिए भटका रहा है। यह मामला अब सिर्फ एक अस्पताल का नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की मंशा पर सवाल बन चुका है—आखिर कब तक “रिपोर्ट” फाइलों में दबी रहेगी और कब कानून जमीन पर उतरेगा?
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