-मनीष आज़ाद
तुम्हारा नाम बिलकिस किसने रखा?
शायद तुम्हारी दादी ने
जो बिल्कुल उसी ‘बिलकिस दादी’ की तरह होगी
जो धरने पर बैठ कर
सत्ता को नागरिक शास्त्र पढ़ाने का माद्दा रखती थी.
बिलकिस नाम रखते हुए भले ही तुम्हारी दादी ने
यह न सोचा हो कि
‘बिलकिस’ की तरह ही तुम भी किसी देश की बेगम बनोगी.
लेकिन ये तो तय है कि
उसके सपने में भी यह नहीं आया होगा कि
नन्हें नन्हें हाथ पैर फेंकती, अपनी काली प्यारी आंखों से
आस पास की चीज़ों का मुआयना करती बिलकिस
महज 20 साल बाद
किसी पहाड़ी पर नग्न अवस्था मे क्षत विक्षत पड़ी
आतंकित नज़रों से
चारों तरफ देख रही होगी.
उसकी नज़रों के सामने
उसके अपने 14 लोगों की लाशें यहां वहां बिखरी होंगी.
हड़बड़ा कर जब उसने अपने नंगे पेट पर हाथ फेरा होगा
तो वहां भी एक 5 माह की बच्ची साज़ीना कत्ल हो चुकी थी.
साज़ीना अपने नन्हे अंधेरे घर पर
आठ आठ इंसानी बुलडोजर का हमला सह नहीं पाई.
‘घर’ के साथ साज़ भी टूट गया.
तुम्हारी तीन साल की बच्ची का सर जब उन्होंने एक पत्थर पर पटका
तो चटाक की आवाज़ हुई,
लेकिन तब तक तुम बेहोश हो गयी थी.
नहीं तो तुम बहरी हो जाती,
वह आवाज़ अभी भी कायनात
में कौंध रही है.
फूलों वाली फ्रॉक पहने तुम्हारी चुलबुली बच्ची
इतनी ‘भाग्यशाली’ नहीं थी कि वह अपने आतताइयों
के हाथों से छूटकर अंतरिक्ष में आकाशवाणी करती विलीन हो जाती.
क्योंकि वह कहानी नहीं थी, जीती जागती एक शैतान बच्ची थी.
बिलकिस जिन्होंने तुम्हारे शरीर को भेड़ियों की तरह नोचा
तुम्हारे परिवार, तुम्हारे बच्चों की हत्या की
उनकी तुमसे कोई ज़ाती दुश्मनी नहीं थी.
उनमें से कुछ के साथ तो तुमने बचपन में आईस-पाइस भी खेला था.
बिलकिस जब तुम बिंदास अपने सपनों की दुनिया में
बार बार आईना देखते बड़ी हो रही थी,
ठीक उसी समय इस देश मे एक नया विशाल झण्डा तैयार हो रहा था
‘बलात्कार का झण्डा’.
ठीक उसी समय उन योनियों को भी चिन्हित किया जा रहा था.
जिसमें इस झण्डे को फहराया जाना था
यह नए किस्म का ‘राष्ट्रवाद’ था, यह नए किस्म का ‘धर्म’ था
जिसका सार था
‘अपनी’ औरतों की योनि पर ताला,
और ‘उनकी’ औरतों की योनि पर झण्डा.
शायद तुम इस बात से अनजान थी
तुम इस बात से संतुष्ट थी कि
तुमने उन्हें सज़ा दिला थी
लेकिन तुम इस बात से भी अनजान थी
की उन्हें सज़ा तुम्हारे साथ बलात्कार करने की नहीं मिली थी.
उन्हें सज़ा इस बात की मिली थी, कि उन्होंने तुम्हें ज़िंदा क्यों छोड़ दिया
और आज वे रिहा हो गए और तुम ‘कै़द’ हो गयी!
ठीक पंद्रह अगस्त के दिन.
निश्चित ही तुम बहादुर हो बिलकिस
क्योंकि तुम ‘ज़िंदा’ हो!
लेकिन तुम्हें यह तो समझना ही होगा कि
जिनसे तुम न्याय मांग रही हो
वे ‘मर’ चुके हैं.
‘मृत’ कौमें आज ‘ज़िंदा’ कौमों पर शासन कर रही हैं.
अब तो वही रास्ता बचता है बिलकिस
जो ‘बिलकिस दादी’ ने दिखाया है
‘मृत’ शासकों को मृत घोषित करना
और ज़िंदा लोगों को सड़कों पर उतारना…


