Indus News TV Live

Thursday, March 12, 2026
spot_img

कवि वरवर राव के जन्मदिन के अवसर पर उनकी मुख्य चार कविताएं

पेंड्याला वरवर राव का जन्म 3 नवंबर 1940 को तेलंगाना में हुआ था वह भारत के एक भारतीय कार्यकर्ता, कवि, शिक्षक और लेखक हैं। वह 2018 भीमा कोरेगांव हिंसा के आरोपी और गैर-जमानती गैरकानूनी गतिविधि अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया है। राव को भारतीय प्रधान मंत्री की हत्या की साजिश रचने के आरोप में भी गिरफ्तार किया गया था। अगस्त 2022 में, उन्हें भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा चिकित्सा आधार पर जमानत पर रिहा कर दिया गया था।(Birthday Of Poet Varavara Rao)

मुख्य कवितायें:-

1. बोझ हल्का करने का गीत

   पुरवैया की तरह
तुम याद करने आई
दिल छूने वाली कहानियाँ
आंसू से भरी गोदावरी सागर से जिन्हें कहती थी ।

पेड़ की तरह निस्पन्द
जीवन की बयार के लिये तड़पता हुआ
मैंने अपना मुँह खोला ।

क्या हम दोनों के बीच कोई अदृश्य हाथ था ?
क्या हम, ख़ुद पर हुक़्म जारी करते हुए,
ख़ामोश हो चुके थे ?
तुमसे नज़र चुराने के लिए
मैंने अपने आंसू
हलक से उतार लिए ।
दिनभर ये आंसू मेरे गले में बिंधते रहे ।

अब, यह रात,
यह रात जबकि सागर अपनी गोद में
गोदावरी को लेकर उसे तसल्ली देता है,
सुर बाँधकर, जो बेसुर हो चुके हैं
गहरी सांसों में.
सांस लेते हुए हारमोनियम की तरह मेरे दिल में
दोनों हाथों से ।

मैंने अपना चेहरा धो लिया
याददाश्त से उभरते शोकगीत से ।
अब गले में कोई काँटा नहीं
आँखों में भी नहीं ।
हमारे बीच
अथाह समय के इस सेतु

   हम बात करने के लिये मुंह नहीं खोल सके
बोझ हल्का करने वाला यह गीत मैंने सुपुर्द किया ।
तुम तक यह पहुँचेगा परिन्दे या फूल की तरह
या फिर पागल हवा की तरह ।
क्या तुम्हारा जवाब कोमल नहीं होगा?

2. एक अलग दिन 

  ऐसा नहीं कि मेरा आना बिना सूचना के हो
जो बात कही जानी है हमेशा अनकही रह जाती है
ऐसा नहीं कि अप्रत्याशित घटना हो
लेकिन अनचाहे के अनुकूल होने की तड़प रह जाती है

शब्दों का सिलसिला टूटा नहीं
कोशिशें रुक नहीं गई
और हर अनुभव आधा-अधूरा

फिर भी यह समस्या नहीं है
यहाँ समय रुक नहीं गया है
समय सिर्फ़ हमसे
अलग हो चुका है (Birthday Of Poet Varavara Rao)

  हमारा उनींदा इन्तज़ार
तारीख़ का बदलना
कड़वे-मीठे विलगाव की
लीपापोती है

हमारा घरौन्दा,
बीस वसन्तों का यह बसेरा
परों के घोंसले की गरमाहट
कड़वे यथार्थ में मिटता हुआ.

अभी कि जब तुम कहते हो, हाय,
क्या वे तुम्हारा आने वाला कल छीन लेंगे ?
आज ही वह दिन है
आज का दिन (Birthday Of Poet Varavara Rao)

  परेशान
जब तुम अपनी तड़प में छटपटाते हो
हाय, क्या तुम उनकी दखल में होते हो
जबकि तुम देखते होते हो
मैं ज़ंजीरों से बँधा हूँ

मंज़र,
गिरफ़्तार शब्द
एक टूटे आंसू की तरह
हमारी जवाबी पाँत में
झँझरियों के
वृत्तों और चतुष्कोणों को
चीरता हुआ
मैं सिर्फ़ लाचार
ताक ही सकता हूँ ।

  हमें ले जाने वाली वैन गरज़ते हुए
धूल उड़ाती है ।
कोई बदबू सी है
अन्दर नज़र घुमाकर देखता हूँ
राइफ़ल और खाक़ी यूनिफ़ार्म
निगरानी में हैं ।

मेरा वजूद ऐंठता है
पेट्रोल की महक से
मैं बेचैन हूँ
मेरी कराहती अन्तड़ियों में मरोड़ सी उठती है
बाहरी दुनिया में तुम्हारी ओर से
अपनी नज़रें हटाकर
अपने अन्दर
मैं तुम्हें देखता हूँ ।
वक़्त के और मेरे सिर्फ़ दो अंग हैं
दिन और रात
तेज़ काम करने की चाहत के साथ
वक़्त सैकण्ड के काँटे को थाम लेता है
मेरी क़लम मुट्ठी में भींची हुई
वह आगे बढ़ता है
और आगे बढ़ता जाता है.

उस दुश्मन की चार टाँगें हैं
टेलि-कान, टेलि-नज़र, रेडियो-ज़बान
और हथियारों से पंजे ।

और सबसे बढ़कर,
जीते रहने की लालच
एक अकेला ।

इसी की वजह से
उसने अपने दिल की हत्या कर दी,
इसी की वजह से वह उसके कम्पन का गला घोंटता है ।

कैसा सम्वाद
किसी ऐसे के साथ
जिसका दिल ही न हो?

शिकारी कुत्ते की जकड़ती ज़ुबान
उसके गले की पट्टी ।
मालिक के कोंचते हाथ में चाबुक,
मातहतों को दख़ल में लेते हुए ।
कौन सी भाषा इस बयान का अनुवाद कर सकती है
कि सोच पर बेड़ी लगाना भयानक अपराध है ?

दौलत
इनसानी दुनिया को टुकड़े-टुकड़े कर
रखवालों और अपराधियों में बदल देती है
लेकिन जब मैं ज़ोरदार ढंग से ऐलान करता हूँ
कि इसे ख़त्म किया जाय
दौलत का पिंजरा मुझे मुलज़िम कहता है, ठीक है,
लेकिन,
मालिक की नज़र में
मैं एक कम्युनिस्ट हूँ
और मानो कि इससे बदतर कुछ भी नहीं
कि वह आरोप लगाता है
नक्सलवादी है

ठीक से अमल में लाते हुए इस पर डटे रहो
‘द्रोह’ को हमेशा के लिए जारी रखो
सबकी ख़ातिर

3. शिनाख़्त का दिन

1. क्या सल्तनत इसे मान लेगी
अगर बग़ावत के चलते
आवारा और बेगैरत
बहादुर बन जाएँ ?
नायक खानदानी होने चाहिए ।

  अगर जंगली एकसाथ हो जाएँ,
गारा, लकड़ी और पत्थर जुटाते हुए
बसेरा बनाने लगें;
क्या यह कोई कथा बन जाएगी ?
इतिहास की बुनियाद होनी चाहिए ।

  क्या तुम पहाड़ के ऊपर एक दीया जलाओगे
फटेहाल
बुलेट से छिदे गोंड के लिए ?
दीये बड़े लोगों के लिये जलाये जाते हैं ।

2. बेशक, अगर मुझसे उनकी बस्तियों के बारे में पूछा भी जाए
मैं क्या कह सकता हूँ ?
शहरों को बनाकर
वे जंगल की कोख में चले गए –
अगर मुझसे गिनने को कहा जाए
वे साठ थे या तेरह,
मैं सिर्फ़ सितारों की ओर इशारा कर सकता हूँ
जबकि तुम मुआवज़े की फ़ेहरिस्त के साथ अकड़ सकते हो

  किसने उनकी नाड़ी काटी और उन्हें नाम दिया
जो जंगल में जने और छोड़े गए ?
शायद वे तुम्हें पहली बार मिले
जनगणना के आँकड़ों
और वोटरों की लिस्ट में;
शायद उन्हें आदिलाबाद के अस्पताल से बाहर किया गया,
या आज स्मारक बनाकर कहा गया
इन्हें पट्टा नहीं मिल सकता है । (Birthday Of Poet Varavara Rao)

  वहाँ,
पेड़ और गढ़े, वादियाँ और चोटियाँ
पंछी और गिरगिट, पानी और आग़
इनसान और जानवर, जंगल साफ़ कर उगाई गई फ़सल, और बसेरे
अन्धेरा और रोशनी,
उन सबके बस एक नाम हैं :
जंगल
जंगल माँ भी है और ख़ुद बच्चा भी ।

  जंगल की गोद में बसे
आदिवासियों
और उनकी शक़्ल में पल रहे
जंगल के ख़ौफ़ से,
तुमने ही
उनकी शिनाख़्त की

  डर फैलता गया
बोडेनघाट और पिप्पलधारी में
इन्द्रावेल्ली और बाबेझरी में
और सतनाला में
बांस की खपच्चियों से घिरी हुई
उनकी ज़िन्दगी तुमने तहस-नहस कर दी

  कनस्तर और कारतूस
खदान के ख़ून और सल्फ़र गैस के साथ
धरती की दरारों में
तुमने उनकी बपतिस्मा का जश्न मनाया
हासिल सिर्फ़ इतना है
अब तुम उन्हें कभी ख़त्म नहीं कर सकते

3. बहादुर उभरते हैं
वे इतिहास की ही पैदाइश हैं
क्या कोई वह तारीख़ बता सकता है
जब आदिवासी पैदा हुए थे ?
जबकि तुमने साल-दर-साल
चालू खाते के लिए
बीस अप्रैल की तारीख तय कर रखी है
लेकिन इस बार
इतिहास की चकाचौंध में लड़खड़ाते हुए
उन्नीस मार्च को ही तुम
देवक की कालकोठरी में घुस पड़े (Birthday Of Poet Varavara Rao)

4. मेरे दिल में मचलती
जंगली फूलों के ऊपर से आती हवा
अब पर्वतों की चोटियों पर लहराती है
आसमान ने जंगल को एक दृश्य में बदल दिया
इन सबसे बेख़बर, गोदावरी अपनी घाटी में
मुरझाती हुई बहती जाती है

5. परसों के लोग शायद कल नहीं रह गए थे;
कल के दावे आज ग़ायब हो चुके होंगे.
फिर भी, इन्द्रावेल्ली परसों भी था, कल भी और आज भी ।

  इन्द्रावेल्ली शायद मिल्कीयत नहीं थी
गुज़रे ज़माने के लोगों की
कल के स्मारक उस पर कब्ज़ा नहीं जमा पाए;
लेकिन उस पर उनका हुक़्म नहीं चलेगा
जिन्होंने आज उसे तहस-नहस कर दिया

  कबीले के मांस और ख़ून से पोसे हुए
जंगल का ही हुक़्म चलेगा,
आदिम जीवन्तता में सनी हुई
आत्मा ही रह जाएगी;
शहीदों का चुम्बन ज़िन्दा रहेगा

  गंगा जीवन की धारा रह जाएगी
लाठी और तलवार उसे बचाएँगी
सारा जंगल ख़त्म कर दिए जाने के बाद भी
उसमें छिपी हुई आग रह जाती है

  लेकिन इन्द्रावेल्ली
जिसे अब शहर बना दिया गया
बग़ावत का परचम बनकर रह जाएगा
कल का स्मारक
याददाश्त का संकेत है

  यह उनके लिये मील का पत्थर है
जिन्होंने उसे बरबाद कर दिया

  इन्द्रावेल्ली ज़िन्दा रहेगा
संघर्ष करती जनता के
शिखर का प्रतीक बनकर

4.सब कुछ कहने के बाद

  मेरे लिए
लिखने का परिदृश्य,
धरती की दरार से
शब्दों की ज़ंजीरों को निचोड़ते हुए
एक अन्तहीन गति है ।

लिखने में भी
दबाव और तनाव से ध्वनि पैदा होती है,
उल्लास के ताने-बाने में गूँजती हैं,
पैदा करती हैं फिर से
शब्द
जनता की भाषा
गति के साथ आगे बढ़ती हुई ।

मेरे अपने अस्तित्व में
अंकित हैं –
ताक़तें जिन्हें मैंने जिया है और जिन्हें इन्तज़ार है
आनेवाले जीवन का ।(Birthday Of Poet Varavara Rao)

  पसीना महकते इनसान के माथे पर
ख़ून की अमिट छाप
मैं उसे पोंछने की कोशिश करता हूँ
मैं न तो छू सकता हूँ, न गन्दा कर सकता हूँ
सितारों से भरे आसमान में फैली सूरज की शानदार तस्वीर को ।

ऊपर की ओर देखता हूँ,
मेरे हाथों का श्रम
ले जाता है मुझे उन हाथों तक
जो श्रम में व्यस्त हैं
अगर मैं अपना श्रम फैलाता हूँ
मुझ तक
महसूस करता हूँ, हाँ, ले जाता है !

ख़ामोशी में पढ़ते हुए
महसूस करता हूँ एकटक देखती नज़रों को
होंठ हिलते ही ज़बान खेलने लगती है
मेरे जीवन्त तारों में
गूँजती हैं आती हुई आवाज़ें ।

मैं महसूस करता हूँ
मानों कि श्रम से
मुझे संकेत मिले हैं
इस रहस्य से भरी सृष्टि के ।

फिर भी मुझे पता है
यह सिर्फ़ हमदर्दी है
श्रम को मैंने जिया नहीं ।

मैं सिर्फ़ झकझोरते हुए जगाता हूँ अनेक को
मेरी अस्थियों से मुक़ाबले के लिए
ज्वालामुखियों को शान्त करते हुए
वसन्त के सोतों को मोड़ते हुए
धरती से जुड़ी मेरी आन्तरिक सत्ता से
शायद पावलोव के कुत्ते की तरह ।

लेकिन मैं जो
इनसान को पढ़ने का आदी हूं
क्या पुस्तक विकल्प हो सकता है
इस दुनिया का ? (Birthday Of Poet Varavara Rao)

राव को तेलुगु साहित्य में सर्वश्रेष्ठ आलोचकों में से एक माना जाता है और उन्होंने लगभग 40 वर्षों तक स्नातक और परास्नातक छात्रों को तेलुगु साहित्य पढ़ाया। उन्हें एक वक्ता के रूप में जाना जाता है और उन्होंने हजारों सार्वजनिक सभाओं को संबोधित किया था। (Birthday Of Poet Varavara Rao)

कविता : वरवर राव
अनुवाद : उज्जवल भट्टाचार्य


इसे भी पढ़ें : हाईकोर्ट के पूर्व जज ने PM मोदी की बखिया उधेड़ी


(आप हमें फेसबुक पेजइंस्टाग्रामयूट्यूबट्विटर पर फॉलो कर सकते हैं)  

Related Articles

Recent