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Thursday, March 12, 2026
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बौद्ध परंपरा से आया मस्जिद और ताजमहल का वास्तुशिल्प

ताजमहल-लाल किला जैसी शानदार इमारतों को देखकर कई कथित कट्टरपंथी हिंदू कहते हैं कि मुगल इतने ही होशियार थे तो जहां से आए, वहां क्यों नहीं बना लीं ऐसी इमारतें। इस बात को कहने के पीछे साफ तर्क यही होता है कि मुगलों या अन्य मुस्लिम शासको ने पहले से समृद्ध भारतीय हिंदू वास्तुकला पर अपना कब्जा करके दूसरा आकार देने की कोशिश की है। (Architecture Of Buddhist Tradition)

तर्क वितर्क में अब एक नई बात सामने आई है। जो आम दर्शकों के लिए तो शायद एकदम ही अनोखी बात हो। वह यह, ताजमहल जैसी इमारतों ही नहीं, बल्कि मस्जिदों का वास्तुशिल्प भी बौद्ध परंपरा की देन है।

मुगलकाल में बनी इमारतों की खूबसूरती और शिल्प एक दिन में तैयार नहीं हुआ। मुगलकाल के वास्तुशिल्प की भारत में बुनियाद हुमायूं की मौत के बाद पड़ी। मुगल इमारतों का वास्तुशिल्प मूलरूप से फारसी है, जो फारस के कुछ तैमूर वंशीय शासकों के मकबरों से मेल खाता है, जिन्होंने मध्य एशिया और फारस के साथ ही भारतीय उप महाद्वीप के भी कई हिस्सों पर काफी समय तक राज किया। इसी वास्तुकला के आधार पर समरकंद में तैमूर की कब्र है।

शेरशाह सूरी के खास रहे ईसा खान का मकबरा भी फारसी वास्तुशिल्प का शुरुआती नमूना है, जिसे हुमायूं के मकबरे की परिधि के बाहर 1547 में बनाया गया। ईसा खान के मकबरे का मॉडल संभवत: सिकंदर लोदी का मकबरा बना होगा। ईसा खान का मकबरा भी सुंदर अनुपात में बनाया गया। इसमें भी गुंबद के चारों ओर छतरियों और मीनारों को बनाया गया, लेकिन सिकंदर लोदी के मकबरे में यह अतिरिक्त ढांचे नदारद थे। (Architecture Of Buddhist Tradition)

आइए फिर लौटते हैं मुगलकाल पर। फारसी शैली में बाग-बगीचे तैयार कराने की छोटी शुरुआत पहले बाबर ने की थी। बाद में दिल्ली में लाल किले और आगरा में ताजमहल में भी इस शैली को शामिल किया गया। हुमायूं की बीवी हमीदा बेगम फारसी थीं। दिल्ली में अपने शौहर की कब्र पर मकबरे को उन्होंने दस साल में अपनी देखरेख में बनवाया। मकबरे का वास्तुकार मिरक मिर्ज़ा फ़ारसी था, जिसने पहले हेरात (उत्तर-पश्चिमी अफ़गानिस्तान), बुखारा (उज्बेकिस्तान) और भारत में भी कुछ जगहों पर इमारतें बनाई थीं।

हमीदा बेगम की देखरेख में बने हुमायूं के मकबरे ने मुगल मकबरों और इमारतों के लिए कुछ मानकों को स्थापित कर दिया। निर्माण से पहले ज्यामितीय अध्ययन, व्यवस्थित बगीचा, जल चैनलों का जाल, जहां पहुंचकर लोगों को सुकून महसूस हो। हुमायूं का मकबरा फारसी वास्तुशिल्प में दो गुंबद वाली पहली भारतीय इमारत है। यह अपनी बनावट में इस्तेमाल किए गए अनुपात की बारीकियों के लिए जानी जाती है। बाद में मुग़ल मकबरों में इस मॉडल को अपनाया गया, ताजमहल भी इसमें शुमार है। (Architecture Of Buddhist Tradition)

फारसी वास्तुकला में भारतीय वास्तुकला के तत्व भी शामिल किए गए। नक्काशीदार पत्थरों से सजावट और छत्र इस मिश्रण की खास पहचान है।

अब बात आती है फारसी वास्तुशिल्प की बुनियाद में मौजूद बौद्ध परंपरा के शिल्प की। बौद्ध परंपरा में स्तूप निर्माण और उनका प्राचीन ढांचा कई जगह मिला है, जिससे देखने पर ही आप कह सकते हैं कि यह तो मस्जिद या ताजमहल जैसा है। जबकि सच यह है कि यह बौद्ध शिल्प 2 हजार साल पहले का है, जिसके निशान आज के अफगानिस्तान, पाकिस्तान, मध्य एशिया में मिलते हैं, जहां बाद में फारसी वास्तुशिल्प विकसित हुआ और वह वास्तुशिल्प निखरकर ताजमहल जैसा रूप ले सका। (Architecture Of Buddhist Tradition)


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