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Thursday, March 12, 2026
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BJP-कांग्रेस बैकफुट पर, नितीश को OBC-SC दलों का मोर्चा बनाना चाहिए..

एक दौर था जब मंडल कमीशन को असफल करने के लिए संघ और भाजपा ने कमंडल की रणनीति बनाकर लालकृष्ण अडवाणी द्वारा रथयात्रा का अयोजन करवाया। उस समय कल्याण सिंह, उमाभारती, विनय कटियार जैसे बहुत से ओबीसी नेताओं को गुमराह कर राम मंदिर निर्माण का सपना दिखाकर हिदू मुस्लिम का सांप्रदायिक माहौल बनाया जिससे अधिकांश ओबीसी दलित समाज राममय हो गया जिसके फलस्वरूप बाबरी मस्जिद का विध्वंश हुआ। अंततः मंडलवादियों को निष्क्रिय कर राम मंदिर का सपना दिखाकर भाजपा सत्ता पर काबिज हो गई। 2014 से मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा न केवल केंद्र अपितु अधिकांश राज्यों में साम दाम दंड भेद की नीति द्वारा अपने सहयोगी दलों के साथ सत्ता पर काबिज होकर शासन, प्रशासन, चुनाव आयोग, ज्यूडिशियरी, ई डी, सीबीआई आदि संस्थानों में अपने जातिवादी एवं कट्टर हिंदू विचारधारा वाले लोगों को नियुक्त करवा दिया है। (BJP-Congress on backfoot)

सत्ता पर काबिज होकर सवर्ण लॉबी ने धीरे धीरे न केवल ओबीसी दलित नेताओं को दरकिनार किया अपितु शासन प्रशासन एवं अन्य सरकारी नौकरियों में भी आरक्षित पदों पर घोटाला करके सवर्णों को नियुक्त करवा दिया। आज स्थिति यह है कि ओबीसी दलित का लड़का मेरिट में अच्छा होने पर भी इंटरव्यू में छांट दिया जाता है और नॉट फाउंड सूटेबल का बोर्ड लगाकर सवर्णों की नियुक्ति कर दी जाती है।

मामला यहीं पर नहीं रुकता। अब तो सवर्ण लोग ओबीसी, दलित लोगों का समाज में खुलेआम उत्पीड़न करने लगे है और शासन प्रशासन में ओबीसी दलित वर्ग का कोई अधिकारी न होने के कारण पीड़ित पक्ष की बात सुनने वाला कोई नहीं है। वोट लेने के नाम पर ओबीसी दलित हिंदू है इसके अतिरिक्त हर जगह शुद्र, अतिशूद्र का व्यवहार किया जा रहा है। ओबीसी दलित नेता विभिन्न दलों में बंटे होने के कारण भाजपा को ही मजबूत करने में लगे हैं और भाजपा में शामिल नेता अपनी झोली भरने में लगे हैं, सच पूछिए तो इनकी पार्टी में कोई सुनने वाला भी नहीं है। इसी उपेक्षा ने ओबीसी दलित समाज को एक होने पर मजबूर कर दिया है जिसकी शुरुआत बिहार से नीतीश, लालू, तेजस्वी यादव ने कर दिया है।

नीतीश कुमार लालू यादव के प्रयास से इंडिया गठबंधन की शुरुआत हुई लेकिन इधर कांग्रेस को सवर्णवादी मानसिकता की वजह से इन दलों में दरार आ गई है। मौके की नजाकत भांपकर कांग्रेस भी जातिगत जनगणना का राग जरूर अलाप रही है लेकिन इसी कांग्रेस ने अपने शासनकाल में जनगणना के आंकड़े उजागर नही किया था और एमपी, राजस्थान विधान सभा चुनाव में ओबीसी, दलित वर्ग को भाजपा से भी कम टिकट दिया है। यह बात ओबीसी, दलित समाज को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि सवर्ण वर्चस्व वाली पार्टी होने के नाते दोनो पार्टी के नेताओं की सोच ओबीसी दलित विरोधी हैं। (BJP-Congress on backfoot)

नीतीश तेजस्वी सरकार का जातिगत जनगणना करवाकर जनसंख्या के अनुपात में भागीदारी देने के लिए ओबीसी दलित आरक्षण बढ़ाकर 65%करना, बिहार में भारी संख्या में सरकारी नौकरियों में भर्ती, बिहार के विकास के लिए बिहार को विशेष दर्जा देने एवं बढ़ी हुई आरक्षण की सीमा को संविधान की नौवीं सूची में डालने को केंद्र से मांग करना ऐसे मास्टर स्ट्रोक हैं जिससे भाजपा का मंदिर मुद्दा फुस्स होता नजर आ रहा है। पहले तो मोदी जी ने जातिगत जनगणना का विरोध करते हुए केवल अमीर गरीब को ही जाति बताया लेकिन अपने को ओबीसी नेता कहने वाले बयानों से स्वयं घिर गए और भाजपा को न केवल जातिगत जनगणना अपितु बढ़ाए गए आरक्षण को भी विधान सभा में समर्थन देना पड़ा। अब अमित शाह को कहना पड़ रहा है कि भाजपा जातिगत जनगणना के खिलाफ नही है। हो सकता है भाजपा लोक सभा चुनाव के पहले जातिगत जनगणना को अपने एजेंडा में भी शामिल कर ले लेकिन इसका लाभ नीतीश तेजस्वी पहले ही ले चुके है। जातिगत जनगणना,आरक्षण में भागीदारी, बिहार को विशेष दर्जा,आरक्षण को नौवीं सूची में लाना ऐसे मुद्दे है जिससे लोग हिंदू मुस्लिम, राम मंदिर आदि सारे मुद्दे भूलते जा रहे है और भाजपा चारों तरफ से घिरती जा रही है। नीतीश सरकार के मास्टर स्ट्रोक का ही असर है की भाजपा नेतृत्व यूपी में योगी जी जगह ओबीसी संभवतः केशव मौर्य को सीएम बनना चाहता है लेकिन हिंदुत्व का मुख्य चेहरा एवं संघ में अपनी पकड़ मजबूत होने की वजह से योगी जी इतनी आसानी से यूपी नही छोड़ने वाले है।

पांच राज्यों में चुनाव परिणाम आने का बाद भाजपा में सत्ता का घमासान होना अवश्यंभावी है। अभी तक कांग्रेस को इंडिया गठबंधन में नीतीश कुमार, अखिलेश यादव आदि क्षेत्रीय दलों को साइडलाइन करके इतरा रहीं थी, वह भी अब बैक फुट पर आ गई है। मीडिया का एक वर्ग केवल राहुल गांधी को ही मोदी के समकक्ष लाने की कोशिश कर रहा है और राहुल गांधी का ही महिमा मंडन कर रहा है। ओबीसी दलित वर्ग के मीडिया न होने की वजह से नीतीश कुमार व अन्य ओबीसी दलित नेताओं की ख़बरें जनता के सामने नहीं आ पाती हैं। लेकिन अब नितिश कुमार को नजरंदाज करना किसी के लिए संभव नहीं होगा क्यों कि बेदाग छवि वाले नीतीश कुमार ओबीसी दलित वर्गों के लिए मसीहा और गठबंधन के सबसे प्रभावशाली नेता बनकर जनता के सामने आए हैं। (BJP-Congress on backfoot)

अगर कांग्रेस पार्टी के रुख में कोई परिवर्तन नहीं आता है तो नीतीश कुमार की अगुआई में सपा, बसपा, राजद, जदयू, जनाधिकार पार्टी, महान दल, आजाद पार्टी आदि अन्य क्षेत्रीय दलों को तीसरे मोर्चे का गठनकर टिकटवितरण में जनसंख्या के अनुपात में सभी वर्गो को भागीदार बनाकर तीसरे मोर्चे का गठन करना चाहिए क्यों कि सवर्ण मानसिकता वाली कांग्रेस भाजपा से निपटने की राजनैतिक परिपक्वता नीतीश कुमार में ही नजर आती है। अगर दलित नेतृत्व की बात पर सहमति बनती है तो मायावती उपयुक्त हो सकती है। ओबीसी दलित एक मंच पर सहमति बनाकर आ जाते हैं तो भाजपा कांग्रेस दोनो सत्ता से बाहर हो जायेंगे।कांग्रेस गठबंधन में रहती है तो भी ओबीसी दलित एकता के आगे उसे नतमस्तक होना पड़ेगा। (BJP-Congress on backfoot)

अब सवाल उठता है कि ऐसे हालात में ओबीसी दलित समाज को किसका समर्थन करना चाहिए। मेरा मानना है कि भाजपा को हराने में जो भी सशक्त हो उसे ही समर्थन देना चाहिए क्यों की संविधान के अस्तित्व का सवाल है और भाजपा संविधान को ही बदलकर मनुवादी ओबीसी दलित आदिवासी को सौ साल पहले की अवस्था में पहुंचना चाहते हैं।

-श्रीनाथ मौर्य, अधिवक्ता, इलाहाबाद उच्च न्यायलय एवं पूर्व सरकारी अधिकारी

यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक इलाहाबाद उच्च न्यायलय के अधिवक्ता पूर्व सरकारी अधिकारी हैं। नीचे आप लोग इस पर अपना कॉमेंट दे सकते है।

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