पाकिस्तान में 12वां आम चुनाव खतम हो चुका है. पार्लियामेंट चुनाव के ठीक एक दिन पहले एक उम्मीदवार के ऑफिस के पास हुए दो बम धमाकों में लगभग 24 लोगों के मरने की खबर थी और चुनाव के बाद वोटों की गिनती समाप्त हो जाने के बावजूद स्थित साफ ना होने से अराजकता का माहौल बना हुआ है. हिंसा पाकिस्तान के लिये कोई नई चीज नहीं है. 1947 में बंटवारे के बाद से ही इस मुल्क ने बहुत खून-खराबा देखा है. अपने 76 साल के इतिहास में पाकिस्तान में कुल जमा 11 बार ही चुनाव हो पाये. इस बार पाकिस्तान की हुकूमत का ये बारहवाँ प्रयास है कि चुनावों को शांति पूर्वक तरीके से संपन्न कराया जाए लेकिन जिस तरह प्रधानमंत्री पद के एक उम्मीदवार, इमरान खान, चुनाव के दौरान जेल के भीतर से अपना चुनाव प्रचार कर रहे थे और प्रधानमंत्री पद के एक दूसरे मुख्य उम्मीदवार, नवाज शरीफ, लंबे समय तक निर्वासित रहने के बाद वापस पाकिस्तान लौटे है उसको देख कर ये आशंका व्यक्त करना बहुत लाजिम है कि शायद पाकिस्तान में गाड़ी एक बार फिर पटरी से उतर रही है. और वोटों की गिनती के समय फैली अराजकता से इस आशंका को और बल मिला है.
लेकिन सवाल ये है कि एक मुल्क जिसने अपना सफर 1947 में भारत के साथ शुरू किया था वो आखिर भारत से इतना पीछे कैसे रह गया? सवाल ये है कि पिछले करीब 70 सालो में पाकिस्तान को ऐसी कौन सी चीज नहीं मिली कि जो उसको नहीं ज्यादा तो भारत की तरह नियमित चुनाव कराने की लोकतांत्रिक कूबत ही दे देती? पिछले करीब 70 सालो में भारत ने भी कम चुनौतियों का सामना नहीं किया, लेकिन अगर भारत ने भुखमरी देखी तो हरित क्रांति की बदौलत खूब अन्न भी उपजाया, भारत ने अगर भाषायी या धार्मिक लाइन पर विभाजनकारी आंदोलनों को झेला तो राष्ट्रीय समरसता को भी कायम रखा. पिछले तमाम वर्षों में भारत की इन तमाम उपलब्धियों का एक मुख्य कारण शायद ये रहा है कि जिस तरह से पाकिस्तान 1947 से ही इस्लामिक राष्ट्र बनने की दिशा में निकल पड़ा था उस तरह से भारत ने हिंदू राष्ट्र के रूप में अपनी नींव रखने से इंकार कर दिया था. अगर ऐतिहासिक तथ्यों पर गौर करे तो सच तो ये है कि पाकिस्तान के कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना ने भी ये कोशिश की थी कि पाकिस्तान को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में स्थापित किया जाये लेकिन जिंदगी भर मुस्लिम पहचान की धुर दक्षिणपंथी राजनीति करने के बाद वो एकदम से पाकिस्तान को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में विफल हो गये थे. भारत के नागरिक के तौर पर हमारी खुशकिस्मती ये है कि समय रहते गांधी जी के सर्वधर्म समभाव के सिद्धान्त पर चलते हुए नेहरू ने भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में स्थापित किया.
धर्मनिरपेक्षता और भारत की स्थिरता के बीच में संबंध-
बीती 30 जनवरी को हुए चंडीगढ़ मेयर चुनाव का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है जिसमें चुनाव का पीठासीन अधिकारी भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में बैलेट पेपर से छेड़खानी करता हुआ नजर आता है. ये मात्र एक घटना इस बात की परिचायक है कि पिछले कुछ सालो में हमारे देश में बहुत तेजी के साथ अलग-अलग संस्थान एक ही रंग में रंग गये है. चुनाव का पीठासीन अधिकारी, भारतीय जनता पार्टी का कार्यकर्ता प्रतीत होता है. न्यायपालिका केन्द्र सरकार की चारण प्रतीत होती है. और कार्यपालिका, सरकार की सेवक प्रतीत होती है.
ये सारे बदलाव संस्थानों के आपस के कार्य- विभाजन के उस नियम के उलट नजर आते है जिस नियम के बारे में हमने कक्षा 8 की नागरिक शास्त्र की किताब में पढ़ा था कि कैसे कार्यपालिका, न्यायपालिका से अलग तरीके से काम करती है और कैसे विधायिका, न्यायपालिका से अलग है. और साथ ही साथ कैसे ये तीनों संस्थान एक दूसरे की सीमाएं भी निर्धारित करते है.
अगर आप आधुनिक दुनिया के पूरे इतिहास को जरा सा टटोले तो आपको पता चलेगा कि संस्थाओं के आपसी शक्ति विभाजन का पूरा तर्क धर्मनिरपेक्षता के नियम से ही निकल कर आता है. धर्मनिरपेक्षता का नियम मूलतः ये कहता है कि धर्म कोई खराब चीज नहीं है लेकिन राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के लिये धर्म को चुनी हुई सरकार से दूर रहना चाहिए. इसी धर्मनिरपेक्षता के नियम के आधार पर पूरी दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में ये नियम विकसित हुआ है कि न्यायपालिका के अपने काम तो महत्वपूर्ण है लेकिन वो सिर्फ कानून की व्याख्या कर सकती है विधायिका की तरह कानून बना नहीं सकती. इसी शक्ति के विभाजन के तर्ज पर कार्यपालिका कानून को लागू तो कर सकती है लेकिन कानून की व्याख्या नहीं कर सकती आदि.
अब आप धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ जाएंगे तो संस्थानों के बीच शक्ति के विभाजन का नियम डगमगायेगा और वही होगा जो चंडीगढ़ मेयर के चुनाव में हुआ या फिर पाकिस्तान में जो पिछले सात दशकों से होता आया है कि आर्मी दूसरे संस्थानों पर इतना हावी हो गयी है कि जिस भी प्रधानमंत्री से आर्मी नाराज होती है उसी का तख्तापलट कर देती है.
साथ ही साथ इस प्रकार की बाते बहुत भ्रामक है कि धर्मनिरपेक्षता का नियम भारत की धार्मिक परंपराओ या फिर परंपरागत उच्च जातियों के खिलाफ जाता है. सच्चाई ये है कि 1947 के बाद नेहरू के धर्मनिरपेक्ष भारत में परंपरागत उच्च वर्णीय जमींदारों के खिलाफ कोई भयानक युद्ध नहीं छेड़ दिया गया था बल्कि नेहरू ने अच्छी सिंचाई व्यवस्था का तंत्र बनाके मात्र इतना सुनिश्चित किया था कि जमींदारों की जमीन को किराये पर लेकर खेती करने वाले छोटी जातियों के लोग थोड़ा सा ज्यादा अन्य उपजा सके. ठीक इसी तरीके से नेहरू ने जाति आधारित गाँव की पंचायतों को खत्म करने की बजाय मात्र ये कोशिश की थी कि इन पंचायतों में समाज के सभी वर्गो की भागीदारी तय करके स्थानीय लोकतंत्र को मजबूत किया जा सके.
आजाद भारत के जिस काल खंड से होकर हम गुजर रहे है जरूरी है कि अपने पड़ोसी देश की गलतियों से सीख कर हम अपने देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के पक्ष में खड़े हो पाये.
(लेखक आलोक राजपूत JNU के छात्र रहे हैं और स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं)
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