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Thursday, March 12, 2026
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ददुआ : जंगल से सरकारें बनाने, बिगाड़ने वाला बीहड़ का बागी

22 जुलाई 2002 को ददुआ गैंग की पुलिस और एसटीएफ से मुठभेड़ हुई. इस वक्त ददुआ के सर पर 5 लाख से ज्यादा रुपयों का इनाम था. इतना ही नहीं उत्तरप्रदेश में चित्रकूट, बुंदेलखंड और मध्य प्रदेश के विन्ध्य इलाके में ददुआ का राज था. कहा जाता है कि ददुआ की सरपरस्ती के बिना ग्राम पंचायत तो क्या विधानसभा और लोकसभा तक के चुनाव लड़े और जीते नहीं जा सकते थे. जंगल में बंदूक की नाल से वह वोटों की फसल उगाया करता था. कहते हैं राजनीतिक महत्वाकांक्षा ही ददुआ कि मौत का सबब भी बनी. वर्ना तीन दशकों तक पुलिस उसे तो क्या उसकी परछाई तक को नहीं छू पायी थी. (Dadua The Rebel of the Ravine)

शिवकुमार पटेल के ददुआ बनने की कहानी भी फ़िल्मी ही है. चित्रकूट के देवकली गांव के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे शिवकुमार के पिता को गांव के ही कुछ लोगों ने न सिर्फ नंगा कर घुमाया बल्कि गोली मारकर उनकी हत्या भी कर दी. इस अपमान ने शिवकुमार पटेल को ददुआ बना दिया. 1975 में अपने पिता की हत्या और अपमान का बदला लेने के लिए शिवकुमार ने पहली दफा बंदूक उठाई. इस दिन से शुरू हुआ ददुआ का सफ़र जब ख़त्म हुआ तब उन पर हत्या, लूट, डकैती, अपहरण आदि मामलों में ढाई सौ से ज्यादा मुक़दमे थे.

अपने बागी जीवन की शुरुआत पहले से मौजूद गैंग से करने के बाद जल्द ही ददुआ ने अपना बागी गिरोह बना लिया. साल 1986 में ददुआ गिरोह ने मुखबिरी के शक में रामू का पुरवा गांव में 9 लोगों को गोलियों से भून दिया. 1992 में मड़ेयन गांव में 3 लोगों की हत्या कर गनाव ही जला डाला. तेंदू पत्ते के कारोबार पर नियंत्रण रखने वाला ददुआ अब राजनीति में दिलचस्पी लेने लगा. कुर्मी, पटेलों के अलावा आदिवासियों में भी अच्छी पकड़ होने की वजह से ददुआ गंगा-जमुना दोनों तटों की राजनीति को प्रभावित करने लगा. कहते हैं चित्रकूट, बांदा, हमीरपुर, फतेहपुर, प्रतापगढ़, प्रयागराज, मिर्जापुर, कौशांबी की करीब दर्जन भर लोकसभा सीटों और कई विधानसभा सीटों के परिणाम ददुआ के समर्थन से तय होते थे.

बंदूक चलाने वाला ददुआ पहले बसपा के हाथी पर सवार हुआ फिर साइकिल पर. ददुआ के राजनीतिक रसूख का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनके भाई बालकुमार पटेल मिर्जापुर से संसद बने तो बेटा वीर सिंह चित्रकूट से विधायक. बहू ममता पटेल जिला पंचायत अध्यक्ष बनीं तो भतीजा राम सिंह पटेल विधायक. ददुआ की राजनीतिक पकड़ की वजह थी उनका ग्रामीणों, गरीबों, मजलूमों का मददगार होना. वे गरीबों के बीच मसीहा माने जाते थे.

ददुआ अपने गैर राजनीतिक परिवार को तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में स्थापित कर गए लेकिन यही सियासी महत्वाकांक्षा उनकी मौत का कारण भी बनी.

मुठभेड़ में मारे जाने से पहले ददुआ सिर्फ एक दफा तब पुलिस के शिकंजे में फंसे थे जब फतेहपुर के नरसिंहपुर कबरहा में पुलिस ने उन्हें घेर लिया. गन्ने के खेत में घिरे ददुआ के बचने की कोई गुंजाइश नहीं थी फिर भी वे बच निकले. इस मुठभेड़ के चार साल बाद इस गांव में ददुआ का मंदिर बना दिया गया. यहां आज भी ददुआ और उनकी पत्नी की मूर्ति लगी हुई है. तीन दशक तक पुलिस को चकमा देने वाले ददुआ के किस्से आज भी चौपालों में कहे-सुने जाते हैं.

 

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