मैं पहले के एक लेख में बता चुका हूं कि वैदिक सभ्यता का मूल ईरान और पारसियों का ग्रंथ अवेस्ता है। पारसी भी ब्राह्मणों की तरह ही अग्निपूजक हैं, यज्ञ परंपरा का मूल भी पारसी संप्रदाय में निहित है। यह पारसी लोग रक्त शुद्धता में विश्वास रखते हैं अर्थात खुद को श्रेष्ठ मानते हैं।
ब्राह्मणवाद, ब्राह्मण धर्म या ब्राह्मण संप्रदाय पारसियों की श्रेष्ठता वाली इसी मूल अवधारणा से प्रेरित है इसलिए यह लोग ईश्वर, धर्म, अध्यात्म हर चीज का इस्तेमाल खुद की श्रेष्ठता को स्थापित करने के लिए करते हैं और ऐसा करने के लिए यह सामाजिक व्यवस्था को दूषित करने से भी पीछे नहीं हटते। उदाहरण के लिए इन्होंने पिछले हजार साल में भारत की सामाजिक व्यवस्था को पूरी तरह दूषित कर के रखा है। (God & religion are tools for Brahmin priests)
यहां तक की खुद की श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए ईश्वर, जिसे वैदिक साहित्य में ब्रह्मा कहा गया है उस का सहारा लेकर खुद को ऊंचा और समाज के एक बड़े वर्ग को खुद से नीचा घोषित कर रखा है। अर्थात ईश्वर का इस्तेमाल इन्होंने यहां पर खुद को श्रेष्ठ स्थापित करने के लिए किया है। ऋग्वेद के ईश्वर जिसे वेद में ब्रह्मा कहा जाता है के शरीर से समाज के 4 अंगों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र की उत्पत्ति बताई है। (God & religion are tools for Brahmin priests)
सामाजिक व्यवस्था को दूषित करने के लिए इन्होंने दूसरा षड्यंत्र मनुस्मृति के रूप में किया है जिसमें उन्होंने वेद के ईश्वर अर्थात ब्रह्मा के शरीर से उत्पन्न चार वर्णो की व्यवस्था को विस्तृत रूप दिया है। इसमें इन्होंने ब्राह्मण को श्रेष्ठ बताया है, क्षत्रिय को द्वितीय स्थान दिया है, वैश्य को तृतीय और शूद्र को केवल सेवा का स्थान दिया है। मनुस्मृति का शूद्र न तो संपत्ति रख सकता है और न ही व्यापार कर सकता है, न ही युद्ध लड़ सकता है, केवल सेवा कर सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसी मनुस्मृति को धर्म बताया गया है। आश्चर्य होता है कि धर्म धर्म न हुआ ब्राह्मणों की सेवा करने का जरिया हो गया।
पांचवा वर्ण अछूत के रूप में पैदा किया है जिसका कुटिल शास्त्रों में कहीं उल्लेख नहीं जो ब्राह्मण सामाजिक व्यवस्था से बाहर है जिसका काम मरे जानवर उठाना, सफाई करना आदि है। (God & religion are tools for Brahmin priests)
इससे आप समझ गए होंगे कि ब्राह्मण पंडा पुरोहितों के द्वारा किस प्रकार ईश्वर और धर्म का प्रयोग औजार की तरह खुद की श्रेष्ठता और समाज व्यवस्था को दूषित करने के लिए किया गया है।
अंतिम चीज अध्यात्म है। अध्यात्म में ब्राह्मणों ने श्रमणों अर्थात बौद्ध और जैनों से चुराकर बहुत से ग्रंथ लिखे हैं जिसमें गीता और वेदांत प्रमुख हैं। यहां पर यह लोग ध्यान की बात करते हैं, अध्यात्म की बात करते हैं लेकिन हर चीज का निचोड़ वर्ण व्यवस्था पर ही निकालते हैं। इन ग्रंथों में भी श्लोक, कहानियां घुसा दी गई हैं जिनके माध्यम से इनकी श्रेष्ठता स्थापित हो सके। गीता में भी कई जगह वर्ण व्यवस्था का उल्लेख है। अध्यात्म को भी इन्होंने एक उपयोगी औजार की तरह खुद की श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए और समाज व्यवस्था को दूषित करने के लिए इस्तेमाल किया है।
अगला इनकी माइथोलॉजी है जो कि श्रमण अर्थात बौद्ध और जैन माइथोलॉजी से कहानियां चुराकर लिखी गई है और इनकी पूरी ब्राह्मण माइथोलॉजी वर्ण व्यवस्था, ऊंच-नीच का पोषण कर समाज व्यवस्था को दूषित करने वाली सोच से प्रेरित है।
इससे आप समझ गए होंगे कि किस तरह ईश्वर, आध्यात्म, धर्म आदि उपयोगी चीजों का इस्तेमाल ब्राह्मण-पंडा-पुरोहित ने समाज व्यवस्था को दूषित करने, खुद को श्रेष्ठ स्थापित करने, भारत में ऊंच-नीच जैसी कुप्रथा विकसित करने, समाज के बड़े हिस्से को मूल्यहीन करने के लिए किया है। (God & religion are tools for Brahmin priests)
दुनिया के किसी भी कोने में इस प्रकार की कुटिलता, धूर्तता नजर नहीं आती। ब्राह्मण पंडा पुरोहितों का यह विचार, व्यवस्था और प्रपंच दुनिया का सबसे जहरीला षड्यंत्र है, जिसने भारत भूमि पर इतना अनर्थ किया है जितना किसी ने नहीं।
धर्म, अध्यात्म और ईश्वर के सहारे इस प्रकार खुद की श्रेष्ठता स्थापित करने का यह प्रपंच भारतीय नहीं है बल्कि मूल ईरानी धारा से प्रेरित है और आज इसी विचार को ब्राह्मण के द्वारा हिंदू विचार बताया जा रहा है जबकि यह पूरी तरह से ब्राह्मण विचार है। 80% देश के हिंदुओं का इससे कोई लेना-देना नहीं है।
ब्राह्मण धर्म हिंदू धर्म नहीं है, ब्राह्मण ग्रंथ हिंदू ग्रंथ नहीं है, ब्राह्मण माइथोलॉजी हिंदू माइथोलॉजी नहीं है, ब्राह्मणों का दूषित ईश्वर, धर्म और अध्यात्म हिंदू ईश्वर, धर्म, अध्यात्म नहीं है।
बुद्ध, महावीर, कबीर, नानक, रैदास की धारा ही भारतीय धारा है अर्थात् हिंदू धारा है अर्थात हम सबकी धारा है। जिसमें समानता है, समता है, प्रेम है, करुणा है, समतामूलक समाज है, अच्छी सामाजिक व्यवस्था है, ऊंची नीच नहीं है।
आपको ऐसा ईश्वर चाहिए जो आपको नीचा बताए, आपको ऐसा धर्म चाहिए जो आपको नीचा बताए, आपको ऐसा अध्यात्म चाहिए जो आपको नीचा बताए तो ब्राह्मण धर्म में घुसे रहिए वरना ब्राह्मण धर्म को कानूनी, सामाजिक, शैक्षणिक सभी जगह से बाहर निकालिए और बुद्ध, महावीर, कबीर के विचारों के स्थापित करिए।
इसका हल संस्थानिक हो सकता है क्योंकि सारा घोटाला इंस्टीट्यूशनल है तो समाधान भी इंस्टीट्यूशनल होगा अर्थात सरकारी स्तर पर मजबूत होकर ही इसका समाधान निकल सकता है अन्यथा कोई समाधान नहीं है।
~संतोष शाक्य, सह-संपादक, इंडस न्यूज़ टीवी नेटवर्क
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