
– आशीष आनंद
बात कुछ पुरानी है। कुछ नहीं, बल्कि काफी पुरानी। जब अंग्रेजों के खिलाफ पहला स्वतंत्रता संग्राम भी नहीं हुआ था। तब, 1845 में सर जमशेदजी जेजेभॉय के साथ जगन्नाथ शंकर सेठ ने इंडियन रेलवे एसोसिएशन का गठन किया। इससे भी पहले उत्तराखंड के कुमाऊं की वादियों तक पहुंचने के लिए 1834 में छोटा सा शहर बनना शुरू हुआ, हल्द्वानी। ( Haldwani Eviction Railways Banbhulpura)
हल्द्वानी के वजूद में आने के 50 साल बाद 1884 में यहां से रेल गुजरना शुरू हुई। बरेली रोड पर मौजूद भोजीपुरा से काठगोदाम तक रेलवे का ट्रैक बिछाया गया। फिर सन् 1900 में रेलवे ब्रिटिश राज की सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी बन गई। इसके एक साल बाद, 1901 में प्रारंभिक रेलवे बोर्ड का गठन हुआ, जो वाणिज्य और उद्योग विभाग के अधीन था और इसमें एक सरकारी रेलवे अधिकारी बतौर अध्यक्ष हुआ करता था। इसके अलावा इंग्लैंड से एक रेलवे प्रबंधक और अन्य दो सदस्यों के रूप में कंपनी के एजेंट थे।

यह किस्सा हम क्यों सुना रहे हैं? काफी लोग मुद्दा समझ गए होंगे, लेकिन अभी इसको हम एक खास तरीके से समझने की कोशिश करेंगे। ( Haldwani Eviction Railways Banbhulpura)
दरअसल, जिस हल्द्वानी शहर की हम बात कर रहे हैं, जो रेलवे के आने से पहले बसा और जहां लोग तब से रह रहे हैं, जब रेलवे अंग्रेज सरकार की भी कंपनी नहीं बनी थी और रेलवे बोर्ड का गठन भी नहीं हुआ था। वह रेलवे अब यहां अपनी जमीन होने का हवाला देकर 50 हजार लोगों के आशियाने के ऊपर अपने विकास का चक्का घुमाने जा रहा है।
रेलवे को यह ताकत मिली है हाल ही में हाईकोर्ट के हुक्म से, जिसने मान लिया है कि यह जमीन रेलवे की है, जहां लोग अनाधिकृत तरीके से बसे हैं। यह जमीन रेलवे की इसलिए है कि राज्य सरकार ने कह दिया कि यह जमीन हमारी नहीं है। रेलवे का दावा है कि हल्द्वानी के बनभूलपुरा नाम की बस्ती में 69 एकड़ जमीन उसकी है। अदालत ने भी मान लिया है, अदालत का आदेश सिर माथे पर। जान परखकर ही फैसला लिया होगा।
फिर भी सवाल यह तो है ही, ये जमीन कहां से आई रेलवे के पास? किसने दी? कोई कागज तो होगा रेलवे के पास इसके बैनामे या दान का। कोई नक्शा भी होगा मालिकाने वाली जमीन की चौहद्दी का। ऐसे ही तो पहचान होती है जमीन की! कागज होगा तो यह भी साफ हो सकता है कि रेलवे के पास 69 नहीं 100 एकड़ जमीन होगी तब। अभी तो यह भी हो सकता कि इस 69 एकड़ में ज्यादातर जगह गौला नदी साइड रही हो, जिधर बाईपास बन चुका है।
रेलवे ने इस मामले में अपना क्या पक्ष रखा है? रेलवे का कहना है, ‘2013 में अवैध खनन को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट ने स्वत संज्ञान लिया था। हाईकोर्ट ने कहा कि रेलवे और प्रशासन संयुक्त रूप से सर्वे करके अतिक्रमण का पता लगाए।’ रेलवे ने यह भी कहा है, ‘सर्वे में पता चला है कि 2.2 किलोमीटर की लंबाई में अतिक्रमण हुआ है। 4365 मकान अवैध हैं।’
सोचने की बात है, जब रेलवे की लाइन यहां बिछी तो रेलवे सरकारी कंपनी या बोर्ड था ही नहीं। ऊपर से अंग्रेजों का राज, जिनके बाप दादा का इस देश में कुछ नहीं था, जितनी जमीन जहां चाही घेरकर कुछ भी किया।
अगर 100 साल पहले की विदेशी हुक्मरानों की घेराघेरी और कब्जेदारी को आज मान्यता दे दी जाए तो मसला बहुत दूर तक पहुंच जाएगा। ( Haldwani Eviction Railways Banbhulpura)
हां, ये मुमकिन है कि बनभूलपुरा में आबादी शुरुआती तौर पर ऐसे ही बस गई हो, जैसे देशभर में तमाम जगह बसी है।

रेलवे को कामकाजी लोग चाहिए थे तब, रेलवे पहुंची तो बहुत से काम शुरू होने पर मजदूरों की जरूरत रही होगी। टिंबर कारोबार में लकड़ी काटने से लेकर अन्य कामों में लगे लोग आसपास रहने लगे और बस गए हों। ऐसे ही गफूर बस्ती तैयार हो गई हो। यह संभव है, ऐसा बहुत सी जगह हुआ । और अगर ये अनाधिकृत कब्जेदारी है तो तब की रेलवे की कब्जेदारी भी इतनी ही अनाधिकृत क्यों न मानी जाए!
आज रेलवे या किसी भी सरकारी कंपनी का प्रोजेक्ट होता है तो जमीन खरीदी जाती है, लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं है। जिसकी लाठी उसकी भैंस। अंग्रेजों की ही तरह जहां ईंट रख दी वो जमीन या संपत्ति अपनी।
गौर करने वाली बात एक और है। देश का सबसे बड़ा भूस्वामी कौन है? जाहिर है, सरकार। इसलिए कि रेलवे समेत तमाम पब्लिक सेक्टर की कंपनियों के पास जमीन सबसे ज्यादा है। इनमें सबसे ज्यादा जमीन का मालिकाना रेलवे के पास है। जानते हैं कितना? ( Haldwani Eviction Railways Banbhulpura)
भारतीय रेलवे के पास तकरीबन 43 हजार हेक्टेयर खाली भूमि बताई जाती है। इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, रेलवे के पास 4780 वर्ग किलोमीटर जमीन है, जो कि गोवा राज्य से 30 प्रतिशत ज्यादा है।
गवर्नमेंट लैंड इन्फॉर्मेशन सिस्टम (जीएलआईएस) पोर्टल और 2018 में एक आरटीआई के जवाब में बताया गया है कि रेलवे देश का सबसे बड़ा भूमि का मालिक है, लगभग 4 लाख 77 हजार हेक्टेयर भूमि 3 मार्च 2018 तक थी, इसी के साथ 844.38 हेक्टेयर भूमि पर 30 मार्च 2018 तक गैरकानूनी या अनाधिकृत कब्जे थे।

प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो के 29 नवंबर 2019 को जारी प्रेसनोट के अनुसार, रेल, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री ने राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में बताया कि 31 मार्च 2019 तक रेलवे के पास कुल 4 लाख 78 हजार हेक्टेयर भूमि है, जबकि लगभग 821.46 हेक्टेयर भूमि पर अतिक्रमण है।
इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि पुराने अतिक्रमण, जहां कोई चिह्नित कब्जेदार पार्टी नहीं है, वहां पब्लिक प्रिमिसेस एविक्शन ऑफ अनअथौराइज्ड ऑक्यूपेंट्स एक्ट 1971 यानी पीपीई एक्ट 1971 के तहत कार्रवाई की गई है, जिसे समय-समय पर संशोधित किया जाता रहा है। अनाधिकृत कब्जेदारों को राज्य सरकार और पुलिस की मदद से हटाया गया है। अतिक्रमण हटाने की यह प्रक्रिया जारी है, इस तरह साल 2017-18 में 16.68 हेक्टेयर और 2018-19 में 24 हेक्टेयर भूमि को कब्जामुक्त किया गया है।
इससे दो तीन बातें सामने आती हैं। पीपीई एक्ट से काफी पहले से बनभूलपुरा बस्ती वजूद में है। सरकार देश की है, सबसे बड़ी जमीन की मालिक, फिर उसी देश के लोग बेघर क्यों होंगे? क्या सरकार की ये जिम्मेदारी नहीं है कि लोगों को रहने की जगह दे? प्रधानमंत्री आवास योजना इसी काम के लिए तो है। क्या इस आबादी को दूसरी जगह रहने का इंतजाम करने की जिम्मेदारी सरकार की नहीं है? क्या यह बेहतर है कि पचास हजार लोग अचाकर सड़कों पर जहां तहां लताड़े जाते रहें? वह भी तब जब रेलवे के पास जमीन की कमी नहीं है। यहां तक कि उनके सैकड़ों बंगले और क्वार्टर खाली पड़े हैं इसी मंडल में और उनके अफसर मात्र दो तीन लोगों के परिवार के साथ अंग्रेज अफसरों की तरह बीघे में फैले बंगलों में रह रहे हैं।
एक दिन में हजारों मकान तो पक्के बन नहीं गए होंगे। न ही जल निगम ने पानी की टंकी बना दी होगी घंटे भर में, न ही नगरपालिका ने सड़कें बना दी होगी मिनटों में, न स्कूल कॉलेज धर्मस्थल बन गए होंगे सेकेंडों में। रेलवे ने कभी रोका क्यों नहीं, अगर ये सब अतिक्रमण था। सड़क, पानी, बिजली, स्कूल तो सरकारी संस्थाएं भी मुहैया करा रही थीं, उनसे रुकवाया क्यों नहीं? ( Haldwani Eviction Railways Banbhulpura)

एक तीर से दो निशाने वाली बात यह भी है, बस्ती हटी तो हल्द्वानी विधानसभा में विपक्ष का पाला कमजोर हो जाएगा। शायद यही वजह है कि कांग्रेस विधायक सुमित हृदयेश सुप्रीम कोर्ट तक कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद से पैरवी करा रहे हैं और समाजवादी पार्टी उत्तरप्रदेश से जान लगाने को अपने नेताओं को भेज रही है।
आखिर में हम एक छोटी सी बात कहेंगे। जब रेल को ही बेचना है, वो भी औने पौने दामों में तो इस जमीन की इतनी तड़प क्यों है। इन मजदूरों-गरीबों से ही कुछ पैसा लेकर सौदा कर लो, हर सौदा एक ही आदमी से करना जरूरी है क्या? कोई प्रोजेक्ट के लिए यह जमीन चाहिए तो इतनी जमीन है ही रेलवे के पास, जहां जरूरतमंदों को बसा दिया जाए।
(लेखक इंडस न्यूज के कार्यकारी संपादक हैं, यह उनके निजी विचार हैं)


