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Thursday, March 12, 2026
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भारतीय फिल्म संगीत के कुछ महानतम संगीतकारों में एक नौशाद

ध्रुव गुप्त


भारतीय सिनेमा के कुछ महानतम संगीतकारों में एक नौशाद के बगैर भारतीय फिल्म संगीत का इतिहास अधूरा है। नौशाद को शुरुआती सिनेमाई संगीत में भारतीय शास्त्रीय संगीत के सुर और रस घोलने के लिए बड़े एहतराम के साथ याद किया जाता है। हिंदी और उर्दू सिनेमा के सबसे ज्यादा मधुर और कालजयी गीत उनके ही दिए हुए हैं। लखनऊ के अकबरी गेट के कांधारी बाज़ार की गलियों से शुरू नौशाद का संगीत सफ़र चमत्कारिक रहा था। (Indian film music Naushad)

1940 में मुंबई पहुंचकर उन्होंने फिल्मों में संगीत देना शुरू किया था, लेकिन उन्हें शोहरत मिली 1944 की फिल्म ‘रतन’ से। उसके बाद जो हुआ वह आज इतिहास है। अपने छह दशक लंबे कैरियर में उन्होंने 67 फिल्मों में संगीत दिया। मेला, शारदा, अनमोल घड़ी, शाहज़हां, अंदाज़, दर्द,दिल्लगी, दुलारी, बाबुल, दीदार, आन, बैजू बावरा, अमर, शबाब, उड़न खटोला, मदर इंडिया, कोहिनूर, मुगले आज़म, गंगा जमुना, मेरे महबूब, पालकी, लीडर, साथी, राम और श्याम, आदमी, दिल दिया दर्द लिया और संघर्ष में उन्होंने जिन धुनों की रचना की वे हमारी सांगीतिक विरासत का अनमोल हिस्सा हैं।

नौशाद को संगीत की नई प्रतिभाओं की पहचान थी।मोहम्मद रफ़ी और सुरैया जैसे महान फनकारों को सामने लाने का श्रेय उन्हें ही जाता है। अमीरबाई कर्नाटकी, निर्मलादेवी, उमा देवी उर्फ टुनटुन को गायन के क्षेत्र में उन्होंने ही उतारा था। नौशाद ही थे जिन्होंने उस्ताद बड़े गुलाम अली खां, उस्ताद अमीर खां और डीवी पलुस्कर जैसी शास्त्रीय संगीत की महान विभूतियों से भी उनकी अनिच्छा के बावजूद अपनी फिल्मों में गीत गवा लिए। (Indian film music Naushad)

उस दौर में जब राज कपूर के लिए मुकेश और दिलीप कुमार के लिए रफ़ी की आवाज़ रूढ़ हो चली थी, नौशाद ने फिल्म ‘अंदाज’ में दिलीप कुमार के लिए मुकेश और राज कपूर के लिए रफ़ी की आवाज का पहली बार उपयोग कर सबको चौंका दिया था. बहुत कम लोगों को पता है कि नौशाद एक अज़ीम शायर भी थे जिनका दीवान ‘आठवां सुर’ के नाम से प्रकाशित हुआ था। संगीतकार नौशाद ने शायर नौशाद को पृष्ठभूमि में ढकेल रखा है।

आबादियों में दश्त का मंज़र भी आएगा

गुज़रोगे शहर से तो मिरा घर भी आएगा

अच्छी नहीं नज़ाकत-ए-एहसास इस क़दर

शीशा अगर बनोगे तो पत्थर भी आएगा (Indian film music Naushad)

सैराब हो के शाद न हों रह-रवान-ए-शौक़

रस्ते में तिश्नगी का समंदर भी आएगा

बैठा हूं कब से कूचा-ए-क़ातिल में सर-निगूं

क़ातिल के हाथ में कभी खंज़र भी आएगा। (Indian film music Naushad)

(ये लेखक के निजी विचार हैं, लोक माध्यम से साभार)

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