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Sunday, March 8, 2026
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सुमित्रानंदन पंत को याद करते हुए, उनकी एक कविता

सुनील सिंह


दंतकथा, वीरों की गाथा, सत्य, नहीं इतिहास,

सम्राटों की विजय लालसा, ललना भुकुटि विलास, (Remembering Sumitranandan Pant poem)

देव नियति का निर्मम क्रीड़ा चक्र न वह उच्चश्रृंखल,-

धर्मान्धता, नीति, संस्कृति का ही न मात्र समर स्थल ।

साक्षी है इतिहास, किया तुमने दुन्दुभि से घोषित,–

प्रकृति विजित कर, मानव ने की विश्व सभ्यता स्थापित ! (Remembering Sumitranandan Pant poem)

विकसित हो, बदले जब जब जीवनोपाय के साधन,

युग बदले, शासन बदले, कर गत सभ्यता समापन !

सामाजिक संबंध बने नव, अर्थ भित्ति पर नूतन

नव विचार, नव रीति निति, नव नियम, भाव, नव दर्शन !

साक्षी है इतिहास, आज होने को पुन: युगान्तर;

जनगण का अब शासन होगा उत्पादन यंत्रों पर । (Remembering Sumitranandan Pant poem)

वर्गहीन सामाजिकता देगी सबको सम साधन;

पूरित होंगे जन के भव जीवन के निखिल प्रयोजन !

दिग् दिगंत में व्याप्त, निखिल युग युग का चिर गौरव हर;

जन संस्कृति का नव विराट प्रासाद उठेगा भू पर !

धन्य मार्क्स ! चिर तमच्छन्न पृथ्वी के उदय शिखर पर

तुम त्रिनेत्र के ज्ञान चक्षु-से प्रकट हुए प्रलयंकर ! (Remembering Sumitranandan Pant poem)

सुमित्रानन्दन पंत की साहित्यिक यात्रा के तीन प्रमुख पडाव हैं- प्रथम में वे छायावादी हैं, दूसरे में समाजवादी आदर्शों से प्रेरित प्रगतिवादी तथा तीसरे में अरविन्द दर्शन से प्रभावित अध्यात्मवादी।उपर्युक्त कविता उन्होंने दुनिया में समाजवादी आंदोलन से प्रेरित होकर लिखी थी।

सुमित्रानंदन पंत का जन्म अल्मोड़ा (उत्तर प्रदेश) के कौसानी गांव में 20 मई,1900 को हुआ था। जन्म के कुछ समय बाद ही मां का निधन होने से उन्होंने प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण अपने गांव की प्रकृति को ही अपनी मां मान लिया। नन्हीं उम्र में नेपोलियन की तस्वीरको देखकर उनकी तरह अपने बालों को ताउम्र बड़े रखने का निर्णय लेने के साथ ही उन्होंने अपने नाम गुसाई दत्त को बदल कर सुमित्रानंदन पंत रख लिया। (Remembering Sumitranandan Pant poem)

उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा से लेने के बाद अपने बड़े भाई देवीदत्त के साथ आगे की शिक्षा के लिए काशी आकर क्वींस कॉलेज में दाखिला लिया और अपनी कविताओं से सबके चहेते बन गए। पंत 25 वर्ष तक केवल स्त्रीलिंग पर कविता लिखते रहें। वे नारी स्वतंत्रता के कटु पक्षधर थे। उनका कहना था कि ‘भारतीय सभ्यता और संस्कृति का पूर्ण उदय तभी संभव है, जब नारी स्वतंत्र वातावरण में जी रही हो।’ वे स्वयं कहते हैं –

‘मुक्त करो नारी को मानव,

चिर वन्दिनी नारी को।

युग-युग की निर्मम कारा से,

जननी सखि प्यारी को।’ (Remembering Sumitranandan Pant poem)

भाषा के समृद्ध और सशक्त हस्ताक्षर व संवेदना एवं अनुभूति के कवि सुमित्रानंदन पंत ने चिदंबरा, उच्छवास, वीणा, गुंजन, लोकायतन समेत अनेक काव्य कृतियों की रचना की हैं। गुंजन को तो वे अपनी आत्मा का गुंजन मानते हैं। पंत की प्रारंभिक कविताएं ‘वीणा’ में संकलित हैं। उच्छवास तथा पल्लव उनकी छायावादी कविताओं का संग्रह है। ग्रंथी, ग्राम्या, युगांत, स्वर्ण किरण, स्वर्ण धूलि, कला और बूढ़ा चांद, सत्यकाम आदि उनकी अन्य प्रमुख कृतियां हैं।(Remembering Sumitranandan Pant poem)

(लोक माध्यम से साभार)

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