सावित्रीबाई फुले जो कि एक महान समाज सुधारक रहीं, जिन का पूरा जीवन एक योद्धा का जीवन रहा, जिन्होंने स्त्रियों की अशिक्षा, धार्मिक कुरीतियों के खिलाफ लगातार तीखा संघर्ष किया। आज उनके जन्म के 192वें वर्ष बाद यदि हम भारत में महिलाओं की समस्याओं को देखें तो पाते हैं कि जो लड़ाई सावित्रीबाई फुले ने शुरू की थी, वह अभी तक अपने मुकाम पर नहीं पहुंची है। आज भी महिलाऐं तमाम तरीकों से समाज में शोषित-उत्पीड़ित हैं। (India’s first female teacher)
आज भी वे बराबरी की जगह दोयम दर्जे की स्थिति जी रही हैं। सावित्रीबाई फुले का जीवन संघर्ष निश्चित ही आज भी महिलाओं को प्रेरणा देता है। उनका जीवन आज की भारतीय महिलाओं को कह रहा है कि वे आज की चुनौतियों का सामना करें जैसा कि उन्होंने किया।

▪️सावित्रीबाई फुले का जीवन
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र में हुआ। महज 9 वर्ष की आयु में उनका विवाह 12 वर्षीय ज्योतिबा फुले के साथ हो गया। ज्योतिबा फुले ने सावित्रीबाई को पढ़ना-लिखना सिखाया। दोनों ने कंधे से कंधा मिलाकर सामाजिक कुरीतियों और स्त्री शिक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण कार्य किये। 1848 में पहला बालिका स्कूल खोला, जिसमें 9 बालिकाएं पढ़ती थीं। सावित्रीबाई फुले यहां की प्रथम अध्यापिका और प्रधानाचार्या रहीं। इस तरह कहा जा सकता है सावित्रीबाई फुले भारत में आधुनिक बालिका शिक्षा की पहली अध्यापिका रहीं। (India’s first female teacher)
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इसके बाद यह सिलसिला आगे बढ़ा और कई बालिका विद्यालय खोले गए। अछूत बालिकाओं के लिए अलग विद्यालय खोले गये। मजदूरों को पढ़ाने के लिए रात्रि कक्षाएं भी चलाई गईं सावित्रीबाई फुले स्त्री शिक्षा का काम ऐसे समाज में कर रही थीं जो पूरी तरह सवर्ण ब्राह्मणवाद के कोड़ से ग्रसित था। यह सवर्ण ब्राह्मणवाद स्त्रियों को पैर की जूती से अधिक कुछ नहीं समझता था। 8-9 वर्ष में ही बच्चियों की शादी कर दी जाती थी।
विधवा होने पर सर मुंडवा कर विधवा आश्रम भेज दिया जाता था। पति के मरने पर स्त्री को जिंदा जला कर उसे सती कर दिया जाता था। समाज का यह पिछड़ा हिस्सा सावित्रीबाई फुले की राहों में लगातार कांटे बिछाता रहा। सावित्रीबाई फुले इन कांटों भरी राह पर चलकर ही महानता के शिखर पर पहुंचीं। सावित्रीबाई फुले जब स्कूल जाती तो उसके ऊपर कीचड़-गोबर फेंका जाता। उन्हें गंदी गालियों का सामना करना पड़ता था। यहां तक कि उन्हें परिवार तक से निकाल दिया गया किंतु वे अपनी राह से डिगी नहीं बल्कि मजबूती से चलती रहीं। (India’s first female teacher)



