एक दर्द यह भी, नहीं कोई हमदर्द भी। मैं जुम्मन ‘अंसारी’ वह सुरेश ‘कोरी’ दोनों एक दूसरे के दलित पड़ोसी। (Reservation: Abu Horaira poem) दोनों का पेशा एक, व्यवहार एक, और दोनों ही जुलाहे। दो महिलाएँ! दोनों ही सफाई कर्मचारी। दोनों के काम में भी बराबरी। दोनों में मित्रता भी खूब। एक हलालखोर और दूसरी भंगी। एक मान्यता प्राप्त दलित और दूसरी अमान्य दलित पंचर बनाने वाला अब्दुल और चप्पल बनाने वाला संतोष एक व्यवस्था में दूसरा दुरावस्था में इसी भांति अनेकों जातियाँ इनमें कोई भेद नहीं अतिरिक्त इसके एक अल्लाह का बंदा दूसरा ईश्वर का भक्त किन्तु व्यवस्था का भेद और हमारा खेद एक सरकारी सेवा में दूसरा यथा सेवा में प्रश्न तो बनता है सत्ता से, कानून से बुद्धिजीवियों से और तथाकथित सेक्युलरों से भी ये अंतर कैसा? ये मंत्र कैसा? और ये तंत्र कैसा? जहां धर्म के आधार पर भेद भाव?
(Reservation: Abu Horaira poem)
– डॉ. अबू होरैरा अतिथि प्राध्यापक हिन्दी विभाग मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद (तेलंगाना) 500032 पसमांदा सामाजिक कार्यकर्ता