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Thursday, March 12, 2026
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“द ओएनजी” ने झारखंड की मिलीजुली संस्कृति को दुनिया की आधुनिकता के मुकाबले किया खड़ा

रांची। “अ जर्नी ऑफ़ कल्चर एंड कंपनीओंनशिप विथ वर्ड्स”। “द ओएनजी” के लिए ये अकेला शब्द है जो अपनी अनवरत यात्रा पर निकल पड़ा है। नाम है काफी सरल और स्वभाव विनम्र, “संध्या सिंह कुटिया”। जो खादी और सरस मेले में किसी पहचान की मोहताज नहीं है। उनका प्रोडक्ट है फंकी और ट्रडिशनल “टी -शर्ट”। जिसके स्लोगन में सिर्फ ‘अक्षर’ नहीं बल्कि झारखंड की समृद्ध विरासत की ‘शब्दयात्रा’ भी हैं। उनके प्रोडक्ट में “ह्यूमेन एन्हांसमेंट क्वेश्चन” हैं। उसने “द ओएनजी” जैसी संस्था को खड़ा किया जिसमें झारखंड की मिलीजुली संस्कृति है। संध्या के दिल में दुनिया की आधुनिकता के मुकाबला करने का अकूत जज्बा है लेकिन संध्या इस सफर में अकेली नहीं है उसने अपने इस सफर में बनाया अपने पति को बनाया है अपना हमसफ़र। (“The ONG” pitted the mixed culture of Jharkhand)

लिख डाली झारखंड के नए दौर की कहानी और अल्फाज
संध्या सिंह कुटिया फिलहाल रांची के मोरहाबादी में आयोजित सरस और खादी मेले में आकर्षण के केंद्र में हैं। संध्या झारखंड वुमन ट्राइबल इंडस्ट्री की वाईस प्रेसिडेंट भी हैं और एक जागरूक सामाजिक कार्यकर्ता भी। उनके स्टॉल लगातार लोगों का ध्यान अपनी और खींच रही है।
उनके स्टॉल पर हालांकि लोगों को एक साथ कई चीजें देखने को मिल रही है। जिसमे झारखंड की समृद्ध विरासत को संजोती “डॉ वासवी कीडो” की लिखी कई पुस्तकें भी है, कुछ प्राचीन दवाई भी हैं। इसी स्टॉल पर सिल्क की खूबसूरत साड़ियां भी है।

रेशमी रंगों की साड़ियों में बेहद खूबसूरत कलात्मक चित्र भी हैं। लेकिन इन सबके बीच जो लोगों का ध्यान खींच रही है वह है “टी -शर्ट” के स्लोगन। जो फंकी भी है, दरअसल यह कॉन्सेप्ट बेस्ड प्रोडक्ट है ,संडे सिम डे, ब्रेड बटर, दाल भात चोखा। कीमत लगभग पांच सौ के करीब है, जो अलग अलग साइज में उपलब्ध है। युवाओं का ध्यान अपनी और खींच रही है। (“The ONG” pitted the mixed culture of Jharkhand)

 

“द ओएनजी” ने ऑन लाइन बिजनेस से युवाओं को जोड़ा
“द ओएनजी” संस्था की चीफ संध्या सिंह कुटिया मूल रूप से चाईबासा की रहने वाली है और 2019 से ही अपना ऑनलाइन व्यवसाय वेबसाइट के जरिये बखूबी चला रही है। संध्या सिंह कुटिया ने बताया कि जो एकमात्र हम कोशिश कर सकते हैं, वह यह है कि हम जिस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं उस दिशा को हम प्रभावित कर सकें।
झारखंड की समृद्ध विरासत की जिस इकाई को हम दुनिया के सामने लेकर आए हैं वह अपील करती है, उसके एक भावनात्मक सन्देश भी छिपा है। इस तरह हम अपनी आकांक्षाओं को गढ़ने में सक्षम हो रहे हैं। हमारे सामने असली समस्या यह नहीं है कि हम लोगों को लुभाने में कितने सफल हैं, असली सवाल है अपने व्यापार के माध्यम से हम खुद को भी कितना सकून दे पाते हैं क्योंकि हम व्यापार झारखंड की साझी विरासत से है, जिसके औचित्य को लेकर कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। (“The ONG” pitted the mixed culture of Jharkhand)


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