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Wednesday, September 23, 2026
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टीटू वाल्मीकि मौत प्रकरण में डिप्टी CMO की जांच रिपोर्ट पर ही सवाल; जांच अधिकारियों ने बिना CCTV लिए आरोपित डॉक्टरों के बयानों को मान लिया सत्य, लगाई क्लीन चिट जैसी रिपोर्ट

बरेली। सनराइज हॉस्पिटल में टीटू वाल्मीकि की संदिग्ध मौत के मामले में जांच करने वाले अधिकारियों की कार्यप्रणाली ही अब सवालों के घेरे में है। जांच समिति ने जिस घटनाक्रम के आधार पर निष्कर्ष दिया, उसकी स्वतंत्र पुष्टि करने वाले महत्वपूर्ण साक्ष्य—अस्पताल की CCTV फुटेज—को ही जांच का हिस्सा नहीं बनाया। न अस्पताल का DVR अथवा संबंधित मूल रिकॉर्डिंग प्राप्त कर उसकी तकनीकी जांच किए जाने का रिपोर्ट में उल्लेख है और न ही संबंधित अवधि की सभी कैमरा रिकॉर्डिंग सुरक्षित कराने की कार्रवाई सामने आती है। इसके बावजूद समिति ने उपलब्ध बयानों और दस्तावेजों के आधार पर निष्कर्ष दे दिया। जांच रिपोर्ट पर डॉ. आरके गुप्ता और उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. लईक अहमद अंसारी के हस्ताक्षर हैं।
मामले में सवाल सिर्फ CCTV तक सीमित नहीं हैं। जांच अधिकारियों ने उस एंबुलेंस चालक से भी पूछताछ नहीं की, जिसके जरिए टीटू वाल्मीकि को सनराइज हॉस्पिटल लाया गया था। शिकायतकर्ता के बयान में अस्पताल ले जाए जाने की परिस्थितियों और एंबुलेंस चालक की भूमिका का उल्लेख है। ऐसे में एंबुलेंस चालक से पूछताछ घटनाक्रम की महत्वपूर्ण कड़ी को स्पष्ट कर सकती थी।
जब वीडियो का जिक्र जांच रिपोर्ट में है, तो CCTV की जांच क्यों नहीं?
जांच के दौरान शिकायतकर्ता ने अस्पताल में मौजूद वीडियो/CCTV साक्ष्य का उल्लेख किया था। रिपोर्ट के पृष्ठ तीन पर मरीज को देखने और बाद में उच्च चिकित्सा केंद्र भेजे जाने से संबंधित वीडियो का भी उल्लेख दर्ज है।
ऐसे में जांच अधिकारियों के सामने स्वाभाविक प्रक्रिया यह थी कि अस्पताल के CCTV सिस्टम को सुरक्षित कराया जाता, संबंधित DVR और मूल रिकॉर्डिंग प्राप्त कर तकनीकी जांच कराई जाती और यह देखा जाता कि 28 नवंबर 2025 को टीटू अस्पताल में कब पहुंचा, उसकी स्थिति क्या थी, किस डॉक्टर ने उसे देखा, ऑक्सीजन कब लगाई गई और उसे रेफर करने की वास्तविक परिस्थितियां क्या थीं।
लेकिन उपलब्ध जांच रिपोर्ट में ऐसी किसी स्वतंत्र CCTV जांच का उल्लेख नहीं है।
आरोपित डॉक्टरों के बयान ही पर्याप्त कैसे हो गए?
जांच रिपोर्ट में डॉ. रेहान अहमद और अस्पताल के मैनेजर सोहेल खान के बयान दर्ज किए गए हैं। डॉ. रेहान अहमद ने मरीज के गंभीर हालत में आने और उच्च चिकित्सा केंद्र भेजने की सलाह दिए जाने की बात कही, जबकि सोहेल खान ने मरीज के अस्पताल में भर्ती किए जाने को लेकर अपना पक्ष रखा।
सवाल यह है कि इन बयानों का CCTV, मूल चिकित्सकीय अभिलेख और अन्य स्वतंत्र साक्ष्यों से कितना सत्यापन किया गया? जांच रिपोर्ट के अंतिम निष्कर्ष में CCTV के आधार पर इन बयानों की पुष्टि किए जाने का कोई उल्लेख नहीं मिलता।
एंबुलेंस चालक से पूछताछ नहीं, फिर घटनाक्रम की कड़ी पूरी कैसे हुई?
शिकायतकर्ता के अनुसार टीटू को एंबुलेंस के माध्यम से सनराइज हॉस्पिटल लाया गया था। अस्पताल पहुंचने से पहले और अस्पताल पहुंचने के समय की परिस्थितियों को जानने के लिए एंबुलेंस चालक का बयान महत्वपूर्ण हो सकता था। बावजूद इसके उपलब्ध जांच रिपोर्ट में एंबुलेंस चालक से पूछताछ का उल्लेख नहीं है।
यानी जांच में एक ओर CCTV जैसे स्वतंत्र इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की जांच नहीं हुई, दूसरी ओर घटनाक्रम की महत्वपूर्ण कड़ी एंबुलेंस चालक से पूछताछ भी नहीं की गई। फिर जांच समिति किस आधार पर अंतिम निष्कर्ष तक पहुंची—यह सवाल अब खुद जांच रिपोर्ट पर खड़ा हो रहा है।
रिपोर्ट के निष्कर्ष पर भी सवाल
जांच रिपोर्ट के अंतिम पृष्ठ पर समिति ने उपलब्ध बयानों और दस्तावेजों के आधार पर निष्कर्ष दिया और शिकायत को निराधार बताया है। लेकिन उसी निष्कर्ष में CCTV की स्वतंत्र जांच अथवा एंबुलेंस चालक से पूछताछ का कोई उल्लेख नहीं है।
इसी को लेकर शिकायतकर्ता रजनीश वाल्मीकि ने मौजूदा समिति से अलग स्वतंत्र जांच समिति गठित कर पूरे मामले की दोबारा जांच कराने की मांग करने की बात कही है। उनका कहना है कि अस्पताल का DVR सुरक्षित कराकर CCTV फुटेज की तकनीकी जांच कराई जाए, आरोपी पक्ष के बयानों का स्वतंत्र साक्ष्यों से मिलान कराया जाए और एंबुलेंस चालक से पूछताछ की जाए।
क्या बोले CMO विश्राम सिंह और डिप्टी CMO लईक अहमद अंसारी?
मामले को लेकर CMO विश्राम सिंह से प्रतिक्रिया मांगी गई तो उन्होंने कहा कि उन्हें मामले की जानकारी नहीं है और वह मामले को लेकर मीडिया को कोई वर्जन नहीं देंगे। हालांकि CCTV के संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि CCTV लिए जाने चाहिए थे, क्यों नहीं लिए गए इसकी जांच कराई जाएगी।
डिप्टी CMO लईक अहमद अंसारी और डॉ. आरके गुप्ता की कार्यशैली पर उठे सवाल
रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने वाले डिप्टी CMO डॉ. लईक अहमद अंसारी और डॉ. आरके गुप्ता की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। शिकायत में CCTV/वीडियो साक्ष्य का स्पष्ट उल्लेख होने के बावजूद जांच समिति ने अस्पताल का मूल DVR अथवा संबंधित CCTV रिकॉर्डिंग प्राप्त कर सुरक्षित कराने और उसकी तकनीकी जांच कराने का कोई उल्लेख रिपोर्ट में नहीं किया है। इसके बावजूद अस्पताल पक्ष के डॉ. रेहान अहमद और मैनेजर सोहेल खान के बयानों के आधार पर निष्कर्ष तक पहुंचा गया। ऐसे में सवाल यह है कि जब महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की स्वतंत्र जांच और घटनाक्रम की महत्वपूर्ण कड़ी माने जा रहे एंबुलेंस चालक से पूछताछ तक नहीं की गई, तो दोनों जांच अधिकारियों ने किन आधारों पर जांच को पूर्ण मानते हुए निष्कर्ष तैयार किया? संबंधित पक्षों के बयानों का CCTV, मूल चिकित्सकीय अभिलेख और अन्य स्वतंत्र साक्ष्यों से कितना सत्यापन किया गया, इसका भी रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख नहीं है।
अब सबसे बड़ा सवाल
जब जांच समिति के सामने CCTV/वीडियो साक्ष्य का उल्लेख था, फिर भी अस्पताल की मूल CCTV रिकॉर्डिंग की जांच नहीं हुई; एंबुलेंस चालक से पूछताछ नहीं हुई; और आरोपी पक्ष के बयानों के स्वतंत्र सत्यापन का स्पष्ट उल्लेख भी जांच रिपोर्ट में नहीं है, तो आखिर जांच अधिकारियों ने किस आधार पर शिकायत को निराधार मानते हुए निष्कर्ष तैयार किया? यही सवाल अब स्वास्थ्य विभाग की जांच प्रक्रिया पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न बनकर सामने आया है।
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