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Wednesday, October 28, 2026
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बरेली पुलिस का Catch-22: कलेक्ट्रेट में ‘वसूली Vs रंगदारी’ केस में कौन पाक-साफ, किसका पर्दाफाश, 10 दिसंबर को हाईकोर्ट करेगा फैसला

कलेक्ट्रेट परिसर में हैसियत प्रमाणपत्र की फीस बताकर अवैध वसूली की कोशिश हुई या पत्रकारों ने रंगदारी मांगी और कुछ रकम वसूल भी ली, इसकी सुनवाई 10 दिसंबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट में हाेगी। आरोपी पक्ष ने एफआईआर रद करने की रिट दायर की है। बरेली कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ताओं शशिकांत शर्मा, चंद्रपाल सिंह, यशपाल सिंह आदि के अनुसार, पत्रकारों की आेर से दायर याचिका में इस संबंध में कुछ सामान्य तथ्य दिए गए हैं, जिनके आधार पर हाईकोर्ट ने प्रकरण को सुनवाई के योग्य माना है। साथ ही सरकारी पक्ष को आदेशित किया है कि 15 दिन में दिशानिर्देश लेकर सभी जरूरत कदम उठाएं जाए और जांच अधिकारी तथ्यों को प्रस्तुत करने के साथ ही स्टेनो संजीव कुमार कश्यप को नोटिस दें। आदेश में याचियों को खुद हाजिर होने या फिर गिरफ्तार होने की सूरत में उसी दिन एसएचओ या मजिस्ट्रेट द्वारा जमानत देने की बात भी कही गई है। आदेश के आधार पर घटना के मुख्य किरदार अवधेश कुमार ने सीजेएम कोर्ट से जमानत ले ली है।
हाईकोर्ट में प्रस्तुत करने के लिए विवेचना अधिकारी साक्ष्यों को जुटा ही रहे होंगे। इस बीच इंडस न्यूज टीवी की टीम की पड़ताल जारी है, जिसमें गहरे राज सामने आने के संकेत हैं। अभी तक जो तथ्य सामने आए हैं, उनको देखकर इतना ही कहा जा सकता है कि यह बरेली पुलिस के लिए कैच-22 है। मतलब, एक ऐसी समस्या, जिसका कोई ठीक समाधान निकाल पाना मुश्किल है। पड़ताल में जो कुछ तथ्य सामने आए हैं, या वे साक्ष्य, जिनको जुटाया जाना चाहिए, दिलचस्प हैं। वैसे, यह इतना पेचीदा मामला भी नहीं है कि इसे न समझा जा सके। अवधेश कुमार का 22 सितंबर को दिया प्रार्थनापत्र और 25 सितंबर को संजीव कश्यप द्वारा दर्ज कराई एफआईआर को अगल-बगल रखने पर बहुत कुछ साफ हो रहा है।

पूरे घटनाक्रम को सीक्वेंस से समझने के क्रम में हमें पता चला कि पत्रकारिता की पढ़ाई करने के साथ स्वतंत्र पत्रकारिता करने का प्रयास कर रहे 22 वर्षीय अवधेश कुमार के पिता सुंदरलाल का हैसियत प्रमाणपत्र अगस्त महीने में ऑनलाइन अप्लाई किया गया। इस प्रक्रिया में यह प्रमाणपत्र अपने आखिरी मुकाम एडीएम प्रशासन के दफ्तर पर पहुंचना था, जहां इस काम की जिम्मेदारी एडीएम प्रशासन पूर्णिमा सिंह के स्टेनो संजीव कुमार कश्यप के पास है।
अवधेश ने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) के साथ साझा किए गए बयान में बताया,
’22 सितंबर से पहले मैं दो बार संजीव कश्यप के पास प्रमाणपत्र की जानकारी लेने गया था, 31 अगस्त को जब प्रमाणपत्र ऑनलाइन वहां पहुंच गया तब, और उसके बाद 6 या 7 सितंबर को। संजीव कश्यप ने पहली बार पता करने के समय अपना मोबाइल नंबर दिया था कि फोन पर जानकारी ले लेना, साथ ही यह कहा कि जब प्रमाणपत्र आ जाएगा तो 5000 रुपए फीस जमा होगी। अगली बार फोन किया और वहां गए भी, तब भी संजीव कश्यप ने प्रमाणपत्र ऑफलाइन आने के बाद 5000 रुपए फीस जमा करने को कहा, जिससे वह जारी हो सके। इस संबंध में लेखपाल आदि से जानकारी ली तो उन्होंने प्रमाणपत्र की फीस 120 रुपए ही बताई, जो कि ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया में पहले ही जमा हो चुकी थी। इसके बाद 22 सितंबर को दिन में 12 बजे के आसपास गए तो साथ में सर्वश्रेष्ठ मीडिया अखबार के ब्यूरो चीफ मनोज गौतम भी साथ थे, उस समय थर्ड आई कैमरे में क्यूआर कोड और वह बातचीत रिकॉर्ड है, जिसमें संजीव कश्यप स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि 5000 रुपए फीस जमा करना पड़ेगी, तभी प्रमाणपत्र मिलेगा’
इसके बाद अवधेश ने डीएम को प्रार्थनापत्र लिखा, जिसमें पांच हजार रुपए फीस मांगे जाने की जांच कर कार्रवाई का आग्रह किया गया। कलेक्ट्रेट गेट पर एलआईयू के ठिकाने के आसपास कई पत्रकार और भी थे, जिन्हें अवधेश ने मामला बताया। उन पत्रकारों में इंडस न्यूज टीवी के संतोष शाक्य, सिटी न्यूज के अंशु, वंदे भारत के मुकेश और समाचार प्लास ओटीटी के पवन त्रिपाठी भी थे। अवधेश ने आरजीए न्यूज, वंदे भारत, समाचार प्लस ओटीटी, एएनबी न्यूज, सर्वश्रेष्ठ मीडिया की माइक आईडी पर बाइट दी। उसी समय मौजूद पत्रकारों के बीच मामले की गंभीरता को लेकर चर्चा हुई और पूरा प्रकरण एसपी विजिलेंस को बताने का निश्चय हुआ।
संतोष शाक्य ने बताया, हमने एसपी विजिलेंस को कॉल की, लेकिन उनका फोन बंद था। इसके बाद सीओ विजिलेंस को कॉल की, जो दफ्तर की किसी महिला ने उठाया और उन्होंने एसपी विजिलेंस के दफ्तर में होने का हवाला देकर आने को कहा। यह कॉल रिकॉर्डेड है संतोष शाक्य के मोबाइल में। वहां शिकायतकर्ता अवधेश के साथ मनाेज गौतम, पवन त्रिपाठी, संतोष शाक्य, अंशु भी गए। एसपी विजिलेंस ने सभी का परिचय लिया और पूरी बात सुनकर कहा कि गजेटेड ऑफिसर से नीचे के मामलों में एंटी करप्शन से कार्रवाई कराना बेहतर रहेगा। फिर सब एंटी करप्शन सेल गए और वहां मिले अधिकारी ने आॅनलाइन पैसे लिए जाने की बात सुनकर कहा कि कैश होता तो हम रंगे हाथ पकड़ सकते थे, लिहाजा डीएम से कार्रवाई कराना ही उचित रहेगा। अवधेश ने इसी वजह से डीएम को अपना प्रार्थनापत्र दिया और उनकी अनुपस्थिति में कार्यालय से रिसीविंग ली।
इस घटनाक्रम के अंत में मनोज गौतम, संतोष शाक्य, अंशु, मुकेश, पवन त्रिपाठी संजीव कश्यप से क्यूआर कोड में फीस का मामला जानने पहुंचे। संजीव कश्यप ने नाजिर पर टाला और वहां लेकर गए, लेकिन नाजिर त्रिवेणी सहाय ने कह दिया कि हमने क्यूआर कोड नहीं लगवाया है, एडीएम प्रशासन से जानकारी मिलेगी। संजीव कश्यप ने एडीएम प्रशासन पूर्णिमा सिंह से मिलने और बात कराने का आश्वासन दिया। अवधेश से थर्ड आई कैमरे में कैप्चर वीडियो मनोज गौतम तक पहुंची और मनोज से वह वीडियो एलआईयू के कर्मचारी अमित को मिली, जिसके बाद अमित ने खुद संजीव कश्यप को फोन करके प्रमाणपत्र जारी करने की सिफारिश की और सभी पत्रकारों से वीडियाे न चलाने का अाग्रह किया।

अवधेश का कहना है कि अमित बाद में मुझे अपने साथ संजीव कश्यप के पास भी ले गए, तब तक उन्होंने प्रमाणपत्र जारी कर दिया था। पत्रकारों के बीच बात चर्चा में थी, शिकायती पत्र एक दूसरे से शेयर भी किया गया और मनोज गौतम ने अपने साप्ताहिक अखबार सर्वश्रेष्ठ मीडिया का लोगो लगाकर वीडियो को निजी फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट कर दिया, क्योंकि तब तक अखबार को ताजा अंक प्रकाशित हो चुका था और अगला अंक आने में समय था। जबकि इस घटनाक्रम में अनुपस्थित रहे अमल सैनी ने शिकायती पत्र अपने चैनल एएनबी को भेज दिया, जहां से उसे एक्स पर ट्वीट कर दिया गया। यह लिंक डीएम ग्रुप पर भी किसी ने शेयर किया।
इसके बाद कुछ पत्रकारों ने मनोज गौतम से वीडियो डिलीट करने की सिफारिश की, जो घटना वाले दिन मौके पर मौजूद नहीं रहे थे। पवन त्रिपाठी के पास भी इस खबर को न चलाने के लिए एक पत्रकार का मैसेज और फोन आया, हालांकि उन्होंने ऐसा कोई कंटेंट प्रसारित नहीं किया था। इंडस न्यूज टीवी के संतोष शाक्य ने भी ऐसा कोई कंटेंट न खुद किसी जगह पब्लिश किया और न ही अपने चैनल को भेजा।
अगले दिन, 23 सितंबर को जिला सूचना अधिकारी की सूचना पर तमाम रिपोर्टर कलेक्ट्रेट सभागार पहुंचे। बताया गया था कि डीएम कोई प्रेसवार्ता करेंगे। फिर अचानक यह प्रेसवार्ता कैंसिल कर दी गई।
मनोज गौतम ने बताया, ‘जब सभागार में थे, तब भी एक पत्रकार साथी ने अपने फोन से दूसरे पत्रकार से बातचीत कराई, जिन्होंने वीडियाे डिलीट करने को कहा। इसके बाद सभी लोग कलेक्ट्रेट से बाहर आ गए और जिसे जहां जाना था चले गए, मैं रजिस्ट्री ऑफिस चला गया।’
मनोज गौतम, संतोष शाक्य, अवधेश, पवन त्रिपाठी ने अलग-अलग बातचीत में यह कहा कि 23 सितंबर को हम संजीव कश्यप के दफ्तर में नहीं गए और यह भी कहा कि पूरे प्रकरण में अमल सैनी हमारे साथ नहीं था। वह 23 सितंबर को सभागार में होने वाली प्रेसवार्ता के समय भी मौजूद नहीं था।
यहां यह भी गौर करने वाली बात है, अमल सैनी 24 सितंबर की दोपहर को एक अन्य मामले में हिरासत में लिया गया, हालांकि पुलिस एफआईआर में उसको 24 सितंबर की शाम को खुर्रम गौंटिया रोड से गिरफ्तार होना बताया गया है। समाचारपत्रों में प्रकाशित हुआ है कि अमल सैनी 23 सितंबर को शोएब के साथ शबाना नाम की महिला से मिला और उकसाकर पारिवारिक विवाद संबंधी वीडियो शूट की, उसी दिन यानी 23 सितंबर को वह शोएब के साथ शबाना के ससुर से भी मिला और उनसे छह हजार रुपए वसूले।
यह पूरा किस्सा कलेक्ट्रेट की घटना से अलग है। लेकिन, पुलिस की आत्मदाह संबंधी एफआईआर में अमल सैनी के बारे में 23 सितंबर की गतिविधि के बारे में बताया गया है। यही वही दिन है, जिसके बारे में संजीव कश्यप ने दर्ज कराई एफआईआर में कहा है कि 23 सितंबर को अमल सैनी के साथ अवधेश, मनोज, पवन, संतोष रंगदारी वसूलने आए और उन्होंने दस हजार रुपए उन्हें दिए, जिसके बाद वीडियो डिलीट की गई। किस समय आए और किसके हाथ में या अकाउंट में दस हजार रुपए दिए, यह बात एफआईआर में नहीं बताई गई है।

फिर समझिए, कलेक्ट्रेट में 22 सितंबर की घटना के तीन दिन बाद, 25 सितंबर को, जिस दिन अमल सैनी को जेल भेज दिया गया, उसी दिन शाम को पांच पत्रकारों पर एफआईआर दर्ज हुई, जिसमें अमल सैनी को रंगदारी मांगने और वसूलने वाले ‘गैंग लीडर’ बताते हुए प्रस्तुत किया गया। यह एफआईआर दर्ज कराई एडीएमई के स्टेनो संजीव कुमार कश्यप ने।
एफआईआर की तहरीर में संजीव कश्यप ने आरोप लगाया है कि अमल सैनी के साथ आए अवधेश कुमार, मनोज गौतम, पवन त्रिपाठी और संतोष शाक्य ने 15 हजार रुपए यानी तीन हजार रुपए प्रति व्यक्ति रंगदारी मांगी। एफआईआर में पहले दिन, 22 सितंबर का घटनाक्रम दिन के दो बजे दफ्तर का है, यानी यह रंगदारी पुलिस की मजबूत सुरक्षा, खुफिया एजेंसियों की निगरानी, सीसीटीवी की निगहबानी और सैकड़ों कर्मचारियों, वकीलों और आम लोगों की आवाजाही के बीच दिन के उजाले में हुई।
उन्होंने उसी समय इस मामले पर कोई कानूनी कदम नहीं उठाया, न अपने अधिकारियों को बताया। बल्कि, तीन दिन बाद दर्ज कराई एफआईआर में यह आरोप लगाया कि रंगदारी मांगने वाले पांचों पत्रकार 23 सितंबर को फिर आए और उन्होंने10 हजार रुपए दिए यानी दो हजार रुपए प्रति व्यक्ति, जिसके बाद वीडियो डिलीट की गई।

पहले दिन संजीव कश्यप खुद पांच हजार रुपए जमा करने को कह रहे थे और तीन दिन बाद उन्होंने दस हजार रुपए दे दिए। यह खेल कैसे और क्यों पलट गया? इसका बेहतर जवाब संजीव कश्यप ही दे सकते हैं, क्योंकि दोनों ही बातें उन्होंने एफआईआर में कही हैं।

इस रिपोर्ट को पढ़ने वाले खुद सोचें, यह क्या माजरा है? रंगदारी मांगने का आधार क्या है? वसूलने का आधार क्या है? किसके हाथ में दस हजार रुपए रंगदारी दी और क्यों दी? क्या अपने अधिकारी से पूछकर यह रकम दी? किस समय दी यह रंगदारी की रकम?
एफआईआर के अनुसार, संजीव कश्यप का कहना है कि उन्हाेंने बरेली जन कल्याण समिति के खाते में पांच हजार रुपए जमा करने को कहा, क्योंकि यह समिति गरीबों की मदद के लिए बनी है।
ऐसे में सवाल तो आएगा ही कि अगर किसी अकाउंट में गरीबों के कल्याण के लिए पैसे लिए जा रहे हैं और इसकी किसी ने वीडियो बना ली तो छवि कैसे धूमिल होगी? गरीबों के लिए जमा की जा रही रकम के आधार पर कोई कैसे ब्लैकमेल कर सकता है? यह तो गरीबों के लिए होने वाली सहायता का प्रचार माना जाना चाहिए। ऐसे प्रचार की वीडियो डिलीट कराने को दस हजार रुपए दे देना कैसे उचित है? प्रचार के लिए तो संस्थाएं विज्ञापन पर खर्च करती हैं। क्या संजीव कश्यप नहीं चाहते थे कि गरीबों के कल्याण के लिए जमा किए जा रहे धन के अभियान में और लोग भी शामिल हों और क्यूआर कोड स्कैन करके दान दें!
इस पूरे मामले पर कुछ सामान्य सवाल उठते हैं, जिन्हें किसी भी पत्रकार को पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों से पूछना चाहिए। इंडस न्यूज ने इस संबंध में 26 सितंबर को डीएम-एसएसपी को ईमेल करके पत्र भेजा, जिसका जवाब एक महीना बीतने के बाद अब तक नहीं आया। एडीएम प्रशासन पूर्णिमा सिंह और संजीव कश्यप को भी सवाल भेजे गए, वहां से भी जवाब नहीं आया।

सवाल क्या हैं?
डीएम से पूछना चाहिए कि 22 सितंबर को अवधेश कुमार ने क्यूआर कोड के माध्यम से 5000 रुपए फीस मांगे जाने की शिकायत की, उसकी जांच का क्या हुआ! उन्होंने इस मामले में अब तक कोई जांच की या नहीं! या क्लीनचिट दे दी स्टेनो को! क्या उन्होंने शिकायतकर्ता के बयान दर्ज कराए या साक्ष्य लिए और कलेक्ट्रेट के चप्पे-चप्पे पर मौजूद सीसीटीवी कैमरों के फुटेज के आधार पर कोई पड़ताल की?
क्या इस पर कोई जांच की कि बरेली जनकल्याण समिति के खाते में प्रमाणपत्र की फीस के नाम पर पैसे जमा कराना किसके आदेश से हो रहा है? यह सवाल इसलिए भी जरूरी हैं क्योंकि संजीव कश्यप ने एफआईआर में स्पष्ट रूप से यह कहा है कि उन्होंने हैसियत प्रमाणपत्र की जानकारी लेने आए लोगों से बरेली जन कल्याण समिति के अकाउंट में क्यूआर कोड के माध्यम से 5000 रुपए जमा करने को कहा।
यह भी उसी एफआईआर में लिखवाया है कि समिति के अध्यक्ष जिलाधिकारी हैं। कम से कम डीएम अविनाश सिंह अपने कार्यकाल में इस समिति के अकाउंट में जमा धनराशि और उसके उपयोग की जानकारी तो दे ही सकते हैं, जिससे आम लोगों मस्तिष्क में उपजने वाली शंकाएं समाप्त हों।
बात तो यह भी खास है कि जब 22 सितंबर को संजीव कश्यप के कार्यालय में अंशु और मुकेश समेत 6 लोग गए तो उन्होंने 5 लोगों के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज क्यों कराई, जबकि उन छह लोगों में एक शख्स अमल सैनी मौजूद न होने का दावा किया जा रहा है? अवधेश, मनोज, संतोष और पवन तो यह कह ही रहे हैं कि वे 22 सितंबर को संजीव कश्यप से उनका पक्ष जानने और क्यूआर कोड की जानकारी लेने पहुंचे। लेकिन, अंशु, मुकेश और अमल सैनी उनके साथ आए या नहीं, इसका साक्ष्य होना चाहिए?

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इस सवाल का जवाब तलाशने को इंडस न्यूज टीवी ने कलेक्ट्रेट में लगे कैमरों की पोजीशन भी परखी, जिसमें यह पूरा घटनाक्रम कैद होना चाहिए। कलेक्ट्रेट में दाखिल होने से पहले चौराहे पर कई कैमरे हर दिशा में लगे हैं, कलेक्ट्रेट गेट पर, गेट के ठीक सामने रिकॉर्ड रूम पर, बायीं तरफ मुड़ें तो एनआईसी की बिल्डिंग पर, डीएम कार्यालय के इर्द-गिर्द, डीएम के प्रशासनिक अधिकारी की चौखट पर एडीएम प्रशासन के कार्यालय की ओर गैलरी की निगरानी करता कैमरा, कोषागार की ओर से एडीएमई कार्यालय की आेर जाने वालों की निगरानी करता भी कैमरा है और खनन विभाग की चौखट से एडीएमई कार्यालय में आने आने वालों की निगरानी करता कैमरा भी है।
क्या ये कैमरे खराब हैं? ऐसा है तो पूछना पड़ेगा, कब से खराब हैं, क्याें खराब हैं, क्याें ठीक नहीं कराए गए अब तक? अगर सब ठीक हैं तो 90 दिन की रिकॉर्डिंग होना चाहिए, जिसमें बहुत कुछ स्पष्ट हो जाएगा।
इन कैमरों से यह बात चुटकियों में सामने आ सकती है कि 22 और 23 सितंबर को संजीव कश्यप के कार्यालय में कौन-कौन, किस समय गया। अगर दोनों दिन वही पांच लोग एक साथ वहां गए, जिनका नाम एफआईआर में दर्ज है, तो उनकी संजीव कश्यप के कार्यालय में मौजूदगी साबित की जा सकती है।
डीएम चाहते तो यह बात 25 सितंबर को एफआईआर दर्ज होने से पहले भी सामने आ सकती थी। ऐसा भी संभव है कि उन्होंने यह पता कर लिया हो। हो सकता है कि विवेचना अधिकारी ने यह फुटेज अब तक संरक्षित कर ली हों। एसपी विजिलेंस और एंटी करप्शन सेल के कैमरे और वहां के अधिकारी भी इस बात की जानकारी देंगे कि कौन-कौन उनके पास आया और उन्होंने क्या शिकायत की। एलअाईयू के कर्मचारी अमित के साथ मौजूदगी, उनके फोन से संजीव कश्यप को कॉल और अवधेश के साथ अमित का वहां जाना भी सीसीटीवी और कॉल रिकॉर्ड से पता चल सकता है।
अवधेश का कहना है, ‘जब मुझे एलआईयू कर्मचारी अमित अपने साथ संजीव कश्यप के पास ले गए तो अपनी सफाई में संजीव कश्यप ने अपने कंप्यूटर में मौजूद वह डाटा भी दिखाया, जिसमें यह कहने की कोशिश की गई कि बहुत से लोग पहले ही इस अकाउंट में रकम दे चुके हैं, कोई दस हजार तो कोई बीस हजार रुपए। इसी समय एलआईयू कर्मचारी अमित ने अवधेश से कहा कि तुम्हारा प्रमाणपत्र बन चुका है तो डीएम को दिए प्रार्थनापत्र की रिसीविंग मुझे दे दो और कल सुबह 10 बजे आकर एप्लीकेशन निरस्त करा देना।’
लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। अवधेश अगले दिन, यानी 23 सितंबर को प्रार्थनापत्र निरस्त कराने नहीं पहुंचे। इसका अर्थ यह है कि यह प्रार्थनापत्र डीएम कार्यालय के पास ही है, जिसकी जांच अब तक नहीं हुई या जांच का परिणाम जाहिर नहीं हुआ।
जांच का बिंदु यह भी बनता है कि जिन पांच लोगों पर एफआईआर दर्ज की गई है, उनके मोबाइल की दोनों दिन की लोकेशन भी इस केस में उनकी संजीव कश्यप के कार्यालय में आने-जाने की भूमिका के बारे में बहुत कुछ बता सकती है।
अवधेश, मनोज, संतोष और पवन दावा ठोककर कह रहे हैं कि 23 सितंबर को हम संजीव कश्यप के कार्यालय में नहीं गए। फिर कौन गया और कौन दस हजार रुपए ले गया संजीव कश्यप से? जबकि संजीव कश्यप अमल सैनी के साथ इन्हीं चार लोगों के दोबारा अगले दिन आकर धमकाने और रकम वसूल ले जाने का दावा कर रहे हैं।
अपुष्ट सूत्रों का कहना है कि स्टेनो संजीव कश्यप के पास भी रंगदारी मांगने वाले पत्रकारों के वीडियो साक्ष्य हैं। अगर ऐसा है तो यह अहम साक्ष्य हो सकता है। यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि उन वीडियोज में कौन हैं और क्या कह रहे हैं, क्या कर रहे हैं? क्या उनमें रंगदारी मांगी या वसूली जा रही है का सबूत है? यह वीडियोज किस तारीख और समय की हैं, यह भी जानना होगा। अगर यह 22 सितंबर की हैं तो उसी दिन एफआईआर दर्ज क्यों नहीं कराई गई, अगर 23 सितंबर की हैं तो उस दिन मुकदमा दर्ज क्यों नहीं कराया गया। पहले दिन ही पुलिस को इत्तेला क्यों नहीं दी, जब रंगदारी मांगी जा रही थी?
आरोपी पांच में से चार पत्रकारों ने अपने जो सबूत साझा किए हैं, उन्हें हाईकोर्ट में पेश करेंगे और विवेचक के मांगे जाने पर उन्हें भी उपलब्ध कराएंगे, ऐसा उन्होंने इंडस न्यूज टीवी ने कहा।

पड़ताल के बीच यह भी जानकारी मिली है कि एफआईआर दर्ज होने के कुछ समय बाद अवधेश ने राजस्व परिषद के चेयरमैन को और संतोष शाक्य ने प्रमुख सचिव विजिलेंस, राष्ट्रीय व राज्य मानवाधिकार आयोग को पत्र भेजकर जांच और न्याय की मांग की है। इन पत्रों में यह आशंका भी जताई गई है कि किन्हीं मामलों में दर्ज अज्ञात आरोपियों में उनका नाम घसीटा जा सकता है। संतोष शाक्य ने पूरे प्रकरण को लेकर लगभग 70 पेज की एक किताब भी लिखी है, जो जल्द ऑनलाइन पब्लिश होगी।
इंडस न्यूज टीवी की पड़ताल में बरेली जन कल्याण समिति के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारियां मिली हैं। इस बीच, आरटीआई, नोटा, फूड सेफ्टी एक्ट जैसे कानूनों के बनने में अहम भूमिका निभा चुकी पीयूसीएल की फैक्ट फाइंडिंग टीम ने आरोपी पक्ष के बयानों के साथ ही साक्ष्यों को कई कानूनी तरीकों से जुटाने की कोशिश की है।
हम अगली रिपोर्ट में उस क्रोनोलॉजी को समझेंगे, जिसकी वजह से प्रकरण सामने आया। कैसे, बरेली की मेडिकल इंडस्ट्री को छेड़ना कुछ पत्रकारों को भारी पड़ा? क्यों पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना मुश्किल बन गया है? कैसे यह घटना डिजिटल और प्रिंट मीडिया, पत्रकारिता की कमजोरियों और हाकिमों के अहंकार के बीच अंतरविरोध के बीच पनपे देशव्यापी पैटर्न का नमूना है?

(लेख को दो दशक से ज्यादा प्रिंट व डिजिटल माध्यमों में पत्रकारिता का अनुभव रखने वाले इंडस न्यूज टीवी के संपादक आशीष सक्सेना ने लिखा है।)

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