बरेली के सनराइज अस्पताल कांड में इंसाफ मांग रहे पीड़ित परिवार को अब न्याय नहीं, बल्कि धमकियां मिल रही हैं—और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ये धमकियां खुद पुलिस से जुड़ी बताई जा रही हैं।
सेठ दामोदर स्वरूप पार्क में धरने पर बैठे मृतक उर्वेश यादव के परिजनों ने गंभीर आरोप लगाया है कि सिविल ड्रेस में आए कुछ लोगों ने खुद को पुलिस से जुड़ा बताते हुए उन्हें धमकाया। मृतक की पत्नी ने बताया कि रात करीब 10 बजे कुछ लोग आए और साफ शब्दों में कहा—“धरना खत्म कर दो, नहीं तो पुलिस फोर्स लेकर आएंगे और कार्रवाई करेंगे।” यहां तक कि उन्हें आधे घंटे का अल्टीमेटम भी दिया गया।
सवाल यह है कि क्या अब न्याय मांगना भी अपराध हो गया है? एक तरफ मेडिकल बोर्ड डॉक्टर को गलत इलाज का दोषी मान चुका है, आयुष्मान घोटाले की पुष्टि हो चुकी है, फिर भी कार्रवाई के बजाय पीड़ित परिवार को डराने की कोशिश—यह साफ तौर पर सिस्टम की मंशा पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
क्या पुलिस का काम पीड़ित को सुरक्षा देना है या उसे चुप कराना? आधी रात को सिविल ड्रेस में पहुंचकर धमकाना किसी भी तरह से कानूनसम्मत कार्रवाई नहीं, बल्कि दबाव बनाने की रणनीति नजर आती है। इससे यह आशंका और गहरी हो जाती है कि कहीं पूरे मामले को दबाने की कोशिश तो नहीं की जा रही।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या बरेली में कानून का राज है या फिर ताकतवरों के इशारे पर पीड़ितों को ही डराया जाएगा?